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सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

जबरदस्ती का मतांतरण बन्द होना चाहिए


20 सितम्बर 1893 को धर्म-संसद मे ईसाईयो द्वारा भारत मे मतांतरण  किये जाने पर कडी आपत्ति करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा, आपके ईसाई धर्म-प्रचारक भारत मे मात्र गिरजाघर बनाने के अलावा और कुछ नही करते है. भारत मे पडी भयंकर भुखमरी के कारण लाखो लोगो ने अपना जीवन गँवा दिया परन्तु आपके ईसाई धर्म-प्रचारक सिर्फ मतांतरण  मे ही लगे रहे. आप सबको मै यह बता देना चहता हूँ कि भारत मे अकाल अनाज का पडा है, धर्म का नही. भारत के लोगो को मानने लिये भारत का धर्म ही पर्याप्त है, उन्हे किसी बाहरी धर्म की कोई आवश्यकता नही है. आप सबको यह पता ही होगा कि भूख से तडप रहे लोगो को पहले उनके पेट मे रोटी चाहिये ताकि उनके पेट की भूख शांत हो सके. भूखे लोगो को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करने जैसा ही है. आपको मै यह भी बताना चाहता हूँ कि यदि ऐसा ही कृत्य भारत का कोई पुरोहित करता अर्थात भूखे लोगो को धर्म का उपदेश देता तो सबसे पहले उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता. इतना ही नही लोग उस पर थूकने से भी परहेज नही करते. मै यहाँ आपके पास तो आया था अपने भूखे भारतवासियो की मदद माँगने हेतु परंतु अब मै यह जान गया हूँ कि मेरे मूर्ति-पूजक भारतवासियो के लिये ईसाई-धर्मावलम्बियो से मदद पाना कितना मुश्किल काम है.’’

स्वामी विवेकानन्द की ये बाते हमेशा ही बहुत प्रासांगिक रही है. अत: इन्ही विचारों से प्रभावित होकर गाँधी जी ने भी कहा था, यदि ईसाई-मिशनरी पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबी की सेवा करने के बजाय डाक्टरी सहायताशिक्षा आदि के द्वारा धर्म - परिवर्तन करेंगे तो भी मै निश्चित ही उन्हें भारत से चले जाने के लिये ही कहूँगा. निश्चित ही भारत के धर्म यहाँ के लोगों के लिए पर्याप्त है. भारतीयो को धर्म – परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है. धर्म एक नितांत व्यक्तिगत विषय है. अगर कोई डाक्टर मुझे किसी बीमारी से अच्छा कर दे तो उसके उपकार हेतु मै अपना धर्म क्यों बदलूँ मेरे लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर  कोई डाक्टर मुझसे इस तरह की अपेक्षा ही क्यों रखे क्या डाक्टरी सेवा अपने आप में एक पारितोषिक प्रदायक वृत्ति नहीं है अगर मै किसी ईसाई शिक्षा संस्थान में शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ तो भी मुझ पर ईसाईयत क्यों थोपी जाय ? वर्तमान समय मे सेवा की आड मे ईसाईयो – द्वारा भारत मे हो रहे मतांतरण  जैसी वीभत्स समस्या से मुक्ति पाने के लिये समाज और सरकार दोनो को ही जागरूक होने की नितांत आवश्यकता है. इतना ही नही ईसाईकरण करने के लिये ईसाई मतावलम्बी हिन्दुओ के साथ किस हद तक अमानवीय व्यवहार करते है, आये दिन हम दक्षिण भारत , पूर्वोत्तर भारत और भारत कई राज्यो मे देख सकते है. हम एक लोकतान्त्रिक देश है. हमारा अपना संविधान है व संविधान द्वारा प्रदत्त हमारे मौलिक अधिकार है.  धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा  हमें मिला हुआ है परन्तु जबरदस्ती से ‘मतांतरण  का अधिकार’ ये कहा से आ गया ? 5 – 6 सितम्बर2011 को नई दिल्ली के लोक कला मंच (नजदीक जवाहरलाल स्टेडियम) मे फोरम फार सोशल जस्टिस द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम "नेशनल ट्रिब्यूनल एंड वर्कशाप ओन एवेनजेलिज्म में जूरी-सदस्यो जिसमे के.पी.एस गिल समेत डी.एस तेवतिया जैसे 15 जाने – माने लोग शामिल थे; के सामने अपना-अपना बयान दर्ज करवाने आये वनवासियों के अनुसार ईसाईयो द्वारा धर्म बदलने के लिये बार - बार उन्हे धन का प्रलोभन उन्हें दिया जाता है साथ ही उन्हे अमेरिकाइंग्लैण्डइटलीआस्ट्रेलिया आदि जगहों पर बड़े - बड़े सेमीनार में जाने के लिए प्रेरित किया जाता है. चर्च के इस षड्यंत्र के बारे मे भारत सरकार को न पता हो यह असम्भव – सा लगता है. अरुणाचल राज्य का एक निवासी जो कि दिल्ली मे एक जूरी के सामने पेश होने के लिये आया था उसने बताया कि उसने भारत  के राष्ट्रपतिप्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री से भी मिलकर इस गम्भीर विषय पर हस्तक्षेप करने के लिए प्रार्थना की है परन्तु अभी तक किसी ने सुध भी नहीं ली.

मात्र मतांतरण  ही नही अपितु 26 सितम्बर 1893 को स्वामी जी ने बौद्ध – धर्म पर भी व्यख्यान दिया. स्वामी जी ने वहाँ उपस्थित मंचस्थ अतिथियो को बताया कि मै बौद्ध – मत को मानने वाला नही हूँ; परंतु फिर भी मै बौद्ध हूँ; क्योंकि यदि चीन, जापान जैसे देश महात्मा बुद्ध मे अपनी आस्था प्रकट करते है तो निश्चित ही भारतवासी उन्हे भगवान का अवतार मानकर पूजता है.  ऐसा नही है कि हम बौद्ध – मत मे अपनी आस्था रखने वालो का खून बहा दे. जैसा कि यहूदियो ने ईसामसीह के विचारो को अस्वीकार्य करने के साथ – साथ उन्हे शूली पर ही चढा दिया. इसके उलट भारत मे शाक्य – मुनि की भी पूजा की गयी.  हम भारतीयो को यह बात सदा से ही पता है कि भारत मे हिन्दू – धर्म और बौद्ध – धर्म दोनो एक – दूसरे के पूरक ही है. इसलिए आजतक भारत मे वैदिक – धर्म से लेकर कालांतर मे अनेक मत – पंथ बने परंतु एक पंथ द्वारा दूसरे पंथ को मानने के लिये मजबूर किया गया हो; ऐसा कोई उदाहरण भारत के इतिहास मे कभी नही मिला.  भारत के लोग कई विभिन्न मत – पंथो को मानते आये है; परंतु उनमे किसी भी प्रकार की सामाजिक मतभेद अथवा उनके मध्य किसी प्रकार की एक – दूसरे के प्रति नकारात्मकता कभी नही रही है; अपितु एक – दूसरे के मतो का सम्मान करते हुए उनके बताये हुए मार्गो पर चलने की बात की जाती है. इसलिए तत्कालीन एक यूनानी इतिहासकार ने यहाँ तक लिख दिया कि उसे एक भी ऐसा हिन्दू नही मिला जो मिथ्या भाषण करता हो; और एक भी हिन्दू नारी नही मिली, जो पतिव्रता न हो. हिन्दू धर्म के दो भाग है : एक कर्मकांड और दूसरा ज्ञानकांड. भारत मे जाति – व्यवस्था एक सामाजिक संस्था मात्र भर है. यह सच है कि भारत की जाति – व्यवस्था मे कई कुरीतियो ने भी जन्म ले लिया है. परंतु यह आज भी अक्षरश: सत्य है कि संन्यास आश्रम मे प्रवेश करने के उपरांत व्यक्ति जाति-बन्धन से मुक्त हो जाता है. लगभग सभी भारतीय ईश्वरीय सत्ता को मानते है व उस परमसत्ता की ही बात करते है. भारत मे अपनी – अपनी इच्छानुसार भगवत – प्राप्ति का मार्ग चुनने की पूरी स्वतंत्रता सदैव से ही है. इसलिये आपके ईसाई धर्म-प्रचारक जो भारत मे मतांतरण  हेतु हथकंडे अपनाते है; उससे अच्छा है कि वे ऐसे कृत्य करने की अपेक्षा मानवता और मानव – सेवा के प्रति कटिबद्ध हो. भारत की इन महान विभूतियों के चिंतनों को साकार रूप देते हुए विश्व हिन्दू परिषद अपने उद्देश्य की पूर्ति में अहर्निश लगा हुआ है. इतना ही नही विश्व हिन्दू परिषद किसी भी प्रकार से जबरदस्ती किए गए मतांतरण का विरोध करते हुए अपने घर वापसी कार्यक्रम से उन्हे हिन्दू समाज में ससम्मान वापस लाता है. 19 मार्च, 1968 को विश्व हिन्दू परिषद, विदर्भ के गठन की घोषणा के उपरांत माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ ने अपने उदबोधन में समाज के ऐसे बन्धुओं को, जो किसी भी कारण से क्यों न हो, अपने पूर्वजों के धर्म से विलग हो गए हैं, उन्हें अपने स्वधर्म में वापस लौटने हेतु आमंत्रित किया.
-          राजीव गुप्ता 

बुधवार, 17 सितंबर 2014

समानता और समरसता


भारत की गुलामी के कालखंड में भारतीय शास्त्रों पर टीकाकारों ने कई टीकाएँ लिखा. उन्हीं कुछ टीकाओं में से शब्दों के वास्तविक अर्थ अपना मूल अर्थ खोते चले गए. इतना ही नही मनुस्मृति में भी मिलावट की गई. डा. पी.वी. काने की समीक्षा के अनुसार मनुस्मृति की रचना ईसापूर्व दूसरी शताब्दी तथा ईसा के उपरांत दूसरी शताब्दी के बीच कभी हुई होगी (धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड1, तृ. सं. 1980, पृ.46). परंतु रचनाकाल से मेधातिथि के भाष्य तक (9वीं सदी) इसमें संशोधन एवं परिवर्तन होते आ रहें हैं. मेधातिथि के भाष्य की कई हस्तलिखित प्रतियों में पाए जाने वाले अध्यायों के अंत में एक श्लोक आता है जिसका अर्थ टपकता है कि सहारण के पुत्र मदन राजा ने किसी देश से मेधातिथि की प्रतियाँ मंगाकर भाष्य का जीर्णोद्धार कराया (डा. काने, वही, पृ. 69). गंगनाथ झा ने भी मेधातिथि भाष्य पर लिखित अपनी पुस्तक की भूमिका मे कहा कि कोई मान्य मनुस्मृति थी और उसकी मेधातिथिकृत उचित व्याख्या थी. मेधातिथि व्याख्या सहित वह मनुस्मृति कहीं लुप्त हो गई और कहीं मिलती न थी. तब मदन राजा ने इधर-उधर से लिखवाई हुई कई पुस्तकों से उसका जीर्णोद्धार करवाया (पं. धर्मदेव, स्त्रियों का वेदाध्ययन और वैदिक कर्म काण्ड में अधिकार, पृ. 133). एक उदाहरण से हम और अधिक समझ सकते हैं, जैसे जाति को परिभाषित करते हुए महर्षि गौतम कहते हैं कि समान प्रसवात्मिका जाति:” (न्याय दर्शन – 2.2.70) न्याय दर्शन में यह बताया गया है कि अर्थात जिनके जन्म लेने की विधि एवं प्रसव एक समान हों, वे सब एक जाति के हैं. यहाँ समान प्रसव का भाव है कि जिसके संयोग से वंश चलता हो व जिन प्राणियों की प्रसव विधि, आयु और भोग एक समान हों. जाति का एक दूसरा लक्षण भी है – आकृति जाति लिंग:, समान आकृति अर्थात जिन प्रणियों की आकृति एक समान हो, वे एक जाति के हैं. इस परिभाषा के अनुसार मनुष्य, हाथी, घोडे की विभिन्न आकृति होने के कारण उनकी विभिन्न जातियाँ हैं. परंतु विश्व के सभी मानवों की आकृति एक जैसी होने के कारण सभी मनुष्य एक ही जाति के हैं, भले ही जलवायु, स्थान इत्यादि के कारण कुछ भिन्नता दिखाई दे. सांख्य दर्शनाचार्य महर्षि कपिल के अनुसार – मानुष्यश्चैक विधि:, अर्थात सभी मनुष्य एक प्रकार या एक जाति के ही हैं. अत: विश्व के काले, गोरे, सभी मतावलंबी एक ही जाति अर्थात मानव जाति के ही हैं. फिर हिन्दू मान्यता में इतनी सारी जातियों की बाढ सी कैसे और कहाँ से आ गई ? यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है. 
     हिन्दू मान्यताओं में इन जातियों का आधार इनके दैनिक क्रियाकलापों के कारण उन पर अध्यारोपित है, जो कि व्यवसायानुसार बदलती रहती हैं. भारतीय मान्यताओं में आज जो हम जाति का रूप देखते है कि ब्राह्मण की संतान ब्रह्मण व शूद्र की संतान शूद्र ही होगी वास्तव में यह मात्र एक सामाजिक विकृति और बुराई हैं. समाज की इसी विकृति और बुराई को जन्मना वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है जिसकी आलोचना चहुँ ओर होती है, जो कि सर्वथा उचित ही है. मनुस्मृति में जाति शब्द का अर्थ ‘जन्म’ से है; जैसे जाति अन्धवधिरौ – जन्म से अन्धे बहरे. मनुस्मृति ही नहीं, वेदों के अलावा, लगभग सभी हिन्दू धर्म-ग्रंथों में मिलावट की गई. प्राचीनकाल में हस्तलिखित पांडुलिपियों का चलन था, जिनमें श्लोकों का बढाना या घटाना बहुत ही आसान था. स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि जिस दिन से भारतीय समाज में जन्मना वर्ण-व्यवस्था ने अपनी जडे गहरी की और समाज में अस्पृश्यता जैसी कई प्रकार की कुरीतियों ने जन्म लिया और उनके बीच परस्पर आदान-प्रदान बन्द हुआ जिससे समाज में परस्पर ‘भेद’ की खाई गहरी होती गई, उसी दिन भारत के दुर्भाग्य का जन्म हुआ. समाज में व्यापत इस प्रकार की सभी कुरीतियों को आसानी से मिटाया भी जा सकता है क्योंकि ये सभी कुरीतियाँ अस्थायी और कुछ व्यक्ति-विशेष के स्वार्थ से ही ओतप्रोत हैं क्योंकि मेरा यह मानना है कि कोई भी समाज अधिक दिन तक आपस में संवादहीन नही रह सकता. इसलिए तन्द्रा में पडी अपने अतीत की कीर्ति और स्वत्व को बिसरी हुई जनता में नवजीवन का संचार तभी हो सकता है जब वह अपने अतीत के गौरव की ओर जाना शुरू कर दे. जिस प्रकार जलते हुए बिजली के बल्ब के ऊपर धूल जमने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह बल्ब अपर्याप्त रोशनी दे रहा है, और धूल के साफ होते ही वह बल्ब पर्याप्त रोशनी से जगमगाता हुआ हमें प्रतीत होता है. ठीक उसी प्रकार हमारे भारतवर्ष की जनता है. एक बार इन्हे अपने स्वर्णिम इतिहास के स्वत्व से इनका साक्षात्कार हो जाये तो विश्व-कल्याण और पूरी वसुधा को परिवार मानने वाली यह भारतीय संस्कृति अपनी भारतमाता को पुन: उसी सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा देगी जहाँ कभी वह आरूढ थी. बस भारतीय समाज की आत्मा को झझकोरने भर की देर है.                   
    रघुनन्दन प्रसाद शर्मा की पुस्तक प्रेरणा के अमर स्वर नामक पुस्तक के अनुसार 22 अक्टूबर, 1972 को गुजरात के सिद्धपुर में आयोजित विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन को उदबोधित करते हुए माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ ने कहा कि हिन्दू समाज के सभी घटकों में परस्पर समानता की भावना के विद्यमान रहने पर ही उनमें समरसता पनप सकेगी. हम सभी जानते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद समाज को एक सूत्र में गूँथने का कार्य कर रही है. वहाँ उपस्थित लोगों द्वारा दलित, उपेक्षित जैसे शब्दों का उपयोग कर समाज के एक बहुत बडे वर्ग की सामाजिक दशा के उल्लेख पर श्री गुरू जी ने कहा कि समाज के पिछ्ले कुछ वर्षों में जैसी दशा रही है उसके परिणामस्वरूप समाज का एक बहुत बडा वर्ग व्यवहारिक शिक्षा से वंचित रह गया है. इसलिए इस उपेक्षित समाज की अर्थ – उत्पादन क्षमता भी कम हो गई है और उसे दैन्य – दारिद्रय का सामना करना पड रहा है. पूर्व काल में इस समाज को पूरा सम्मान प्राप्त था. पंचायत व्यवस्था में भी इस समाज का प्रतिनिधित्व रहता था. प्रभू रामचन्द्र की राज्यव्यवस्था का जो वर्णन आता है, उसमें भी चार वर्णों के चार प्रतिनिधि और पाँचवाँ निषाद अर्थात अपने इन वनवासी बन्धुओं के  प्रतिनिधि मिलकर पंचायत का उल्लेख आता है. परंतु कालांतर में हम वनवासी बन्धुओं का प्राक्रमी इतिहास को भूल बैठे. इस स्थिति में विश्व हिन्दू परिषद के नाते इन बन्धुओं के प्रति, जो दलित – उपेक्षित कहलाते हैं, अपना ध्यान आकर्षित होना और वें हमारे समकक्ष आकर खडे हो सकें ऐसा प्रयत्न करना बिल्कुल स्वाभाविक और अपेक्षित ही है. इस समस्या की ओर गत कई वर्षों से लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है. भारतीय संविधान में इस समस्या का उल्लेख भी हुआ है कि छुआछूत एक दण्डनीय अपराध है परंतु डंडे के बल पर समाज में समरसता नही आती है. 
    महात्मा गाँधी ने समाज द्वारा उपेक्षित इस वर्ग के लिए ‘हरिजन’ नाम प्रचलित किया. यह नाम बहुत अच्छा और सरल था परंतु इस नाम के अर्थ पर भी हमें ध्यान देना चाहिए. समाज का यह वर्ग यदि हरिजन हुआ तो बाकि समाज के लोगों के लिए क्या संबोधन किया जाय ? क्या वें सभी लोग राक्षसजन या दैत्यजन हैं ? हरिजन का शाब्दिक अर्थ है हरि अर्थात भगवान विष्णु और जन का अर्थ है - लोग, इस प्रकार हरिजन तो हम सभी हैं. जाने – अंजाने में ही सही परंतु महात्मा गाँधी ने इस उपेक्षित समाज को नया नाम दे दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि समाज अब दो विभिन्न वर्गों में विभाजित हो गया – एक हरिजन दूसरा गैर – हरिजन. यद्दपि अलग नाम से समाज में पृथकता की भावना और बलवती होती है. समाज में समरसता किसी विभाजन से नही आती अपितु उनके साथ रोटी – बेटी का संबंध रखने से आती है. श्री गुरू जी ने अपने अनुभव में कहा है कि एक बार उनसे मिलने के महात्मा गाँधी के द्वारा कहे जाने वाले हरिजन के एक नेता आए. उन नेता जी ने कहा कि अलग अस्तित्व के कारण उन्हें कुछ विशेष ‘राईट्स एण्ड प्रिविलेजेस’ मिलते हैं. भारतीय भाषाओं में ‘राईटस’ शब्द का पर्यायवाची शब्द नही है. क्योंकि भारत में हमेशा ‘राईट्स’ के लिए नही अपितु कर्तव्य के लिए संघर्ष हुआ है. उदाहरण के लिए ब्राह्मण का कर्तव्य है ज्ञान देना यदि वह ऐसा नही करता है तो उसके लिए कहा जाता है कि ब्राह्मण अपने कर्तव्य से पतित हो गया है. इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि पृथकता बनाए रखने में स्वार्थ निर्माण हो चुके हैं. इसलिए हमें अब यह मान लेना चाहिए कि अस्पृश्यता एक सामाजिक आन्दोलन है राजनीतिक लोग अपनी राजनैतिक सत्ता प्राप्ति करने हेतु इस सामाजिक आन्दोलन का उपयोग करते हैं. परिणामत: सामाजिक बुराई का खात्मा जागरूक समाज द्वारा ही किया जा सकता है तब जाकर समाज में वास्तविक समरसता का भाव उत्पन्न होगा.
-          राजीव गुप्ता

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अस्पृश्यता निवारण – विहिप का उड्डुपी सम्मेलन


       रामफल सिंह ‘रामजी भाई’ ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन धर्मयोद्धा में लिखा है कि दुनिया में एकमात्र हिन्दू समाज ही ऐसा है जिसकी रचना पारिवारिक भावभूमि पर हुई है. हमारे समाज रचनाकार महान पूर्वजों ने कहा है कि ‘माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या’ अर्थात यह भारत भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं. इस भावभूमि से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अर्थात पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है, की परिकल्पना अस्तित्व में आई. भारत का यह समाज मात्र चिंतन – मनन तक ही सीमित नही रहा अपितु भारतीय मनीषी संसार के कोने – कोने में मानवता का सन्देश लेकर निकल पडे. कुछ समय पूर्व से भारतीय समाज की वर्ण – व्यवस्था के अनुसार शूद्र वर्ण को अस्पृश्य माना जाने लगा. ‘कृणवंतो विश्वमार्यम’ अर्थात विश्व को श्रेष्ठ बनाएँगें, का उदघोष करने वाली भारतीय संस्कृति में अस्पृश्यता का जन्म कब और कैसे हुआ ? क्या कोई सभ्य समाज जो मानव कल्याण का पक्षधर हो वह समाज में अस्पृश्यता जैसी कुरीति का पक्षधर होगा ? कदापि नही ! समाज में आई इस कुरीति के इतिहास के बारें में जानने पर ज्ञात हुआ कि यह बात सर्वविदित है कि सामाजिक छुआछूत भारतीय समाज का कभी भी अंग नही रहा है. भारतीय समाज में इस कुरीति को हल्के ढंग से नही लिया जा सकता क्योंकि यह कुरीति भारत के स्वर्णिम अतीत पर कुठाराघात करती है. रामजी भाई ने अपने शोध के आधार पर अपनी इसी पुस्तक में इस चर्चा को आगे बढाते हुए लिखते है कि भारतीय समाज की वास्तविक दशा को जानने के लिए हमें 712 ई. के पूर्व में जाना पडेगा. उस समय भारत में दो प्रमुख आन्दोलन हुए – बौद्ध आन्दोलन और जैन आन्दोलन. ये दोनों ही आन्दोलन अपने कालखंड के समाज में व्यापत बुराईयों को दूर करने के लिए हुए थे परंतु इन दोनों आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता की चर्चा तक नही है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उस समय तक सामाजिक अस्पृश्यता का अस्तित्व नही था अन्यथा दोनों ही अवतारी पुरुषों के नेतृत्व में चलने वाले आन्दोलनों में सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को अनदेखा नही किया जा सकता था. वर्तमान समय में इन दोनों ही अवतारी पुरुषों को भारतीय समाज भगवान मानकर इनकी उपासना करता है.
      परंतु 712 ई. के पश्चात शायद ही ऐसा कोई कालखंड हो जिसमें सामाजिक अस्पृश्यता नामक इस बुराई को दूर करने का प्रयास न किया गया हो. राजाओं, संतो, सामाजिक संगठनों तथा मध्यकाल के भक्ति आन्दोलनों के द्वारा इस बुराई को दूर करने की कोशिश भी की गई थी. इसके उपरांत लगभग 500 वर्षों तक सिखों का आन्दोलन चला, तत्पश्चात गत 130 वर्षों से आर्यसमाज, महात्मा गाँधी समेत कई महापुरुषों द्वारा तथा गत कई दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का अनवरत सामाजिक आन्दोलन चला रखा है. छुआछूत के इस विषय वर्तमान समय में शोध करने वाले डा. भीमराव अम्बेडकर हैं. वें अपनी पुस्तक ‘अछूत कौन व कैसे’ में लिखते हैं कि वेदों में सामाजिक छुआछूत का उल्लेख नही है. वें आगे लिखते हैं कि 400 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में सामाजिक छुआछूत का कोई उदाहरण नही मिलता है. सबसे महत्वपूर्ण बात डा. अम्बेडकर लिखते हैं कि हिन्दू समाज अस्पृश्यता और अपवित्रता की घटनाओं में अंतर नही कर पाता है. राईटिंग एण्ड स्पीचेज आफ डा. अम्बेडकर के पेज 318 – 319 पर डा. अम्बेडकर ‘कादम्बरी’ उपन्यास का उल्लेख करते है. यह उपन्यास 600 ई. शताब्दी में लिखा गया था. इसके लेखक वाणभट्ट नामक ब्राह्मण हैं. इस उपन्यास में एक पात्र है चाण्डाल का. उस चाण्डाल की एक पुत्री है. उपन्यासकार ने चांडाल की उस पुत्री की सुन्दरता बखान करने में किसी भी उपमा की कोई कमी नही है. इतना ही नही उस चाण्डाल पुत्री को उपन्यासकार ने ‘राजकुमारी’ लिखता है. इसी उपन्यास में एक वैशम्पायन नामक तोते की चर्चा है जिसे उस चांडाल राजकुमारी ने पाला था. इन दोनों को लेकर ब्राह्मणराज शूद्रक के दरबार में जाते हैं और राजा को दोनों की विशेषता बताकर राजा से उन दोनों को स्वीकार करने का आग्रह करते हैं जिसे राजा ने सहजता से स्वीकार कर लिया. इस कथा का यह तात्पर्य है कि 600 ई. शताब्दी तक हिन्दू समाज में पवित्रता – अपवित्रता का व्यवहार भले ही होने लगा हो परंतु समाज में अस्पृश्यता नही थी अन्यथा राजा के दरबार में किसी चांडाल पुत्री का प्रवेश ही नही होता साथ ही उपन्यासकार ने चांडाल पुत्री को ‘राजकुमारी’ कहा है अर्थात उस समय तक चांडालों के भी राज्य हुआ करते थे. इन सभी तथ्यों के आलोक में अध्ययन करने पर हमें यह ज्ञात होता है कि 712 ई. के पूर्व तक भारतीय समाज में अस्पृश्यता नही थी.
सर्वप्रथम भारत की धरती पर 712 ई. में सामाजिक छुआछूत का प्रवेश हुआ क्योंकि मोहम्मद बिन कासिम से पराजित होने के उपरांत राजा दाहिर की पत्नी ने ‘जौहर’ अर्थात आग में स्वेच्छा से जिन्दा जल जाना, किया था. जौहर से पूर्व रानी ने भगवान से प्रार्थना की थी कि हे भगवान ! मुझे क्षमा करना क्योंकि मैं इन आउट्कास्ट और काऊ ईटर अर्थात गाय खाने वाले तथा विजातीय लोगों के चंगुल में नही पडना चाहती अत: अपने अपको अग्नि को समर्पित कर रही हूँ. इससे पूर्व भी भारत में विदेशी आए परंतु किसी ने उनका बहिष्कार नही किया. अधिकांश समाविष्ट कर लिए गए और जिन्हे समाविष्ट नही किया जा सका उनके साथ भी रोटी – बेटी का संबंध जोडा गया. यवन सेनापति सैल्यूकस की बेटी का सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ विवाह सर्वविदित है. इतिहासकार लिखते हैं कि साधारण मुसलमान भी अपने घरों में 15 – 20 स्त्रियाँ रखता था. मुसलमानों में बुर्का परम्परा थी इस कारण वें इन्हे बाहर नही जाने देते थे. परिणामत: इन्हें अपने घरों में ही महिलाओं के लिए पाखाने बनाने पडे. चूँकि ये सभी भारत में विजेता के रूप में थे अत: मैला उठाने का काम ये लोग नही करते थे वरन जो लोग राजनैतिक रूप से बंदी बनाए जाते थे उनके सामने ये विजेता शासक दो शर्त रखते थे – या तो ईस्लाम स्वीकार करो या तो उनके घरों का मैला उठाओ. भारतीय समाज के लम्बे जीवनकाल में यह एक अनूठा अनुभव था क्योंकि भारत के घरों में, भारतीय राजे – रजवाडों में कभी भी किसी शौचालय के व्यवस्था की चर्चा नही है. इतिहासकार भी इस बात की पुष्टि करते हैं हडप्पा, मोहनजोदडों में भी स्नानागार जैसे बहुत सारी चीजें खुदाई में मिली हैं परंतु शौचालय का स्थान उन्हें नही मिला.
       चूँकि धीरे – धीरे सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई ने पूरे भारत को अपने चंगुल में जकड लिया था. स्वतंत्रता पश्चात भी सामाजिक छुआछूत नामक इस बुराई को खत्म नही किया जा सका. अत: माधव सदाशिव गोलवरकर ‘श्री गुरू जी’, श्री आप्टे व स्वामी चिन्मयानन्द जी समेत अन्य वरिष्ठ चिंतकों द्वारा शुरू किए गए विश्व हिन्दू परिषद नामक संस्था के 13 – 14 दिसम्बर 1969 के कर्नाटक प्रांत के उड्डुप्पी सम्मेलन में श्री गुरू जी ने कहा कि भारत जैसे धर्मपरायण देश में समाज से छुआछूत हटाने का प्रयास धर्मगुरुओं के बिना संभव नही है. अत: आम लोगों के मन से छुआछूत हटाने के लिए यह आवश्यक है कि संत समाज इसके लिए लोगों का आह्वान करें. इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए हुए संत समाज ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ समाज के विघटन के कारण ही होती हैं. इसी सम्मेलन से ‘न हिन्दू पतिति भवेत’ (हिन्दू कभी पतित नही हो सकता), ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे’ (सभी हिन्दू भाई – भाई हैं), ‘मम दीक्षा हिन्दू रक्षा’ (मेरी दीक्षा हिन्दुओं की रक्षा है) तथा ‘मम मंत्र समानता’ (मेरा मंत्र समानता का है) की आवाज उठाई गई. कालन्तर में विहिप ने अस्पृश्यता निवारण आन्दोलन का कार्यक्रम चलाया. वर्ष 1970 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में विहिप अधिवेशन में अस्पृश्यता निवारण को लेकर बहुत चिंता जाहिर की गई थी. सामाजिक समरसता कार्यक्रम को बढाते हुए कालांतर में विहिप के 10 नवम्बर, 1989 अयोध्या में शिलान्यास का पूजन कार्यक्रम विहिप – बिहार प्रांत के तत्कालीन संगठन मंत्री श्री कामेश्वर चौपाल जो कि अनुसूचित जाति से थे, के हाथों करवाया गया. इतना ही नही वर्ष 1994 ई. में काशी में आयोजित धर्म संसद अधिवेशन में काशी के डोम राजा को सम्मानित भी किया गया. इस प्रकार विश्व हिन्दू परिषद अपने सामाजिक समरसता के एजेंडे पर अनवरत आगे बढता हुआ नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.

-          राजीव गुप्ता 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

विहिप की सामाजिक – समरसता


समाजशास्त्रियों के अनुसार सामाजिक समूहों में मिलजुलकर रहने के कारण मनुष्य को सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी गई है. उनका मानना है कि मिलजुलकर रहने से सभी प्रकार के छोट – बडे समूहों में रहने वाले सामाजिक प्राणियों के बीच टकराव की स्थिति भी आती है. परिणामत: इन छोटे – बडे समूहों के बीच विशेष प्रकार की मान्यताओं व विचारों का जन्म होता है जो कि कालांतर तक चलता रहता है. बुद्धिजीवियों के बीच चल रहे तरह – तरह के सामाजिक चिंतन को ही समाजशास्त्र के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है. जीवों की उत्पत्ति नामक पुस्तक के लेखक डार्विन के मन में भी विचार आया कि मानव – समाज का भी अध्ययन होना चाहिए और आगस्ट काम्ट, हर्बर्ट स्पेंशर जैसे समाजशास्त्रियों का मत रहा कि मानव समाज का अध्ययन रसायन और भौतिकी विज्ञान की तरह वैज्ञानिक तरीके से भी किया जा सकता है. उनके इस चिंतन का विरोध भी हुआ क्योंकि कुछ चिंतकों का मत था कि मनुष्य की भावनाओं, ईच्छाओं व उसकी मान्यताओं को विज्ञान की कसौटी पर नही परखा जा सकता. इस विचार के आलोक में मैक्स बेबर, कार्ल मैनेहाईम जैसे विचारकों ने एक नए मिले – जुले विचार का प्रतिपादन किया. उनका मानना था कि समाज और मनुष्य को अलग – अलग स्वतंत्र सत्ता मानकर मानव – समाज का अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जा सकता है. इन विचारकों के अनुसार एक तरफ समाज में पाए जाने वाले मूल्यों, विचारों व भावनाओं, संस्कृतियों तथा उनकी भावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है तो दूसरी तरफ मानव के व्यक्तित्व का अध्ययन मनोवैज्ञानिक तरीके से किया जा सकता है.
स्वामी विवेकानन्द , पं. दीनदयाल उपाध्याय, माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ जैसे अनेक भारतीय चिंतकों ने समाज का समग्रता पूर्वक अध्ययन कर समाज की एक नई अवधारणा के धागे में पिरोया जिसे सामाजिक समरसता के नाम से जाना गया. भारत के इन चिंतकों का मत था कि संसार की सभी जीवों में अपनी चिंतन शैली के कारण मनुष्य सर्वश्रेष्ठ जीव है और भारतीय मनीषियों ने मनुष्य़ के अंत:करण की शुद्धता और उसकी पवित्रता पर अत्याधिक जोर दिया है. इसलिए उन्होनें कहा कि मानव में मानवीयता का भाव सदैव रहना ही चाहिए. उसके प्रत्येक कार्य में समाज की भलाई ही सर्वोपरि होना चाहिए. इसकी चर्चा भारतीय वेद – पुराणों की श्रुतियों में मिलती है. इतना ही नही उपासना हेतु बनाए गए देवालयों के पुजारी आज भी अपने ईष्ट की उपासना के पश्चात सभी सुखी हों, प्राणियों में सदभावना हो और विश्व का कल्याण हो नामक उदघोष लगवाते हैं. तात्पर्य यह है कि विश्व – कल्य़ाण हेतु मनुष्यों में परस्पर सदभावना का चिंतन होना चाहिए. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण विज्ञान की भाँति किसी भी प्रकार के घर्षण, क्रिया – प्रतिक्रिया की अपेक्षा उसका प्रत्येक दृष्टिकोण सामाजिक ही होना चाहिए. अत: मोहनदास करमचन्द गांधी ने सर्वोदय और पं. दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का सिद्धांत दिया. सामाजिक सदभावना के इस आलोक में श्री गुरू जी ने पाया कि भारत के लोग अपनी मूल सिद्धांतों से दूर होते जा रहे हैं. उनमें परस्पर वैमनस्य का भाव निरंतर बढ रहा है. वर्ण – व्यवस्था की बुनियाद पर रखे गए स्वस्थ समाज की परिकल्पना को विभिन्न सामाजिक कुरीतियों ने घेर लिया है. समाज की वर्ण – व्यवस्था के सिद्धांत को कुछ प्रभावशाली लोगों ने जाति – प्रथा में बदल दिया है. परिणामत: भारतीय समाज का ताना – बाना चरमरा गया. इतना ही नही जाति – प्रथा के आधार पर भारतीय समाज पर छुआछूत नामक एक वीभत्स रोग ने आक्रमण कर दिया है. हमारे समरस समाज में असमानता, ऊँच – नीच का ज़हर घोल दिया गया. इतना ही नही इन कुटिल प्रभावशाली लोगों के चलते हमारे समाज में से उसके स्वत्व – भाव का लोप करवाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विश्व में कभी भारतीय संस्कृति का परचम लहराने वाली सभ्यता सामाजिक कुरीतियों के चलते मात्र नौकरी – चाकरी के उद्देश्य से विश्व में भ्रमण करने वाली बनकर रह गई. अपनी इस व्यथा को श्री गुरू जी ने मुम्बई के सान्दीपनी साधनालय में जन्माष्टमी महोत्सव के दिन 29 अगस्त, 1964 को विश्व हिन्दू परिषद के गठन के शुभ अवसर पर प्रकट करते हुए कहा कि भारत के पूर्वकाल और आधुनिक काल का यदि हम अपनी आँखों के सामने रखें तो हमारे अंत:करण में यह बात दुखदायी होगी कि विश्व के कोने – कोने में हमारी संस्कृति का प्रभाव एक विजेता के रूप में था और पिछले सौ – डेढ सौ वर्षों में हम विश्व के कोने – कोने में मजदूर के रूप में चाकरी करने के उद्देश्य हीन प्रवृत्तियों को लेकर गए. इसी बैठक में मास्टर तारा सिंह ने त्तत्कालीन सामाजिक स्थिति का अवलोकन करते हुए बताया कि पंजाब में सिख और हिन्दुओं को अलग – अलग माना जाता है. सिखों का उत्थान तभी संभव है जबतक हिन्दू धर्म जीवित है. हमें नही भूलना चाहिए कि सिख तो महान हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है. गुरू गोविन्द सिंह ने हिन्दू शास्त्रों और पुराणों से ही ज्ञान एवं दर्शन लेकर गुरुमुखी में उसका निरुपण किया. तात्पर्य यह है कि सनातन धर्म को मानने वाला भारतीय समाज वर्ष 1964 तक आते – आते बौद्ध, जैन, सिख जैसे कई पंथों में बँट चुका था और समाज में कई प्रकार की जातियाँ उत्पन्न हो चुकी थी जिसने कालांतर में परस्पर सामजिक वैमनस्य को ही बढाया. परिणामत: सामाजिक सदभाव की अत्यंत आवश्यकता और महत्ता को समझते हुए भारतीय चिंतकों ने भारत की समाज व्यवस्था की विभिन्न कुरीतियों को दूर करने का सदियों से चला आ रहा भारतीय पथ, सामाजिक सदभाव को अंगीकार किया. महर्षि दयानंद के चिंतन ‘वेदों की ओर लौटो’ के मार्ग पर चलने की आवश्यकता है. प्राचीन भारत में वर्ण – व्यवस्था नामक सामाजिक व्यवस्था से समाज का ताना – बाना बुना था. आज भी संसार के सभी देशों में समाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु विभिन्न नामों से कोई न कोई व्यवस्था अवश्यमेव ही है. हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग स्वतंत्र रूप से अस्तित्व – हीन है अर्थात विभिन्न अंग सामूहिक रूप से मिलकर ही शरीर का निर्माण करते है उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने आप में स्वतंत्र रहकर अस्तित्व हीन ही है क्योंकि किसी भी मानव का स्थिति और उसका विकास समाज अर्थात सामूहिकता में ही होता है. इसलिए हमें समाज के बारें में चिंतन करते समय उसके सामाजिक प्रारूप तथा उसके अंत:करण की शुद्धता को नही भूलना चाहिए. विज्ञान की भाँति हम समाज की अवधारणा को तो विज्ञान की तराजू पर तौल तो नही सकते परंतु भारत में सामाजिक समरसता को बढाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार तथा अन्य गैर सरकारी सामाजिक संगठनों को इस दिशा में पहल करना चाहिए. सामाजिक सामंजस्य के इस चिंतन को ध्यान में रखकर विश्व हिन्दू परिषद ने  अपने पंजीकृत संविधान में लिखे गए उद्देश्य के अनुरूप देश भर में सामाजिक समरसता नाम का अपना एक आयाम भी शुरू किया है. इसके अंतर्गत विहिप समय – समय पर महर्षि बाल्मीकि व सिद्धू – कान्हू रथ यात्राएँ निकालता है, विद्यालय, छात्रावास, पुस्तकालय, बाल संस्कार केन्द्र, औषधि केन्द्र, सिलाई केन्द्र, सत्संग, मन्दिर संस्कार केन्द्र और सामाजिक कुरीति, दुर्व्यसन मुक्ति अभियान जैसे कार्य करता है. विश्व हिन्दू परिषद का सामाजिक समरसता नामक प्रयास वास्तव में एक प्रशंसनीय कदम है.                       

-          राजीव गुप्ता 

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

अस्पृश्यता – सामाजिक विकृति


भारत एक प्राचीन देश है. यहाँ की सभ्यता – संस्कृति अपेक्षाकृत अत्यंत पुरानी है. साथ ही प्रकृति सम्मत होने के कारण भारत का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है. भारत के रंग – बिरंगे त्योहारों, यहाँ की अनेक बोलियाँ, विभिन्न प्रकार के परिधानों इत्यादि के कारण इसे बहुधा विविधताओं का देश कहा जाता है. यहाँ पर एक तरफ रेगिस्तान है तो दूसरी तरफ संसार का सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूँजी भी है, कश्मीर जैसा बर्फीला क्षेत्र है तो तमिलनाडू जैसा समुद्री क्षेत्र भी है. तात्पर्य यह है कि भारत में संसार की लगभग सभी प्रकार की ऋतुएँ विद्यमान हैं. संसार में भारत ही मात्र ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की छ: ऋतुएँ पाई जाती हैं. कालांतर में भारत पर अनेक सभ्यताओं का आक्रमण हुआ परंतु वें सभी सभ्यताएँ भारत में आकर भारत की ही हो गईँ. भारत ने सभी सभ्यताओं को अंगीकार कर उनका भारतीयकरण कर लिया. शिक्षा – व्यवस्था के क्षेत्र में भारत में गुरू – शिष्य परंपरा सदियों से रही है अर्थात ज्ञान का अर्जन सुनकर किया जाता था. हमारे विभिन्न वेदों में इस प्रकार के ज्ञान को श्रुति कहा गया है. लिखित लिपि को यदि हम वर्तमान सभ्यता के अध्ययन का आधार मानते हैं तो इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को प्राचीन भारत, पूर्व मध्यकालीन भारत, मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत में बाँटा है. इतिहासकारों के इस इतिहास – विभाजन के आलोक में भारत पर आक्रमणों का दौर पूर्व मध्यकालीन भारत के कालखंड में शुरू हुआ. भारत की समाज – व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था पर आधारित थी जिसने कालांतर में जन्म – आधारित मानकर जाति – व्यवस्था मानकर इसे विकृत कर दिया गया. प्राचीन भारत के इतिहास में हम पढते हैं कि भारत की समाज – व्यवस्था प्रमुख चार वर्णों में विभाजित थी – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. साथ ही अपने – अपने कर्मों के आधार पर एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में जा सकता था. परंतु आधुनिक भारत आते – आते यह वर्ण – व्यवस्था चार वर्णों की अपेक्षा अनेक जातियों में विभाजित हो चुकी थी. बाबा साहब आप्टे के विचारों के संकलन के रूप में अस्तित्व में आई एक अपनी पुस्तक भारतीय समाज चिंतन के व्यक्ति और समाज नामक अध्याय में लिखा गया है कि यह सत्य है कि गीता के ‘कर्मानुबंधानि मनुष्यलोके’ वचनानुसार सम्पूर्ण समुदाय कर्म से बँधा है. कोई भी व्यक्ति कर्म से नही बच सकता है क्योंकि ‘शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मण:’ अर्थात बिना कर्म के शरीर चलना असंभव है. कर्म होने पर उसका परिणाम निश्चित है क्योंकि इस संसार में बिना किसी कारण के कोई भी कार्य सम्भव नही है. मानव-समाज को वर्ण-व्यवस्था के आधार पर वर्गीकृत चार वर्णों पर प्राचीन भारत के मनीषियों की विवेचना के आधार पर ही स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि हमें यह सावधानी भी रखनी पडेगी कि जबतक किसी उच्चतर संस्था का निर्माण न हो जाय, पुरानी संस्थाओं को ध्वस्त करना अत्यंत हानिकारक है. अत: हमें अपने धैर्य का परिचय देना होगा क्योंकि उन्नति की प्रक्रिया क्रमश: शनै: शनै: ही होती है.                
इतिहासकार मानते हैं कि भारत में जिसे किसी भी प्रकार से  मुख्यधारा में स्थान नही मिला उसी पर अन्य सभ्यताओं, पंथों का सर्वाधिक आक्रमण हुआ. उदाहरण के लिए हम आज भी कश्मीर के स्थानीय लोगों से यह कहावत सुन सकते हैं जिसमें वें चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कश्मीर के शासक रिनचेन की कहानी सुनाते हैं. इस कथा का सारांश यह है कि उन दिनों लद्दाख में सनातनधर्म शैवभक्ति का ही बोलबाला था अत: राजा रिनचेन भी अपने आपको शैवभक्त ही मानता था. एक दिन उसके मन में आया कि वहाँ के शैव मठ में जाकर  वहाँ के प्रसिद्ध मठाधीश देवास्वामी से दीक्षा ले लिया जाय. यह सोचकर वह मठाधीश देवास्वामी के पास गया और उनसे दीक्षा देने का आग्रह किया परंतु मठाधीश देवास्वामी ने राजा रिनचेन को दीक्षा देने से मनाकर दिया गया क्योंकि मठाधीश देवास्वामी के अनुसार उनके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों को स्वीकार करने की व्यवस्था नही थी. मठाधीश देवास्वामी की बातें सुनकर राजा रिनचेन के मन को बहुत ठेस लगी. उन्ही दिनों स्वात की घाटी से मीर शाह ने आकर कश्मीर में शरण लिया था. राजा रिनचेन और मीर शाह की संयोगवश भेंट हुई और धर्म को लेकर उन दोनों में रात भर संवाद हुआ. उस संवाद का निर्णय यह हुआ कि भोर होने से पहले राजा रिनचेन को जो भी धार्मिक व्यक्ति दिखाई देगा वह उसी के पंथ को अपना लेगा. संयोगवश उन दिनों बुलबुलशाह कश्मीर में ईस्लाम का प्रचार कर रहे थे, अत: पौ फटने से पूर्व ही राजा रिनचेन को अजान की आवाज़ सुनाई पडी और निर्णयानुसार राजा रिनचेन इस्लाम पंथ को स्वीकार कर सुल्तान सदरुद्दीन बना. सबसे पहले सुल्तान सदरुद्दीन ने मठाधीश देवास्वामी पर आक्रमण कर उनसे यह कहा कि आपके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों के लिए जगह नही है और हमारे धर्म में किसी के लिए कोई रोक नही है. परिणामत: मठाधीश देवास्वामी को अपने आपको सेनाओं से घिरा देख अपने शिष्यों समेत ईस्लाम पंथ को स्वीकर करना पडा. 
स्वामी विवेकानन्द ने समाज का चिंतन करते हुए कहा था कि सभी हितकर सामाजिक परिवर्तन अध्यात्मिक शक्तियों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं तथा यही अध्यात्मिक शक्तियाँ ही आपस में मिलकर एक सबल समाज का निर्माण करती है. गुलामी के कालखंड में हुए भारत के पराभव को पुन: उसी उन्नति के स्थान पर स्थापित करने हेतु सबसे पहले हमें भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड से खत्म कर तत्पश्चात समाज-उत्थान का कार्य करना होगा. हमें यह समझना होगा कि किसी मनुष्य का जन्म किसी विशेषकुल या घर में कभी नही होता अपितु मनुष्य का जन्म किसी मनुष्य के घर में ही होता है. व्यक्तियों से मिलकर परिवार की संरचना होती है और परिवारों से ही मिलकर एक समाज का निर्माण होता. मनुष्य ने अपने जीवन-कार्यों के लिए अपनी सुविधा हेतु कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया. कालंतार में इन सामाजिक व्यवस्थाओं को कुरीतियों ने अपने चंगुल में भी फँसा लिया जिसे समाज सुधारकों ने निदान करने हेतु समय – समय पर अभियान भी चलाया. भारत के इतिहास में इस प्रकार की अनेक घटनाएँ हैं. संक्षेप में, भारत के इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने भारत की एकता – अंखडता को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया. कालांतर में इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने ही भारत में अस्पृश्यता को जन्म दिया. विश्व हिन्दू परिषद ने अस्पृश्यता निवारण हेतु समय – समय पर आन्दोलन चलाया है जो कि वास्तव में एक प्रशंसनीय पहल है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.  
- राजीव गुप्ता

रविवार, 17 अगस्त 2014

विश्व हिन्दू परिषद् : एक अनन्य यात्रा


रघुनन्दन प्रसाद शर्मा ने अपनी पुस्तक विश्व हिन्दू परिषद की विकास यात्रा में लिखा है कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा राज्य में अशिक्षित, आर्थिक कमजोर, अस्पृश्य समाज, वनवासी, गिरिवासी आदि को अमेरिका इत्यादि अन्य देशों से आने वाले करोडों डालरों की मदद से तरह – तरह के हथकंडे अपनाकर ईसाई पादरियों द्वारा धर्मांतरित किए जाने की समस्या की वास्तविकता जानने हेतु वर्ष 1955 में नियुक्त नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने विश्व हिन्दू परिषद के गठन का तात्कालिक कारण बना. वर्ष 1957 में नियोगी कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही देश भर में हडकंप – सा मच गया क्योंकि इस रिपोर्ट में ईसाई पादरियों द्वारा अपनाए जा रहे तरह – तरह साधनों का व्यवहारिक आधार पर विश्लेषण देश में पहली बार हुआ था. इस रिपोर्ट के अनुसार विदेशी धन के आधार पर पादरीगण बडे – बडे स्कूल, छात्रावास, अनाथालय, अस्पताल इत्यादि सेवा कार्यों के माध्यम से भारत के निर्धन समाज को बडी आसानी से ईसाई पंथ में बहुत ही सरलता से धर्मांतरित कर लेते थे. इस समस्या के साथ – साथ हिन्दुस्थान समाचार के प्रतिनिधि के तौर पर विदेशों की यात्रा के दौरान हुए अनुभव से हिन्दुस्थान समाचार के संस्थापक दादा साहब आप्टे भारत की संस्कृति से शनै: – शनै: दूर होते जा रहे विदेशों में बसे भारतीयों की दशा से बहुत चिंतित थे. इस संबंध में श्री आप्टे की व्याकुलता को लोकमान्य तिलक मराठी दैनिक ‘केसरी’ में छपे उनके लेखों को पढकर अनुभव किया जा सकता है. उन्होनें लिखा कि अब हिन्दुओं के अंतर्राष्ट्रीय संग़ठन की आवश्यकता हो गई है क्योंकि हिन्दू समाज के महापुरुष राम, कृष्ण, मनु, याज्ञवल्क्य जैसे मनीषियों के सामाजिक आदर्श आज नही है. त्रिनिदाद में भारत से लगभग 150 वर्ष पूर्व गए हिन्दू बडी संख्या में रह रहे थे. वे धीरे – धीरे अपनी मातृभूमि से कट चुके थे. परिणामत: वें हिन्दू संस्कारों से वंचित होते जा रहे थे. अपनी संतानों और भावी पीढी के बच्चों को पाश्चात्य प्रभावों से बचाने की दृष्टि से कालांतर में त्रिनिदाद के सांसद डा. शम्भूनाथ कपिलदेव को त्रिनिदाद में रह रहे हिन्दू परिवारों ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भारत सरकार के पास भेजा ताकि भारत सरकार इस सूख रही हिन्दू धारा को सजीव करने हेतु कुछ पंडित भिजवाने की व्यवस्था करे. परंतु भारत सरकार के पास इस प्रकार की कोई दूरदृष्टि न होने कारण डा. शम्भूनाथ कपिलदेव को बहुत निराशा हुई. तत्पश्चात श्री कपिलदेव की भेंट माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरू जी’ से हुई. श्री गुरू जी ने तात्कालिक तौर पर त्रिनिदाद के माननीय सांसद की समस्या का समाधान तो कर दिया परंतु श्री गुरू जी ने हिन्दू की इस दशा पर वैश्विक स्तर पर चिंतन किया और अंत्तोगत्वा उन्हे विश्व स्तर एक हिन्दू संगठन बनाने की युक्ति सूझी. मुम्बई के स्वामी चिन्मयानन्द विश्वभर में हिन्दू संस्कृति का प्रचार – प्रसार करने में लगे थे. वे युवा पीढी को हिन्दू संस्कृति से अवगत करवाना चाह रहे थे. अपने इस परिभ्रमण के कारण उनके मन में हिन्दुओं के एक विश्वव्यापी संगठन की इच्छा बलवती हो चुकी थी. अपने इस चिंतन को स्वामी जी ने अपनी पत्रिका ‘तपोवन प्रसाद’ के नवम्बर 1963 के अंक में लिखा भी था. इन्ही सब मानक बिन्दुओं पर चिंतन करते हुए माधव सदाशिवराव  गोलवलकर की प्रेरणा से श्री आप्टे जी ने लगातार नौ मास तक सतत प्रवास किया. अंतत: सर्वश्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर , एस. एस. आप्टे, स्वामी चिन्मयानन्द जैसे भारत के अनेक महानतम विचारकों,  श्रेष्ठतम धर्माचार्यो और उच्चतम सामाजिक चिंतको के बीच परस्पर संवाद और चिंतन – मनन चल रहा था. इसी सामूहिक विचार-विमर्श का अंकुर "विश्व हिन्दू परिषद्" के रूप में प्रस्फुटित हुआ जिसकी स्थापना मुम्बई के सान्दीपनी साधनालय में 29 अगस्त, 1964 मे जन्माष्ट्मी के दिन हुई.


इस पृष्ठभूमि में ही विश्व हिन्दू परिषद नामक एक सामाजिक संगठन अस्तित्व में आया. विश्व हिन्दू परिषद भारत तथा विदेशों में रह रहे हिन्दुओं की एक सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्था है. परंतु वर्तमान समय में प्राय: विश्व हिन्दू परिषद नाम की चर्चा आते ही हमारे मन – मस्तिष्क में एक ऐसे संगठन की छवि परिलक्षित होती है जिसका प्रमुख कार्य भारत के हिन्दुओं की ठेकेदार के रूप में धरना – प्रदर्शन करना ही है जबकि वास्तविकता इससे कहीं परे है. इतिहास साक्षी है कि जिस राष्ट्र के नागरिक वहां की संस्कृति, पूर्वजों, धर्म, मान्यताओं, मूल्यों और आदर्शों को विस्मृत कर देते है तो उस राष्ट्र का अस्तित्व अधिकतम दिन तक नहीं रह जाता, यही शाश्वत सत्य है. हमें सदैव याद रखना चाहिए कि विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओ में से सिर्फ भारतीय सभ्यता का ही अस्तित्व बचा है बाकी सभी सभ्यताएं कालग्रसित हो चुकी है. समय बीतता गया. पराधीनता की बेड़ियों के विरुद्ध हजारो वर्षों से अनवरत चल रहे संघर्षों के पश्चात हिन्दुस्तान ने अपने को स्वतंत्र कर उन्मुक्त गगन में अपना झंडा तो लहराया परन्तु अपनी उन सभी विशिष्टताओं और महान आदर्शो को विस्मृति के गहन अन्धकार में धकेलना भी शुरू कर दिया जिसकी वजह से वह अपनी प्राचीन विरासत के बल पर अखिल-विश्व के मानस पटल पर छाप छोड़ता हुआ विश्व गुरु के पद पर आसीन रहा. उसने अपने गौरवशाली विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, जीवन – दर्शन जैसी श्रेष्ठतम ऋचाओं के साथ-साथ श्रीराम,  श्रीकृष्ण, गौतम,  महावीर,  गुरुनानक जैसे पुरखों तथा उनके मार्गदर्शनों जिनका उल्लेख रामायण, महाभारत,  गीता जैसे उच्च कोटि-ग्रंथों में मिलता है, को भी विस्मृत कर किनारे लगा दिया. भौतिकता की आंधी में दुर्दांत आक्रंताओ को धूल चटाने वाला और संजीवनी जैसी औषधियों से उन्नत हिमालय,  पतित – पावनी गंगा, पुण्य – प्रदायी तीर्थ,  सर्वदुःखनाशक और समृद्धि की प्रतीक गईया की महानता को भी हमने विस्मृति के हवाले कर दिया. परिणामतः स्वत्व और गौरव के अभाव में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः'  और 'वसुधैव कुटुम्बकं' का उद्घोष करने वाली दिव्य संस्कृति उदासीनता की भेट चढ़ गयी. नर से नारायण तक का मार्ग प्रशस्त करने वाली संस्कृति भेदोपभेद के परिणामस्वरूप पतनोन्मुख हो गयी. स्वतन्त्रता-पश्चात भी भारत – माता ऐसी विषम परिस्थितियों और विनाशकारी तत्वों से जकड़ी हुई थी जिनके दमन की नितांत आवश्यकता के साथ –साथ भारत को पुनः उसी परमवैभव तक पहुचाने की अनिवार्यता हो गयी थी. संसार का मार्गदर्शन करने वाली 'समाज-व्यवस्था' को विभिन्न प्रकार की विकृतियों और कुरीतियों ने अपनी चपेट में ले लिया. सामाजिक समरसता को अस्पृश्यता की नजर लग गयी. इतना ही नही भारत का समाज आज जाति – प्रथा नामक कुरीति के चंगुल में फँस गया है. समाज से जाति – प्रथा नामक इस कुरीति को दूर करने का हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा. अत: हम सबका यह परम कर्तव्य है भारतीय समाज को जाति नामक दंश से मुक्त किया जाय तभी वास्तव में हम अपने समाज के साथ न्याय कर पाएँगे.  

-          राजीव गुप्ता 

गुरुवार, 26 जून 2014

दिल्ली विश्वविद्यालय शैक्षणिक संस्थान कम, राजनीतिक अखाड़ा ज्यादा


विश्व प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में इन दिनों कोहराम मचा हुआ है। कहीं पर शिक्षकहड़ताल कर रहें हैं तो कही पर विद्यार्थी विजय जुलूस निकाल रहें हैं। इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति के इस्तीफा देने की खबर भी आई परंतु उस खबर की पुष्टि नहीं हो पाई। दिल्ली विश्वविद्यालय में मचे इस कोहराम के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने की आकांक्षा पाले हुए नए विद्यार्थियों का भविष्य अन्धकारमय हो गया है। कट-ऑफ़ के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कालेजों में प्रवेश को लेकर इस समय जहां चौतरफा हलचल रहती थी और वहां आनेवाले नव-आगंतुक विद्यार्थियों के स्वागत की खबर से लेकर फैशन तक की खबर अखबारों की सुर्खियां बनती थी, वहीं आज सन्नाटा पसरा हुआ है।
दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) इस समय आमने-सामने हैं। इस तनातनी को दूर करने के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा परंतु सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जाने की सलाह देकर किनारा कर लिया साथ ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों को एक पत्र लिखकर 10+2+3 शिक्षा नीति का पालन करने को कहा, अन्यथा अनुदान बंद करने की चेतावनी दी। इस पर दिल्ली विश्वविद्यालय के लगभग अधिकांश कॉलेजों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को पत्र लिखकर अपनी स्वीकृति दी कि वें 10+2+3 शिक्षा नीति का उल्लंघन नहीं करेगें और चार साल के स्नातक कोर्स को तीन साल का ही करेगें। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस पत्र को दिल्ली विश्वविद्यालय ने उसकी स्वायत्ता पर हमला करार दिया।
यदि हम इस घटना की शुरुआत से मूल्यांकन करें तो पाएगें कि यह मामला स्वायत्ता बनाम तनाशाही का नहीं अपितु संवादहीनता’ का है। 27 अप्रैल, 2012 को ही जब दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने स्नातक के चार वर्षीय पाठ्यक्रम (एफ.वाई.यू.पी.) की जानकारी मीडिया में दी तभी से उपकुलपति के खिलाफ शिक्षक संघ (डूटा) और विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के विद्यार्थी सड़कों पर उतर गए। विरोध कर रहे शिक्षकों और विद्यार्थियों का यह तर्क था कि तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के मौखिक आदेश पर ही दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने स्नातक के चार वर्षीय पाठ्यक्रम को लागू करने की घोषणा की है। स्नातक के पाठ्यक्रम को चार वर्ष का इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका व अन्य देशों में पढ़ने के लिए चार वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम पढ़ना जरूरी होता है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय का तर्क था कि चूंकि उनके यहां भारत के कोने-कोने से विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते हैं और उन सभी में एकरूपता नहीं होती है। उन विद्यार्थियों में एकरूपता लाने के लिए पहले वर्ष में विशेष प्रकार का पाठ्यक्रम बनाया गया है। साथ ही यदि कोई विद्यार्थी दो वर्ष में अपनी स्नातक की पढ़ाई खत्म करना चाहता है तो वह डिप्लोमा की डिग्री लेकर कर सकता है, स्नातक की पढ़ाई तीन वर्ष में खत्म करनेवालों विद्यार्थियों को स्नातकप्रोग्राम की डिग्री मिलेगी और स्नातकआनर्स की डिग्री विद्यार्थी को चार वर्ष के पाठ्यक्रम को पढ़ने के बाद ही मिलेगी। इसी सूचना को 26 अप्रैल, 2013 को शशि थरूर ने राज्यसभा में बताया कि डीयू चार वर्ष के पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए तैयार है
वहीं 3 जुलाई, 2013 को विभिन्न राजनीतिक दलों ने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा चार वर्षीय नए सिस्टम को नहीं रोके जाने का खुलकर विरोध किया। इतना ही नहीं स्नातक को चार वर्ष के स्थान पर तीन वर्ष करने की बात को दिल्ली भाजपा ने बकायदा अपने एजेंडे में जगह दिया। इससे बड़ी हास्यापद स्थिति और क्या होगी कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव को ध्यान में रखकर एक तरफ जहां एन.एस.यू.आई. पिछ्ले कुछ दिनों से दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा तय किए गए एफ.वाई.यू.पी. को वापस लेने की मांग कर रहा है तो ठीक इसके विपरीत कांग्रेस के प्रमुख नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी अप्रत्यक्ष रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा तय किए गए एफ.वाई.यू.पी. को यथावत बनाए रखने की पुरजोर तरीके से वकालत कर रहे हैं। तनातनी के इस वातावरण में दिल्ली विश्वविद्यालय एक शैक्षणिक संस्थान कम, राजनीतिक अखाड़ा अधिक लग रहा है।
मानव इतिहास के आदिकाल के समय से ही अलग-अलग स्वरूपों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होता रहा है। कालांतर में प्रत्येक राष्ट्र ने अपने मूल्यों को ध्यान में रखते हुए अपने सामजिकसंस्कृति की अस्मिता को अभिव्यक्ति देने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए एक शिक्षा प्रणाली का ताना-बाना बुना। इसी कड़ी में भारत सरकार ने वर्ष 1964 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में स्कूली शिक्षा प्रणाली को नया आकार और नई दिशा देने के उद्देश्य से एक आयोग का गठन किया जिसे कोठारी आयोग (1964-1966) के नाम से जाना जाता है।कोठारी आयोगदेश का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने अपनी रिपार्ट में सामाजिक बदलावों को ध्यान में रखकर कुछ ठोस सुझाव देते हुए देश में समान स्कूल प्रणाली(कामन स्कूल सिस्टम) की वकालत की और कहा कि समान स्कूल प्रणाली पर ही एक ऐसी राष्ट्रीय व्यवस्था तैयार हो सकेगी, जहां सभी तबके के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख करेंगे तथा पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
24 जुलाई,1968 को भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई, जो कि पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर ही आधारित थी। सामाजिक दक्षता,राष्ट्रीय एकता एवं समाजवादी समाज की स्थापना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।पूरे देश में शिक्षा की समान संरचना बनी और लगभग सभी राज्यों द्वारा10+2+3की प्रणाली को मान लेना1968की शिक्षा नीति की सबसे बड़ी देन है। भारतीय विचारधारा के अनुसार मनुष्य स्वयं एक अमूल्य संपदा और संसाधन है। आवश्यकता इस बात की है कि उसकी देखभाल में गतिशीलता एवं संवेदनशीलता हो। कुल मिलाकर, यह कहना सही होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। इसी सिद्धांत को भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण की धुरी माना गया है।वर्तमान समय में हमारा देश आर्थिक और तकनीकि समृद्धि के पथ पर अग्रसर है। शिक्षा के माध्यम से ही हम समाज के हर वर्ग तक पहुंचकर उनका न्यायपूर्वक मूल्यांकन कर सकते हैं। इसी सन्दर्भ मेंइसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी, 1985में यह घोषणा की कि देश में अब एक नई शिक्षा नीति निर्मित की जाएगी। कालांतर में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत शिक्षा विभाग ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 बनाया और 1992 में इसमें कुछ संसोधन किया गया।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के तीसरे अध्याय में आयोग की शक्तियां और कृत्य को परिभाषित कर यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा की अभिवृद्धि और उसमें एकसूत्रता लाने के लिए विश्वविद्यालयों में अध्यापन, परीक्षा और अनुसंधान के स्तरमानों का निर्धारण करने के लिए जो आयोग ठीक समझे वह कार्यवाही कर सकता है। इतना ही नही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम-1956 के तीसरे अध्याय के अनुसार, आयोग के चौथे अध्याय में यह भी लिखा गया है कि यदि केन्द्र सरकार और आयोग के बीच यह विवाद उठता है कि कोई प्रश्न राष्ट्रीय उद्देश्यों से संबंधित नीति का है या नहीं तो उस पर केन्द्र सरकार का विनिश्चय ही अंतिम होगा।कोठारी आयोग, राधाकृष्णन आयोग, मुदलियार आयोग और यशपाल समिति ने हमेशा ही शिक्षण संस्थानों को ज्ञान-सृजन पर तरह-तरह की सलाह दिया है। साथ ही हमें भी यहध्यान रखना चाहिए कि स्वायत्तता का अर्थ निरंकुशता अथवा तानाशाही कभी नहीं होता। हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वायत्तता और स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी अवश्य ही रहती है। बहरहाल, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में पनपे इस गतिरोध से वहां पढ़ने की लालसा लिए हुए विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटका है, साथ ही उनके माता-पिता भी परेशान हैं जो कि किसी सभ्य समाज के लिए शोभनीय नहीं है।
 राजीव गुप्ता