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बुधवार, 17 सितंबर 2014

समानता और समरसता


भारत की गुलामी के कालखंड में भारतीय शास्त्रों पर टीकाकारों ने कई टीकाएँ लिखा. उन्हीं कुछ टीकाओं में से शब्दों के वास्तविक अर्थ अपना मूल अर्थ खोते चले गए. इतना ही नही मनुस्मृति में भी मिलावट की गई. डा. पी.वी. काने की समीक्षा के अनुसार मनुस्मृति की रचना ईसापूर्व दूसरी शताब्दी तथा ईसा के उपरांत दूसरी शताब्दी के बीच कभी हुई होगी (धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड1, तृ. सं. 1980, पृ.46). परंतु रचनाकाल से मेधातिथि के भाष्य तक (9वीं सदी) इसमें संशोधन एवं परिवर्तन होते आ रहें हैं. मेधातिथि के भाष्य की कई हस्तलिखित प्रतियों में पाए जाने वाले अध्यायों के अंत में एक श्लोक आता है जिसका अर्थ टपकता है कि सहारण के पुत्र मदन राजा ने किसी देश से मेधातिथि की प्रतियाँ मंगाकर भाष्य का जीर्णोद्धार कराया (डा. काने, वही, पृ. 69). गंगनाथ झा ने भी मेधातिथि भाष्य पर लिखित अपनी पुस्तक की भूमिका मे कहा कि कोई मान्य मनुस्मृति थी और उसकी मेधातिथिकृत उचित व्याख्या थी. मेधातिथि व्याख्या सहित वह मनुस्मृति कहीं लुप्त हो गई और कहीं मिलती न थी. तब मदन राजा ने इधर-उधर से लिखवाई हुई कई पुस्तकों से उसका जीर्णोद्धार करवाया (पं. धर्मदेव, स्त्रियों का वेदाध्ययन और वैदिक कर्म काण्ड में अधिकार, पृ. 133). एक उदाहरण से हम और अधिक समझ सकते हैं, जैसे जाति को परिभाषित करते हुए महर्षि गौतम कहते हैं कि समान प्रसवात्मिका जाति:” (न्याय दर्शन – 2.2.70) न्याय दर्शन में यह बताया गया है कि अर्थात जिनके जन्म लेने की विधि एवं प्रसव एक समान हों, वे सब एक जाति के हैं. यहाँ समान प्रसव का भाव है कि जिसके संयोग से वंश चलता हो व जिन प्राणियों की प्रसव विधि, आयु और भोग एक समान हों. जाति का एक दूसरा लक्षण भी है – आकृति जाति लिंग:, समान आकृति अर्थात जिन प्रणियों की आकृति एक समान हो, वे एक जाति के हैं. इस परिभाषा के अनुसार मनुष्य, हाथी, घोडे की विभिन्न आकृति होने के कारण उनकी विभिन्न जातियाँ हैं. परंतु विश्व के सभी मानवों की आकृति एक जैसी होने के कारण सभी मनुष्य एक ही जाति के हैं, भले ही जलवायु, स्थान इत्यादि के कारण कुछ भिन्नता दिखाई दे. सांख्य दर्शनाचार्य महर्षि कपिल के अनुसार – मानुष्यश्चैक विधि:, अर्थात सभी मनुष्य एक प्रकार या एक जाति के ही हैं. अत: विश्व के काले, गोरे, सभी मतावलंबी एक ही जाति अर्थात मानव जाति के ही हैं. फिर हिन्दू मान्यता में इतनी सारी जातियों की बाढ सी कैसे और कहाँ से आ गई ? यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है. 
     हिन्दू मान्यताओं में इन जातियों का आधार इनके दैनिक क्रियाकलापों के कारण उन पर अध्यारोपित है, जो कि व्यवसायानुसार बदलती रहती हैं. भारतीय मान्यताओं में आज जो हम जाति का रूप देखते है कि ब्राह्मण की संतान ब्रह्मण व शूद्र की संतान शूद्र ही होगी वास्तव में यह मात्र एक सामाजिक विकृति और बुराई हैं. समाज की इसी विकृति और बुराई को जन्मना वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है जिसकी आलोचना चहुँ ओर होती है, जो कि सर्वथा उचित ही है. मनुस्मृति में जाति शब्द का अर्थ ‘जन्म’ से है; जैसे जाति अन्धवधिरौ – जन्म से अन्धे बहरे. मनुस्मृति ही नहीं, वेदों के अलावा, लगभग सभी हिन्दू धर्म-ग्रंथों में मिलावट की गई. प्राचीनकाल में हस्तलिखित पांडुलिपियों का चलन था, जिनमें श्लोकों का बढाना या घटाना बहुत ही आसान था. स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि जिस दिन से भारतीय समाज में जन्मना वर्ण-व्यवस्था ने अपनी जडे गहरी की और समाज में अस्पृश्यता जैसी कई प्रकार की कुरीतियों ने जन्म लिया और उनके बीच परस्पर आदान-प्रदान बन्द हुआ जिससे समाज में परस्पर ‘भेद’ की खाई गहरी होती गई, उसी दिन भारत के दुर्भाग्य का जन्म हुआ. समाज में व्यापत इस प्रकार की सभी कुरीतियों को आसानी से मिटाया भी जा सकता है क्योंकि ये सभी कुरीतियाँ अस्थायी और कुछ व्यक्ति-विशेष के स्वार्थ से ही ओतप्रोत हैं क्योंकि मेरा यह मानना है कि कोई भी समाज अधिक दिन तक आपस में संवादहीन नही रह सकता. इसलिए तन्द्रा में पडी अपने अतीत की कीर्ति और स्वत्व को बिसरी हुई जनता में नवजीवन का संचार तभी हो सकता है जब वह अपने अतीत के गौरव की ओर जाना शुरू कर दे. जिस प्रकार जलते हुए बिजली के बल्ब के ऊपर धूल जमने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह बल्ब अपर्याप्त रोशनी दे रहा है, और धूल के साफ होते ही वह बल्ब पर्याप्त रोशनी से जगमगाता हुआ हमें प्रतीत होता है. ठीक उसी प्रकार हमारे भारतवर्ष की जनता है. एक बार इन्हे अपने स्वर्णिम इतिहास के स्वत्व से इनका साक्षात्कार हो जाये तो विश्व-कल्याण और पूरी वसुधा को परिवार मानने वाली यह भारतीय संस्कृति अपनी भारतमाता को पुन: उसी सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा देगी जहाँ कभी वह आरूढ थी. बस भारतीय समाज की आत्मा को झझकोरने भर की देर है.                   
    रघुनन्दन प्रसाद शर्मा की पुस्तक प्रेरणा के अमर स्वर नामक पुस्तक के अनुसार 22 अक्टूबर, 1972 को गुजरात के सिद्धपुर में आयोजित विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन को उदबोधित करते हुए माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ ने कहा कि हिन्दू समाज के सभी घटकों में परस्पर समानता की भावना के विद्यमान रहने पर ही उनमें समरसता पनप सकेगी. हम सभी जानते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद समाज को एक सूत्र में गूँथने का कार्य कर रही है. वहाँ उपस्थित लोगों द्वारा दलित, उपेक्षित जैसे शब्दों का उपयोग कर समाज के एक बहुत बडे वर्ग की सामाजिक दशा के उल्लेख पर श्री गुरू जी ने कहा कि समाज के पिछ्ले कुछ वर्षों में जैसी दशा रही है उसके परिणामस्वरूप समाज का एक बहुत बडा वर्ग व्यवहारिक शिक्षा से वंचित रह गया है. इसलिए इस उपेक्षित समाज की अर्थ – उत्पादन क्षमता भी कम हो गई है और उसे दैन्य – दारिद्रय का सामना करना पड रहा है. पूर्व काल में इस समाज को पूरा सम्मान प्राप्त था. पंचायत व्यवस्था में भी इस समाज का प्रतिनिधित्व रहता था. प्रभू रामचन्द्र की राज्यव्यवस्था का जो वर्णन आता है, उसमें भी चार वर्णों के चार प्रतिनिधि और पाँचवाँ निषाद अर्थात अपने इन वनवासी बन्धुओं के  प्रतिनिधि मिलकर पंचायत का उल्लेख आता है. परंतु कालांतर में हम वनवासी बन्धुओं का प्राक्रमी इतिहास को भूल बैठे. इस स्थिति में विश्व हिन्दू परिषद के नाते इन बन्धुओं के प्रति, जो दलित – उपेक्षित कहलाते हैं, अपना ध्यान आकर्षित होना और वें हमारे समकक्ष आकर खडे हो सकें ऐसा प्रयत्न करना बिल्कुल स्वाभाविक और अपेक्षित ही है. इस समस्या की ओर गत कई वर्षों से लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है. भारतीय संविधान में इस समस्या का उल्लेख भी हुआ है कि छुआछूत एक दण्डनीय अपराध है परंतु डंडे के बल पर समाज में समरसता नही आती है. 
    महात्मा गाँधी ने समाज द्वारा उपेक्षित इस वर्ग के लिए ‘हरिजन’ नाम प्रचलित किया. यह नाम बहुत अच्छा और सरल था परंतु इस नाम के अर्थ पर भी हमें ध्यान देना चाहिए. समाज का यह वर्ग यदि हरिजन हुआ तो बाकि समाज के लोगों के लिए क्या संबोधन किया जाय ? क्या वें सभी लोग राक्षसजन या दैत्यजन हैं ? हरिजन का शाब्दिक अर्थ है हरि अर्थात भगवान विष्णु और जन का अर्थ है - लोग, इस प्रकार हरिजन तो हम सभी हैं. जाने – अंजाने में ही सही परंतु महात्मा गाँधी ने इस उपेक्षित समाज को नया नाम दे दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि समाज अब दो विभिन्न वर्गों में विभाजित हो गया – एक हरिजन दूसरा गैर – हरिजन. यद्दपि अलग नाम से समाज में पृथकता की भावना और बलवती होती है. समाज में समरसता किसी विभाजन से नही आती अपितु उनके साथ रोटी – बेटी का संबंध रखने से आती है. श्री गुरू जी ने अपने अनुभव में कहा है कि एक बार उनसे मिलने के महात्मा गाँधी के द्वारा कहे जाने वाले हरिजन के एक नेता आए. उन नेता जी ने कहा कि अलग अस्तित्व के कारण उन्हें कुछ विशेष ‘राईट्स एण्ड प्रिविलेजेस’ मिलते हैं. भारतीय भाषाओं में ‘राईटस’ शब्द का पर्यायवाची शब्द नही है. क्योंकि भारत में हमेशा ‘राईट्स’ के लिए नही अपितु कर्तव्य के लिए संघर्ष हुआ है. उदाहरण के लिए ब्राह्मण का कर्तव्य है ज्ञान देना यदि वह ऐसा नही करता है तो उसके लिए कहा जाता है कि ब्राह्मण अपने कर्तव्य से पतित हो गया है. इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि पृथकता बनाए रखने में स्वार्थ निर्माण हो चुके हैं. इसलिए हमें अब यह मान लेना चाहिए कि अस्पृश्यता एक सामाजिक आन्दोलन है राजनीतिक लोग अपनी राजनैतिक सत्ता प्राप्ति करने हेतु इस सामाजिक आन्दोलन का उपयोग करते हैं. परिणामत: सामाजिक बुराई का खात्मा जागरूक समाज द्वारा ही किया जा सकता है तब जाकर समाज में वास्तविक समरसता का भाव उत्पन्न होगा.
-          राजीव गुप्ता

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अस्पृश्यता निवारण – विहिप का उड्डुपी सम्मेलन


       रामफल सिंह ‘रामजी भाई’ ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन धर्मयोद्धा में लिखा है कि दुनिया में एकमात्र हिन्दू समाज ही ऐसा है जिसकी रचना पारिवारिक भावभूमि पर हुई है. हमारे समाज रचनाकार महान पूर्वजों ने कहा है कि ‘माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या’ अर्थात यह भारत भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं. इस भावभूमि से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अर्थात पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है, की परिकल्पना अस्तित्व में आई. भारत का यह समाज मात्र चिंतन – मनन तक ही सीमित नही रहा अपितु भारतीय मनीषी संसार के कोने – कोने में मानवता का सन्देश लेकर निकल पडे. कुछ समय पूर्व से भारतीय समाज की वर्ण – व्यवस्था के अनुसार शूद्र वर्ण को अस्पृश्य माना जाने लगा. ‘कृणवंतो विश्वमार्यम’ अर्थात विश्व को श्रेष्ठ बनाएँगें, का उदघोष करने वाली भारतीय संस्कृति में अस्पृश्यता का जन्म कब और कैसे हुआ ? क्या कोई सभ्य समाज जो मानव कल्याण का पक्षधर हो वह समाज में अस्पृश्यता जैसी कुरीति का पक्षधर होगा ? कदापि नही ! समाज में आई इस कुरीति के इतिहास के बारें में जानने पर ज्ञात हुआ कि यह बात सर्वविदित है कि सामाजिक छुआछूत भारतीय समाज का कभी भी अंग नही रहा है. भारतीय समाज में इस कुरीति को हल्के ढंग से नही लिया जा सकता क्योंकि यह कुरीति भारत के स्वर्णिम अतीत पर कुठाराघात करती है. रामजी भाई ने अपने शोध के आधार पर अपनी इसी पुस्तक में इस चर्चा को आगे बढाते हुए लिखते है कि भारतीय समाज की वास्तविक दशा को जानने के लिए हमें 712 ई. के पूर्व में जाना पडेगा. उस समय भारत में दो प्रमुख आन्दोलन हुए – बौद्ध आन्दोलन और जैन आन्दोलन. ये दोनों ही आन्दोलन अपने कालखंड के समाज में व्यापत बुराईयों को दूर करने के लिए हुए थे परंतु इन दोनों आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता की चर्चा तक नही है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उस समय तक सामाजिक अस्पृश्यता का अस्तित्व नही था अन्यथा दोनों ही अवतारी पुरुषों के नेतृत्व में चलने वाले आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को अनदेखा नही किया जा सकता था. वर्तमान समय में इन दोनों ही अवतारी पुरुषों को भारतीय समाज भगवान मानकर इनकी उपासना करता है.
      परंतु 712 ई. के पश्चात शायद ही ऐसा कोई कालखंड हो जिसमें सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को दूर करने का प्रयास न किया गया हो. राजाओं, संतो, सामाजिक संगठनों तथा मध्यकाल के भक्ति आन्दोलनों के द्वारा इस बुराई को दूर करने की कोशिश भी की गई थी. इसके उपरांत लगभग 500 वर्षों तक सिखों का आन्दोलन चला, तत्पश्चात गत 130 वर्षों से आर्यसमाज, महात्मा गाँधी समेत कई महापुरुषों द्वारा तथा गत कई दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का अनवरत सामाजिक आन्दोलन चला रखा है. छुआछूत के इस विषय वर्तमान समय में शोध करने वाले डा. भीमराव अम्बेडकर हैं. वें अपनी पुस्तक ‘अछूत कौन व कैसे’ में लिखते हैं कि वेदों में सामाजिक छुआछूत का उल्लेख नही है. वें आगे लिखते हैं कि 400 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में सामाजिक छुआछूत का कोई उदाहरण नही मिलता है. सबसे महत्वपूर्ण बात डा. अम्बेडकर लिखते हैं कि हिन्दू समाज अस्पृश्यता और अपवित्रता की घटनाओं में अंतर नही कर पाता है. राईटिंग एण्ड स्पीचेज आफ डा. अम्बेडकर के पेज 318 – 319 पर डा. अम्बेडकर ‘कादम्बरी’ उपन्यास का उल्लेख करते है. यह उपन्यास 600 ई. शताब्दी में लिखा गया था. इसके लेखक वाणभट्ट नामक ब्राह्मण हैं. इस उपन्यास में एक पात्र है चाण्डाल का. उस चाण्डाल की एक पुत्री है. उपन्यासकार ने चांडाल की उस पुत्री की सुन्दरता बखान करने में किसी भी उपमा की कोई कमी नही है. इतना ही नही उस चाण्डाल पुत्री को उपन्यासकार ने ‘राजकुमारी’ लिखता है. इसी उपन्यास में एक वैशम्पायन नामक तोते की चर्चा है जिसे उस चांडाल राजकुमारी ने पाला था. इन दोनों को लेकर ब्राह्मणराज शूद्रक के दरबार में जाते हैं और राजा को दोनों की विशेषता बताकर राजा से उन दोनों को स्वीकार करने का आग्रह करते हैं जिसे राजा ने सहजता से स्वीकार कर लिया. इस कथा का यह तात्पर्य है कि 600 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में पवित्रता – अपवित्रता का व्यवहार भले ही होने लगा हो परंतु समाज में अस्पृश्यता नही थी अन्यथा राजा के दरबार में किसी चांडाल पुत्री का प्रवेश ही नही होता साथ ही उपन्यासकार ने चांडाल पुत्री को ‘राजकुमारी’ कहा है अर्थात उस समय तक चांडालों के भी राज्य हुआ करते थे. इन सभी तथ्यों के आलोक में अध्ययन करने पर हमें यह ज्ञात होता है कि 712 ई. के पूर्व तक भारतीय समाज में अस्पृश्यता नही थी.
सर्वप्रथम भारत की धरती पर 712 ई. में सामाजिक छुआछूत का प्रवेश हुआ क्योंकि मोहम्मद बिन कासिम से पराजित होने के उपरांत राजा दाहिर की पत्नी ने ‘जौहर’ अर्थात आग में स्वेच्छा से जिन्दा जल जाना, किया था. जौहर से पूर्व रानी ने भगवान से प्रार्थना की थी कि हे भगवान ! मुझे क्षमा करना क्योंकि मैं इन आउट्कास्ट और काऊ ईटर अर्थात गाय खाने वाले तथा विजातीय लोगों के चंगुल में नही पडना चाहती अत: अपने अपको अग्नि को समर्पित कर रही हूँ. इससे पूर्व भी भारत में विदेशी आए परंतु किसी ने उनका बहिष्कार नही किया. अधिकांश समाविष्ट कर लिए गए और जिन्हे समाविष्ट नही किया जा सका उनके साथ भी रोटी – बेटी का संबंध जोडा गया. यवन सेनापति सैल्यूकस की बेटी का सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ विवाह सर्वविदित है. इतिहासकार लिखते हैं कि साधारण मुसलमान भी अपने घरों में 15 – 20 स्त्रियाँ रखता था. मुसलमानों में बुर्का परम्परा थी इस कारण वें इन्हे बाहर नही जाने देते थे. परिणामत: इन्हें अपने घरों में ही महिलाओं के लिए पाखाने बनाने पडे. चूँकि ये सभी भारत में विजेता के रूप में थे अत: मैला उठाने का काम ये लोग नही करते थे वरन जो लोग राजनैतिक रूप से बंदी बनाए जाते थे उनके सामने ये विजेता शासक दो शर्त रखते थे – या तो ईस्लाम स्वीकार करो या तो उनके घरों का मैला उठाओ. भारतीय समाज के लम्बे जीवनकाल में यह एक अनूठा अनुभव था क्योंकि भारत के घरों में, भारतीय राजे – रजवाडों में कभी भी किसी शौचालय के व्यवस्था की चर्चा नही है. इतिहासकार भी इस बात की पुष्टि करते हैं हडप्पा, मोहनजोदडों में भी स्नानागार जैसे बहुत सारी चीजें खुदाई में मिली हैं परंतु शौचालय का स्थान उन्हें नही मिला.
       चूँकि धीरे – धीरे सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई ने पूरे भारत को अपने चंगुल में जकड लिया था. स्वतंत्रता पश्चात भी सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई को खत्म नही किया जा सका. अत: माधव सदाशिव गोलवरकर ‘श्री गुरू जी’, श्री आप्टे व स्वामी चिन्मयानन्द जी समेत अन्य वरिष्ठ चिंतकों द्वारा शुरू किए गए विश्व हिन्दू परिषद नामक संस्था के 13 – 14 दिसम्बर 1969 के कर्नाटक प्रांत के उड्डुप्पी सम्मेलन में श्री गुरू जी ने कहा कि भारत जैसे धर्मपरायण देश में समाज से छुआछूत हटाने का प्रयास धर्मगुरुओं के बिना संभव नही है. अत: आम लोगों के मन से छुआछूत हटाने के लिए यह आवश्यक है कि संत समाज इसके लिए लोगों का आह्वान करें. इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए हुए संत समाज ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ समाज के विघटन के कारण ही होती हैं. इसी सम्मेलन से ‘न हिन्दू पतिति भवेत’ (हिन्दू कभी पतित नही हो सकता), ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे’ (सभी हिन्दू भाई – भाई हैं), ‘मम दीक्षा हिन्दू रक्षा’ (मेरी दीक्षा हिन्दुओं की रक्षा है) तथा ‘मम मंत्र समानता’ (मेरा मंत्र समानता का है) की आवाज उठाई गई. कालन्तर में विहिप ने अस्पृश्यता निवारण आन्दोलन का कार्यक्रम चलाया. वर्ष 1970 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में विहिप अधिवेशन में अस्पृश्यता निवारण को लेकर बहुत चिंता जाहिर की गई थी. सामाजिक समरसता कार्यक्रम को बढाते हुए कालांतर में विहिप के 10 नवम्बर, 1989 अयोध्या में शिलान्यास का पूजन कार्यक्रम विहिप – बिहार प्रांत के तत्कालीन संगठन मंत्री श्री कामेश्वर चौपाल जो कि अनुसूचित जाति से थे, के हाथों करवाया गया. इतना ही नही वर्ष 1994 ई. में काशी में आयोजित धर्म संसद अधिवेशन में काशी के डोम राजा को सम्मानित भी किया गया. इस प्रकार विश्व हिन्दू परिषद अपने सामाजिक समरसता के एजेंडे पर अनवरत आगे बढता हुआ नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.

-          राजीव गुप्ता 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

विहिप की सामाजिक – समरसता


समाजशास्त्रियों के अनुसार सामाजिक समूहों में मिलजुलकर रहने के कारण मनुष्य को सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी गई है. उनका मानना है कि मिलजुलकर रहने से सभी प्रकार के छोट – बडे समूहों में रहने वाले सामाजिक प्राणियों के बीच टकराव की स्थिति भी आती है. परिणामत: इन छोटे – बडे समूहों के बीच विशेष प्रकार की मान्यताओं व विचारों का जन्म होता है जो कि कालांतर तक चलता रहता है. बुद्धिजीवियों के बीच चल रहे तरह – तरह के सामाजिक चिंतन को ही समाजशास्त्र के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है. जीवों की उत्पत्ति नामक पुस्तक के लेखक डार्विन के मन में भी विचार आया कि मानव – समाज का भी अध्ययन होना चाहिए और आगस्ट काम्ट, हर्बर्ट स्पेंशर जैसे समाजशास्त्रियों का मत रहा कि मानव समाज का अध्ययन रसायन और भौतिकी विज्ञान की तरह वैज्ञानिक तरीके से भी किया जा सकता है. उनके इस चिंतन का विरोध भी हुआ क्योंकि कुछ चिंतकों का मत था कि मनुष्य की भावनाओं, ईच्छाओं व उसकी मान्यताओं को विज्ञान की कसौटी पर नही परखा जा सकता. इस विचार के आलोक में मैक्स बेबर, कार्ल मैनेहाईम जैसे विचारकों ने एक नए मिले – जुले विचार का प्रतिपादन किया. उनका मानना था कि समाज और मनुष्य को अलग – अलग स्वतंत्र सत्ता मानकर मानव – समाज का अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जा सकता है. इन विचारकों के अनुसार एक तरफ समाज में पाए जाने वाले मूल्यों, विचारों व भावनाओं, संस्कृतियों तथा उनकी भावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है तो दूसरी तरफ मानव के व्यक्तित्व का अध्ययन मनोवैज्ञानिक तरीके से किया जा सकता है.
स्वामी विवेकानन्द , पं. दीनदयाल उपाध्याय, माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ जैसे अनेक भारतीय चिंतकों ने समाज का समग्रता पूर्वक अध्ययन कर समाज की एक नई अवधारणा के धागे में पिरोया जिसे सामाजिक समरसता के नाम से जाना गया. भारत के इन चिंतकों का मत था कि संसार की सभी जीवों में अपनी चिंतन शैली के कारण मनुष्य सर्वश्रेष्ठ जीव है और भारतीय मनीषियों ने मनुष्य़ के अंत:करण की शुद्धता और उसकी पवित्रता पर अत्याधिक जोर दिया है. इसलिए उन्होनें कहा कि मानव में मानवीयता का भाव सदैव रहना ही चाहिए. उसके प्रत्येक कार्य में समाज की भलाई ही सर्वोपरि होना चाहिए. इसकी चर्चा भारतीय वेद – पुराणों की श्रुतियों में मिलती है. इतना ही नही उपासना हेतु बनाए गए देवालयों के पुजारी आज भी अपने ईष्ट की उपासना के पश्चात सभी सुखी हों, प्राणियों में सदभावना हो और विश्व का कल्याण हो नामक उदघोष लगवाते हैं. तात्पर्य यह है कि विश्व – कल्य़ाण हेतु मनुष्यों में परस्पर सदभावना का चिंतन होना चाहिए. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण विज्ञान की भाँति किसी भी प्रकार के घर्षण, क्रिया – प्रतिक्रिया की अपेक्षा उसका प्रत्येक दृष्टिकोण सामाजिक ही होना चाहिए. अत: मोहनदास करमचन्द गांधी ने सर्वोदय और पं. दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का सिद्धांत दिया. सामाजिक सदभावना के इस आलोक में श्री गुरू जी ने पाया कि भारत के लोग अपनी मूल सिद्धांतों से दूर होते जा रहे हैं. उनमें परस्पर वैमनस्य का भाव निरंतर बढ रहा है. वर्ण – व्यवस्था की बुनियाद पर रखे गए स्वस्थ समाज की परिकल्पना को विभिन्न सामाजिक कुरीतियों ने घेर लिया है. समाज की वर्ण – व्यवस्था के सिद्धांत को कुछ प्रभावशाली लोगों ने जाति – प्रथा में बदल दिया है. परिणामत: भारतीय समाज का ताना – बाना चरमरा गया. इतना ही नही जाति – प्रथा के आधार पर भारतीय समाज पर छुआछूत नामक एक वीभत्स रोग ने आक्रमण कर दिया है. हमारे समरस समाज में असमानता, ऊँच – नीच का ज़हर घोल दिया गया. इतना ही नही इन कुटिल प्रभावशाली लोगों के चलते हमारे समाज में से उसके स्वत्व – भाव का लोप करवाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विश्व में कभी भारतीय संस्कृति का परचम लहराने वाली सभ्यता सामाजिक कुरीतियों के चलते मात्र नौकरी – चाकरी के उद्देश्य से विश्व में भ्रमण करने वाली बनकर रह गई. अपनी इस व्यथा को श्री गुरू जी ने मुम्बई के सान्दीपनी साधनालय में जन्माष्टमी महोत्सव के दिन 29 अगस्त, 1964 को विश्व हिन्दू परिषद के गठन के शुभ अवसर पर प्रकट करते हुए कहा कि भारत के पूर्वकाल और आधुनिक काल का यदि हम अपनी आँखों के सामने रखें तो हमारे अंत:करण में यह बात दुखदायी होगी कि विश्व के कोने – कोने में हमारी संस्कृति का प्रभाव एक विजेता के रूप में था और पिछले सौ – डेढ सौ वर्षों में हम विश्व के कोने – कोने में मजदूर के रूप में चाकरी करने के उद्देश्य हीन प्रवृत्तियों को लेकर गए. इसी बैठक में मास्टर तारा सिंह ने त्तत्कालीन सामाजिक स्थिति का अवलोकन करते हुए बताया कि पंजाब में सिख और हिन्दुओं को अलग – अलग माना जाता है. सिखों का उत्थान तभी संभव है जबतक हिन्दू धर्म जीवित है. हमें नही भूलना चाहिए कि सिख तो महान हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है. गुरू गोविन्द सिंह ने हिन्दू शास्त्रों और पुराणों से ही ज्ञान एवं दर्शन लेकर गुरुमुखी में उसका निरुपण किया. तात्पर्य यह है कि सनातन धर्म को मानने वाला भारतीय समाज वर्ष 1964 तक आते – आते बौद्ध, जैन, सिख जैसे कई पंथों में बँट चुका था और समाज में कई प्रकार की जातियाँ उत्पन्न हो चुकी थी जिसने कालांतर में परस्पर सामजिक वैमनस्य को ही बढाया. परिणामत: सामाजिक सदभाव की अत्यंत आवश्यकता और महत्ता को समझते हुए भारतीय चिंतकों ने भारत की समाज व्यवस्था की विभिन्न कुरीतियों को दूर करने का सदियों से चला आ रहा भारतीय पथ, सामाजिक सदभाव को अंगीकार किया. महर्षि दयानंद के चिंतन ‘वेदों की ओर लौटो’ के मार्ग पर चलने की आवश्यकता है. प्राचीन भारत में वर्ण – व्यवस्था नामक सामाजिक व्यवस्था से समाज का ताना – बाना बुना था. आज भी संसार के सभी देशों में समाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु विभिन्न नामों से कोई न कोई व्यवस्था अवश्यमेव ही है. हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग स्वतंत्र रूप से अस्तित्व – हीन है अर्थात विभिन्न अंग सामूहिक रूप से मिलकर ही शरीर का निर्माण करते है उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने आप में स्वतंत्र रहकर अस्तित्व हीन ही है क्योंकि किसी भी मानव का स्थिति और उसका विकास समाज अर्थात सामूहिकता में ही होता है. इसलिए हमें समाज के बारें में चिंतन करते समय उसके सामाजिक प्रारूप तथा उसके अंत:करण की शुद्धता को नही भूलना चाहिए. विज्ञान की भाँति हम समाज की अवधारणा को तो विज्ञान की तराजू पर तौल तो नही सकते परंतु भारत में सामाजिक समरसता को बढाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार तथा अन्य गैर सरकारी सामाजिक संगठनों को इस दिशा में पहल करना चाहिए. सामाजिक सामंजस्य के इस चिंतन को ध्यान में रखकर विश्व हिन्दू परिषद ने  अपने पंजीकृत संविधान में लिखे गए उद्देश्य के अनुरूप देश भर में सामाजिक समरसता नाम का अपना एक आयाम भी शुरू किया है. इसके अंतर्गत विहिप समय – समय पर महर्षि बाल्मीकि व सिद्धू – कान्हू रथ यात्राएँ निकालता है, विद्यालय, छात्रावास, पुस्तकालय, बाल संस्कार केन्द्र, औषधि केन्द्र, सिलाई केन्द्र, सत्संग, मन्दिर संस्कार केन्द्र और सामाजिक कुरीति, दुर्व्यसन मुक्ति अभियान जैसे कार्य करता है. विश्व हिन्दू परिषद का सामाजिक समरसता नामक प्रयास वास्तव में एक प्रशंसनीय कदम है.                       

-          राजीव गुप्ता