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मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अस्पृश्यता निवारण – विहिप का उड्डुपी सम्मेलन


       रामफल सिंह ‘रामजी भाई’ ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन धर्मयोद्धा में लिखा है कि दुनिया में एकमात्र हिन्दू समाज ही ऐसा है जिसकी रचना पारिवारिक भावभूमि पर हुई है. हमारे समाज रचनाकार महान पूर्वजों ने कहा है कि ‘माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या’ अर्थात यह भारत भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं. इस भावभूमि से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अर्थात पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है, की परिकल्पना अस्तित्व में आई. भारत का यह समाज मात्र चिंतन – मनन तक ही सीमित नही रहा अपितु भारतीय मनीषी संसार के कोने – कोने में मानवता का सन्देश लेकर निकल पडे. कुछ समय पूर्व से भारतीय समाज की वर्ण – व्यवस्था के अनुसार शूद्र वर्ण को अस्पृश्य माना जाने लगा. ‘कृणवंतो विश्वमार्यम’ अर्थात विश्व को श्रेष्ठ बनाएँगें, का उदघोष करने वाली भारतीय संस्कृति में अस्पृश्यता का जन्म कब और कैसे हुआ ? क्या कोई सभ्य समाज जो मानव कल्याण का पक्षधर हो वह समाज में अस्पृश्यता जैसी कुरीति का पक्षधर होगा ? कदापि नही ! समाज में आई इस कुरीति के इतिहास के बारें में जानने पर ज्ञात हुआ कि यह बात सर्वविदित है कि सामाजिक छुआछूत भारतीय समाज का कभी भी अंग नही रहा है. भारतीय समाज में इस कुरीति को हल्के ढंग से नही लिया जा सकता क्योंकि यह कुरीति भारत के स्वर्णिम अतीत पर कुठाराघात करती है. रामजी भाई ने अपने शोध के आधार पर अपनी इसी पुस्तक में इस चर्चा को आगे बढाते हुए लिखते है कि भारतीय समाज की वास्तविक दशा को जानने के लिए हमें 712 ई. के पूर्व में जाना पडेगा. उस समय भारत में दो प्रमुख आन्दोलन हुए – बौद्ध आन्दोलन और जैन आन्दोलन. ये दोनों ही आन्दोलन अपने कालखंड के समाज में व्यापत बुराईयों को दूर करने के लिए हुए थे परंतु इन दोनों आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता की चर्चा तक नही है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उस समय तक सामाजिक अस्पृश्यता का अस्तित्व नही था अन्यथा दोनों ही अवतारी पुरुषों के नेतृत्व में चलने वाले आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को अनदेखा नही किया जा सकता था. वर्तमान समय में इन दोनों ही अवतारी पुरुषों को भारतीय समाज भगवान मानकर इनकी उपासना करता है.
      परंतु 712 ई. के पश्चात शायद ही ऐसा कोई कालखंड हो जिसमें सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को दूर करने का प्रयास न किया गया हो. राजाओं, संतो, सामाजिक संगठनों तथा मध्यकाल के भक्ति आन्दोलनों के द्वारा इस बुराई को दूर करने की कोशिश भी की गई थी. इसके उपरांत लगभग 500 वर्षों तक सिखों का आन्दोलन चला, तत्पश्चात गत 130 वर्षों से आर्यसमाज, महात्मा गाँधी समेत कई महापुरुषों द्वारा तथा गत कई दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का अनवरत सामाजिक आन्दोलन चला रखा है. छुआछूत के इस विषय वर्तमान समय में शोध करने वाले डा. भीमराव अम्बेडकर हैं. वें अपनी पुस्तक ‘अछूत कौन व कैसे’ में लिखते हैं कि वेदों में सामाजिक छुआछूत का उल्लेख नही है. वें आगे लिखते हैं कि 400 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में सामाजिक छुआछूत का कोई उदाहरण नही मिलता है. सबसे महत्वपूर्ण बात डा. अम्बेडकर लिखते हैं कि हिन्दू समाज अस्पृश्यता और अपवित्रता की घटनाओं में अंतर नही कर पाता है. राईटिंग एण्ड स्पीचेज आफ डा. अम्बेडकर के पेज 318 – 319 पर डा. अम्बेडकर ‘कादम्बरी’ उपन्यास का उल्लेख करते है. यह उपन्यास 600 ई. शताब्दी में लिखा गया था. इसके लेखक वाणभट्ट नामक ब्राह्मण हैं. इस उपन्यास में एक पात्र है चाण्डाल का. उस चाण्डाल की एक पुत्री है. उपन्यासकार ने चांडाल की उस पुत्री की सुन्दरता बखान करने में किसी भी उपमा की कोई कमी नही है. इतना ही नही उस चाण्डाल पुत्री को उपन्यासकार ने ‘राजकुमारी’ लिखता है. इसी उपन्यास में एक वैशम्पायन नामक तोते की चर्चा है जिसे उस चांडाल राजकुमारी ने पाला था. इन दोनों को लेकर ब्राह्मणराज शूद्रक के दरबार में जाते हैं और राजा को दोनों की विशेषता बताकर राजा से उन दोनों को स्वीकार करने का आग्रह करते हैं जिसे राजा ने सहजता से स्वीकार कर लिया. इस कथा का यह तात्पर्य है कि 600 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में पवित्रता – अपवित्रता का व्यवहार भले ही होने लगा हो परंतु समाज में अस्पृश्यता नही थी अन्यथा राजा के दरबार में किसी चांडाल पुत्री का प्रवेश ही नही होता साथ ही उपन्यासकार ने चांडाल पुत्री को ‘राजकुमारी’ कहा है अर्थात उस समय तक चांडालों के भी राज्य हुआ करते थे. इन सभी तथ्यों के आलोक में अध्ययन करने पर हमें यह ज्ञात होता है कि 712 ई. के पूर्व तक भारतीय समाज में अस्पृश्यता नही थी.
सर्वप्रथम भारत की धरती पर 712 ई. में सामाजिक छुआछूत का प्रवेश हुआ क्योंकि मोहम्मद बिन कासिम से पराजित होने के उपरांत राजा दाहिर की पत्नी ने ‘जौहर’ अर्थात आग में स्वेच्छा से जिन्दा जल जाना, किया था. जौहर से पूर्व रानी ने भगवान से प्रार्थना की थी कि हे भगवान ! मुझे क्षमा करना क्योंकि मैं इन आउट्कास्ट और काऊ ईटर अर्थात गाय खाने वाले तथा विजातीय लोगों के चंगुल में नही पडना चाहती अत: अपने अपको अग्नि को समर्पित कर रही हूँ. इससे पूर्व भी भारत में विदेशी आए परंतु किसी ने उनका बहिष्कार नही किया. अधिकांश समाविष्ट कर लिए गए और जिन्हे समाविष्ट नही किया जा सका उनके साथ भी रोटी – बेटी का संबंध जोडा गया. यवन सेनापति सैल्यूकस की बेटी का सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ विवाह सर्वविदित है. इतिहासकार लिखते हैं कि साधारण मुसलमान भी अपने घरों में 15 – 20 स्त्रियाँ रखता था. मुसलमानों में बुर्का परम्परा थी इस कारण वें इन्हे बाहर नही जाने देते थे. परिणामत: इन्हें अपने घरों में ही महिलाओं के लिए पाखाने बनाने पडे. चूँकि ये सभी भारत में विजेता के रूप में थे अत: मैला उठाने का काम ये लोग नही करते थे वरन जो लोग राजनैतिक रूप से बंदी बनाए जाते थे उनके सामने ये विजेता शासक दो शर्त रखते थे – या तो ईस्लाम स्वीकार करो या तो उनके घरों का मैला उठाओ. भारतीय समाज के लम्बे जीवनकाल में यह एक अनूठा अनुभव था क्योंकि भारत के घरों में, भारतीय राजे – रजवाडों में कभी भी किसी शौचालय के व्यवस्था की चर्चा नही है. इतिहासकार भी इस बात की पुष्टि करते हैं हडप्पा, मोहनजोदडों में भी स्नानागार जैसे बहुत सारी चीजें खुदाई में मिली हैं परंतु शौचालय का स्थान उन्हें नही मिला.
       चूँकि धीरे – धीरे सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई ने पूरे भारत को अपने चंगुल में जकड लिया था. स्वतंत्रता पश्चात भी सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई को खत्म नही किया जा सका. अत: माधव सदाशिव गोलवरकर ‘श्री गुरू जी’, श्री आप्टे व स्वामी चिन्मयानन्द जी समेत अन्य वरिष्ठ चिंतकों द्वारा शुरू किए गए विश्व हिन्दू परिषद नामक संस्था के 13 – 14 दिसम्बर 1969 के कर्नाटक प्रांत के उड्डुप्पी सम्मेलन में श्री गुरू जी ने कहा कि भारत जैसे धर्मपरायण देश में समाज से छुआछूत हटाने का प्रयास धर्मगुरुओं के बिना संभव नही है. अत: आम लोगों के मन से छुआछूत हटाने के लिए यह आवश्यक है कि संत समाज इसके लिए लोगों का आह्वान करें. इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए हुए संत समाज ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ समाज के विघटन के कारण ही होती हैं. इसी सम्मेलन से ‘न हिन्दू पतिति भवेत’ (हिन्दू कभी पतित नही हो सकता), ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे’ (सभी हिन्दू भाई – भाई हैं), ‘मम दीक्षा हिन्दू रक्षा’ (मेरी दीक्षा हिन्दुओं की रक्षा है) तथा ‘मम मंत्र समानता’ (मेरा मंत्र समानता का है) की आवाज उठाई गई. कालन्तर में विहिप ने अस्पृश्यता निवारण आन्दोलन का कार्यक्रम चलाया. वर्ष 1970 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में विहिप अधिवेशन में अस्पृश्यता निवारण को लेकर बहुत चिंता जाहिर की गई थी. सामाजिक समरसता कार्यक्रम को बढाते हुए कालांतर में विहिप के 10 नवम्बर, 1989 अयोध्या में शिलान्यास का पूजन कार्यक्रम विहिप – बिहार प्रांत के तत्कालीन संगठन मंत्री श्री कामेश्वर चौपाल जो कि अनुसूचित जाति से थे, के हाथों करवाया गया. इतना ही नही वर्ष 1994 ई. में काशी में आयोजित धर्म संसद अधिवेशन में काशी के डोम राजा को सम्मानित भी किया गया. इस प्रकार विश्व हिन्दू परिषद अपने सामाजिक समरसता के एजेंडे पर अनवरत आगे बढता हुआ नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.

-          राजीव गुप्ता 

1 टिप्पणी:

Himanshu ने कहा…

जाती आधारित छुआ छूट और जाती प्रथा भारत और हिन्दू समाज के लिये सबसे हानिकारक हैं। इनसे हम जितनी जल्दी छुटकारा पा जायें उतना अच्छा।