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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

अस्पृश्यता – सामाजिक विकृति


भारत एक प्राचीन देश है. यहाँ की सभ्यता – संस्कृति अपेक्षाकृत अत्यंत पुरानी है. साथ ही प्रकृति सम्मत होने के कारण भारत का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है. भारत के रंग – बिरंगे त्योहारों, यहाँ की अनेक बोलियाँ, विभिन्न प्रकार के परिधानों इत्यादि के कारण इसे बहुधा विविधताओं का देश कहा जाता है. यहाँ पर एक तरफ रेगिस्तान है तो दूसरी तरफ संसार का सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूँजी भी है, कश्मीर जैसा बर्फीला क्षेत्र है तो तमिलनाडू जैसा समुद्री क्षेत्र भी है. तात्पर्य यह है कि भारत में संसार की लगभग सभी प्रकार की ऋतुएँ विद्यमान हैं. संसार में भारत ही मात्र ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की छ: ऋतुएँ पाई जाती हैं. कालांतर में भारत पर अनेक सभ्यताओं का आक्रमण हुआ परंतु वें सभी सभ्यताएँ भारत में आकर भारत की ही हो गईँ. भारत ने सभी सभ्यताओं को अंगीकार कर उनका भारतीयकरण कर लिया. शिक्षा – व्यवस्था के क्षेत्र में भारत में गुरू – शिष्य परंपरा सदियों से रही है अर्थात ज्ञान का अर्जन सुनकर किया जाता था. हमारे विभिन्न वेदों में इस प्रकार के ज्ञान को श्रुति कहा गया है. लिखित लिपि को यदि हम वर्तमान सभ्यता के अध्ययन का आधार मानते हैं तो इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को प्राचीन भारत, पूर्व मध्यकालीन भारत, मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत में बाँटा है. इतिहासकारों के इस इतिहास – विभाजन के आलोक में भारत पर आक्रमणों का दौर पूर्व मध्यकालीन भारत के कालखंड में शुरू हुआ. भारत की समाज – व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था पर आधारित थी जिसने कालांतर में जन्म – आधारित मानकर जाति – व्यवस्था मानकर इसे विकृत कर दिया गया. प्राचीन भारत के इतिहास में हम पढते हैं कि भारत की समाज – व्यवस्था प्रमुख चार वर्णों में विभाजित थी – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. साथ ही अपने – अपने कर्मों के आधार पर एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में जा सकता था. परंतु आधुनिक भारत आते – आते यह वर्ण – व्यवस्था चार वर्णों की अपेक्षा अनेक जातियों में विभाजित हो चुकी थी. बाबा साहब आप्टे के विचारों के संकलन के रूप में अस्तित्व में आई एक अपनी पुस्तक भारतीय समाज चिंतन के व्यक्ति और समाज नामक अध्याय में लिखा गया है कि यह सत्य है कि गीता के ‘कर्मानुबंधानि मनुष्यलोके’ वचनानुसार सम्पूर्ण समुदाय कर्म से बँधा है. कोई भी व्यक्ति कर्म से नही बच सकता है क्योंकि ‘शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मण:’ अर्थात बिना कर्म के शरीर चलना असंभव है. कर्म होने पर उसका परिणाम निश्चित है क्योंकि इस संसार में बिना किसी कारण के कोई भी कार्य सम्भव नही है. मानव-समाज को वर्ण-व्यवस्था के आधार पर वर्गीकृत चार वर्णों पर प्राचीन भारत के मनीषियों की विवेचना के आधार पर ही स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि हमें यह सावधानी भी रखनी पडेगी कि जबतक किसी उच्चतर संस्था का निर्माण न हो जाय, पुरानी संस्थाओं को ध्वस्त करना अत्यंत हानिकारक है. अत: हमें अपने धैर्य का परिचय देना होगा क्योंकि उन्नति की प्रक्रिया क्रमश: शनै: शनै: ही होती है.                
इतिहासकार मानते हैं कि भारत में जिसे किसी भी प्रकार से  मुख्यधारा में स्थान नही मिला उसी पर अन्य सभ्यताओं, पंथों का सर्वाधिक आक्रमण हुआ. उदाहरण के लिए हम आज भी कश्मीर के स्थानीय लोगों से यह कहावत सुन सकते हैं जिसमें वें चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कश्मीर के शासक रिनचेन की कहानी सुनाते हैं. इस कथा का सारांश यह है कि उन दिनों लद्दाख में सनातनधर्म शैवभक्ति का ही बोलबाला था अत: राजा रिनचेन भी अपने आपको शैवभक्त ही मानता था. एक दिन उसके मन में आया कि वहाँ के शैव मठ में जाकर  वहाँ के प्रसिद्ध मठाधीश देवास्वामी से दीक्षा ले लिया जाय. यह सोचकर वह मठाधीश देवास्वामी के पास गया और उनसे दीक्षा देने का आग्रह किया परंतु मठाधीश देवास्वामी ने राजा रिनचेन को दीक्षा देने से मनाकर दिया गया क्योंकि मठाधीश देवास्वामी के अनुसार उनके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों को स्वीकार करने की व्यवस्था नही थी. मठाधीश देवास्वामी की बातें सुनकर राजा रिनचेन के मन को बहुत ठेस लगी. उन्ही दिनों स्वात की घाटी से मीर शाह ने आकर कश्मीर में शरण लिया था. राजा रिनचेन और मीर शाह की संयोगवश भेंट हुई और धर्म को लेकर उन दोनों में रात भर संवाद हुआ. उस संवाद का निर्णय यह हुआ कि भोर होने से पहले राजा रिनचेन को जो भी धार्मिक व्यक्ति दिखाई देगा वह उसी के पंथ को अपना लेगा. संयोगवश उन दिनों बुलबुलशाह कश्मीर में ईस्लाम का प्रचार कर रहे थे, अत: पौ फटने से पूर्व ही राजा रिनचेन को अजान की आवाज़ सुनाई पडी और निर्णयानुसार राजा रिनचेन इस्लाम पंथ को स्वीकार कर सुल्तान सदरुद्दीन बना. सबसे पहले सुल्तान सदरुद्दीन ने मठाधीश देवास्वामी पर आक्रमण कर उनसे यह कहा कि आपके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों के लिए जगह नही है और हमारे धर्म में किसी के लिए कोई रोक नही है. परिणामत: मठाधीश देवास्वामी को अपने आपको सेनाओं से घिरा देख अपने शिष्यों समेत ईस्लाम पंथ को स्वीकर करना पडा. 
स्वामी विवेकानन्द ने समाज का चिंतन करते हुए कहा था कि सभी हितकर सामाजिक परिवर्तन अध्यात्मिक शक्तियों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं तथा यही अध्यात्मिक शक्तियाँ ही आपस में मिलकर एक सबल समाज का निर्माण करती है. गुलामी के कालखंड में हुए भारत के पराभव को पुन: उसी उन्नति के स्थान पर स्थापित करने हेतु सबसे पहले हमें भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड से खत्म कर तत्पश्चात समाज-उत्थान का कार्य करना होगा. हमें यह समझना होगा कि किसी मनुष्य का जन्म किसी विशेषकुल या घर में कभी नही होता अपितु मनुष्य का जन्म किसी मनुष्य के घर में ही होता है. व्यक्तियों से मिलकर परिवार की संरचना होती है और परिवारों से ही मिलकर एक समाज का निर्माण होता. मनुष्य ने अपने जीवन-कार्यों के लिए अपनी सुविधा हेतु कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया. कालंतार में इन सामाजिक व्यवस्थाओं को कुरीतियों ने अपने चंगुल में भी फँसा लिया जिसे समाज सुधारकों ने निदान करने हेतु समय – समय पर अभियान भी चलाया. भारत के इतिहास में इस प्रकार की अनेक घटनाएँ हैं. संक्षेप में, भारत के इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने भारत की एकता – अंखडता को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया. कालांतर में इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने ही भारत में अस्पृश्यता को जन्म दिया. विश्व हिन्दू परिषद ने अस्पृश्यता निवारण हेतु समय – समय पर आन्दोलन चलाया है जो कि वास्तव में एक प्रशंसनीय पहल है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.  
- राजीव गुप्ता

रविवार, 17 अगस्त 2014

विश्व हिन्दू परिषद् : एक अनन्य यात्रा


रघुनन्दन प्रसाद शर्मा ने अपनी पुस्तक विश्व हिन्दू परिषद की विकास यात्रा में लिखा है कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा राज्य में अशिक्षित, आर्थिक कमजोर, अस्पृश्य समाज, वनवासी, गिरिवासी आदि को अमेरिका इत्यादि अन्य देशों से आने वाले करोडों डालरों की मदद से तरह – तरह के हथकंडे अपनाकर ईसाई पादरियों द्वारा धर्मांतरित किए जाने की समस्या की वास्तविकता जानने हेतु वर्ष 1955 में नियुक्त नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने विश्व हिन्दू परिषद के गठन का तात्कालिक कारण बना. वर्ष 1957 में नियोगी कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही देश भर में हडकंप – सा मच गया क्योंकि इस रिपोर्ट में ईसाई पादरियों द्वारा अपनाए जा रहे तरह – तरह साधनों का व्यवहारिक आधार पर विश्लेषण देश में पहली बार हुआ था. इस रिपोर्ट के अनुसार विदेशी धन के आधार पर पादरीगण बडे – बडे स्कूल, छात्रावास, अनाथालय, अस्पताल इत्यादि सेवा कार्यों के माध्यम से भारत के निर्धन समाज को बडी आसानी से ईसाई पंथ में बहुत ही सरलता से धर्मांतरित कर लेते थे. इस समस्या के साथ – साथ हिन्दुस्थान समाचार के प्रतिनिधि के तौर पर विदेशों की यात्रा के दौरान हुए अनुभव से हिन्दुस्थान समाचार के संस्थापक दादा साहब आप्टे भारत की संस्कृति से शनै: – शनै: दूर होते जा रहे विदेशों में बसे भारतीयों की दशा से बहुत चिंतित थे. इस संबंध में श्री आप्टे की व्याकुलता को लोकमान्य तिलक मराठी दैनिक ‘केसरी’ में छपे उनके लेखों को पढकर अनुभव किया जा सकता है. उन्होनें लिखा कि अब हिन्दुओं के अंतर्राष्ट्रीय संग़ठन की आवश्यकता हो गई है क्योंकि हिन्दू समाज के महापुरुष राम, कृष्ण, मनु, याज्ञवल्क्य जैसे मनीषियों के सामाजिक आदर्श आज नही है. त्रिनिदाद में भारत से लगभग 150 वर्ष पूर्व गए हिन्दू बडी संख्या में रह रहे थे. वे धीरे – धीरे अपनी मातृभूमि से कट चुके थे. परिणामत: वें हिन्दू संस्कारों से वंचित होते जा रहे थे. अपनी संतानों और भावी पीढी के बच्चों को पाश्चात्य प्रभावों से बचाने की दृष्टि से कालांतर में त्रिनिदाद के सांसद डा. शम्भूनाथ कपिलदेव को त्रिनिदाद में रह रहे हिन्दू परिवारों ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भारत सरकार के पास भेजा ताकि भारत सरकार इस सूख रही हिन्दू धारा को सजीव करने हेतु कुछ पंडित भिजवाने की व्यवस्था करे. परंतु भारत सरकार के पास इस प्रकार की कोई दूरदृष्टि न होने कारण डा. शम्भूनाथ कपिलदेव को बहुत निराशा हुई. तत्पश्चात श्री कपिलदेव की भेंट माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ से हुई. श्री गुरू जी ने तात्कालिक तौर पर त्रिनिदाद के माननीय सांसद की समस्या का समाधान तो कर दिया परंतु श्री गुरू जी ने हिन्दू की इस दशा पर वैश्विक स्तर पर चिंतन किया और अंत्तोगत्वा उन्हे विश्व स्तर एक हिन्दू संगठन बनाने की युक्ति सूझी. मुम्बई के स्वामी चिन्मयानन्द विश्वभर में हिन्दू संस्कृति का प्रचार – प्रसार करने में लगे थे. वे युवा पीढी को हिन्दू संस्कृति से अवगत करवाना चाह रहे थे. अपने इस परिभ्रमण के कारण उनके मन में हिन्दुओं के एक विश्वव्यापी संगठन की इच्छा बलवती हो चुकी थी. अपने इस चिंतन को स्वामी जी ने अपनी पत्रिका ‘तपोवन प्रसाद’ के नवम्बर 1963 के अंक में लिखा भी था. इन्ही सब मानक बिन्दुओं पर चिंतन करते हुए माधव सदाशिवराव  गोलवलकर की प्रेरणा से श्री आप्टे जी ने लगातार नौ मास तक सतत प्रवास किया. अंतत: सर्वश्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर , एस. एस. आप्टे, स्वामी चिन्मयानन्द जैसे भारत के अनेक महानतम विचारकों,  श्रेष्ठतम धर्माचार्यो और उच्चतम सामाजिक चिंतको के बीच परस्पर संवाद और चिंतन – मनन चल रहा था. इसी सामूहिक विचार-विमर्श का अंकुर "विश्व हिन्दू परिषद्" के रूप में प्रस्फुटित हुआ जिसकी स्थापना मुम्बई के सान्दीपनी साधनालय में 29 अगस्त, 1964 मे जन्माष्ट्मी के दिन हुई.


इस पृष्ठभूमि में ही विश्व हिन्दू परिषद नामक एक सामाजिक संगठन अस्तित्व में आया. विश्व हिन्दू परिषद भारत तथा विदेशों में रह रहे हिन्दुओं की एक सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्था है. परंतु वर्तमान समय में प्राय: विश्व हिन्दू परिषद नाम की चर्चा आते ही हमारे मन – मस्तिष्क में एक ऐसे संगठन की छवि परिलक्षित होती है जिसका प्रमुख कार्य भारत के हिन्दुओं की ठेकेदार के रूप में धरना – प्रदर्शन करना ही है जबकि वास्तविकता इससे कहीं परे है. इतिहास साक्षी है कि जिस राष्ट्र के नागरिक वहां की संस्कृति, पूर्वजों, धर्म, मान्यताओं, मूल्यों और आदर्शों को विस्मृत कर देते है तो उस राष्ट्र का अस्तित्व अधिकतम दिन तक नहीं रह जाता, यही शाश्वत सत्य है. हमें सदैव याद रखना चाहिए कि विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओ में से सिर्फ भारतीय सभ्यता का ही अस्तित्व बचा है बाकी सभी सभ्यताएं कालग्रसित हो चुकी है. समय बीतता गया. पराधीनता की बेड़ियों के विरुद्ध हजारो वर्षों से अनवरत चल रहे संघर्षों के पश्चात हिन्दुस्तान ने अपने को स्वतंत्र कर उन्मुक्त गगन में अपना झंडा तो लहराया परन्तु अपनी उन सभी विशिष्टताओं और महान आदर्शो को विस्मृति के गहन अन्धकार में धकेलना भी शुरू कर दिया जिसकी वजह से वह अपनी प्राचीन विरासत के बल पर अखिल-विश्व के मानस पटल पर छाप छोड़ता हुआ विश्व गुरु के पद पर आसीन रहा. उसने अपने गौरवशाली विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, जीवन – दर्शन जैसी श्रेष्ठतम ऋचाओं के साथ-साथ श्रीराम,  श्रीकृष्ण, गौतम,  महावीर,  गुरुनानक जैसे पुरखों तथा उनके मार्गदर्शनों जिनका उल्लेख रामायण, महाभारत,  गीता जैसे उच्च कोटि-ग्रंथों में मिलता है, को भी विस्मृत कर किनारे लगा दिया. भौतिकता की आंधी में दुर्दांत आक्रंताओ को धूल चटाने वाला और संजीवनी जैसी औषधियों से उन्नत हिमालय,  पतित – पावनी गंगा, पुण्य – प्रदायी तीर्थ,  सर्वदुःखनाशक और समृद्धि की प्रतीक गईया की महानता को भी हमने विस्मृति के हवाले कर दिया. परिणामतः स्वत्व और गौरव के अभाव में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः'  और 'वसुधैव कुटुम्बकं' का उद्घोष करने वाली दिव्य संस्कृति उदासीनता की भेट चढ़ गयी. नर से नारायण तक का मार्ग प्रशस्त करने वाली संस्कृति भेदोपभेद के परिणामस्वरूप पतनोन्मुख हो गयी. स्वतन्त्रता-पश्चात भी भारत – माता ऐसी विषम परिस्थितियों और विनाशकारी तत्वों से जकड़ी हुई थी जिनके दमन की नितांत आवश्यकता के साथ –साथ भारत को पुनः उसी परमवैभव तक पहुचाने की अनिवार्यता हो गयी थी. संसार का मार्गदर्शन करने वाली 'समाज-व्यवस्था' को विभिन्न प्रकार की विकृतियों और कुरीतियों ने अपनी चपेट में ले लिया. सामाजिक समरसता को अस्पृश्यता की नजर लग गयी. इतना ही नही भारत का समाज आज जाति – प्रथा नामक कुरीति के चंगुल में फँस गया है. समाज से जाति – प्रथा नामक इस कुरीति को दूर करने का हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा. अत: हम सबका यह परम कर्तव्य है भारतीय समाज को जाति नामक दंश से मुक्त किया जाय तभी वास्तव में हम अपने समाज के साथ न्याय कर पाएँगे.  

-          राजीव गुप्ता