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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

6 दिसम्बर 1992 – श्री चम्पत राय जी, महामंत्री- विश्व हिन्दू परिषद


प्र. 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या – स्थित विवादित ढाँचे को गिरा दिया गया. आज 6 दिसम्बर, 2013 को लगभग 21 वर्ष बीत चुके है. आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?

उ. 6 दिसम्बर तो प्रत्येक वर्ष आता है लेकिन आपके प्रश्न के उत्तर में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि 6 दिसम्बर 1992 को भारत के हिन्दू समाज का स्वाभिमान जागा. गुलामी का कलंक हमारे माथे पर नही चाहिए, यह विचार हिन्दू समाज मे आया परिणामत: 1528 के एक आक्रमणकारी की निशानी आनन-फानन में गायब हो गई और दुनियाँ के सभी हिन्दूओं का हृदय आनन्दित हो गया, भले ही वह मुँह से बोले अथवा न बोले. अनेक लोगों ने लिखा कि गुब्बारे को बहुत अधिक दबाओगे तो वह फट जायेगा.हिन्दू-समाज को दबाते रहो, दबाते रहो..हिन्दू समाज को दबाते रहने का जो परिणाम होना था वह 6 दिसम्बर 1992 को हो गया.

प्र. आपने हिन्दू समाज को दबाने की बात कही. हिन्दू समाज को दबाने की बात को थोडा विस्तार से बताईये.

उ. हमारे सामने एक बहुत छोटा सा प्रश्न था कि उत्तरप्रदेश सरकार ने तीर्थयात्रियों की सुविधा विकास हेतु रामजन्मभूमि के चारों ओर कुछ भूमि का अधिग्रहण किया था. लेकिन उससे बहुत पहले हम रामजन्मभूमि की पूर्व- दिशा में तमाम जमीन खरीद चुके थे. उत्तरप्रदेश सरकार ने हमारी उस जमीन का अधिग्रहण कर लिया था. यह पूरा मामला इलाहाबाद की उच्च न्यायालय में चला गया. उच्च न्यायालय द्वारा दोनों तरफ के पक्षों को सुना गया. अदालत का फैसला आना बाकी था. हमारा कहना था कि या तो सरकार के अधिग्रहण को स्वीकार किया जाय अथवा अस्वीकार किया जाय, परंतु फैसला तो दीजिए. अगर आप सरकार के जमीन अधिग्रहण को अस्वीकार करते है तो जमीन हमने खरीद रखा है परिणामत: हम रामजन्मभूमि का निर्माण कार्य शुरू करते है और यदि आप सरकार के जमीन अधिग्रहण को स्वीकार करते हैं तो स्थितियाँ बदल जायेंगी. सभी न्यायधीशों ने अपनी राय दे दी परंतु न्यायधीश रजा साहब ने कहा कि मैं अपनी राय 11 दिसम्बर को दूंगा. परंतु क्यों ? ऐसा मुझे लगता है कि रजा साहब ही चाहते थे कि हिन्दू समाज का गुस्सा फूट पडे. हिन्दू समाज का गुस्सा फूट पडा और 6 दिसम्बर 1992 को वह मूल समस्या ही खत्म हो गई.

प्र. इस पूरे प्रकरण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्या भूमिका थी ?

उ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस समय के वरिष्ठ अधिकारी पूज्य रज्जू भैया ने प्रधानमंत्री से निवेदन किया था कि उच्च न्यायालय को कहिये कि वह अपने सुरक्षित निर्णय को सुनाये परंतु नही बनी बात. इतिहास की गलतियाँ तो ऐसी ही होती है.
प्र. पूज्य रज्जू भैया के निवेदन पर प्रधानमंत्री का क्या रवैया था ?

उ. ये तो हमें नही मालूम. पूज्य रज्जू भैया ने तो अपनी बात कही परंतु सरकार ने कुछ नही किया तो शब्दों की प्रतिक्रिया तो कुछ भी हो सकती है.

प्र. क्या यह सच है कि विवादित ढाँचे को गिराने की पूर्व-योजना थी ?

उ. बिल्कुल नही. कोई पूर्व-योजना नही थी. वैसे भी जहाँ लाखों लोग मौजूद हों वहाँ कोई नीति बन ही नही सकती. उन लाखों लोगों में हजारों गुप्तचर सेवा के लोग होंगे. सादे वेश में पुलिस जरूर होगी. दुनिया के देशों के सैकडो पत्रकार होंगे. कोई किसी को जानता नही, पहचानता नही. ऐसी भीड में कोई नातियाँ बनती है ?

प्र. तो फिर कारसेवा हुई क्यों थी क्योकि अदालत का फैसला तो आया नही था ?

उ. कारसेवा तो अयोध्या में भगवान रामलला का मन्दिर निर्माण का प्रारंभ करने के लिए हुई थी. कोर्ट ने सरकार के जमीन अधिग्रहण को रद्द कर दिया था. लेकिन हमारी जमीन पर से हमारा मालिकाना हक थोडे ही रद्द हो गया था. कारसेवा तो हम अपनी जमीन पर कर रहे थे. उस कारसेवा में हम अपनी जमीन पर चबूतरे का निर्माण करते, मन्दिर की नींव रखते.

प्र. उस कारसेवा का स्वरूप क्या तय किया गया था ?

उ. उस कारसेवा का स्वरूप यह था कि मन्दिर निर्माण हेतु समाज आयेगा और स्वयं मजदूर बनेगा. इससे अधिक कारसेवा का कोई अर्थ नही था. आपने देखा होगा कि गुरुद्वारों में कारसेवा होती ही है. हर आदमी अपनी-अपनी तरफ से सेवा करता है.

प्र. परंतु सुनने में ऐसा भी आता है कि श्री अशोक सिंघल जी ने आये हुए कारसेवकों द्वारा सरयू की एक मुट्ठी बालू उक्त स्थान पर डाल देंगे. क्या ऐसा कुछ प्रस्ताव श्री अशोक सिंघल जी ने दिया था ?

उ. नही श्री अशोक सिंघल जी का ऐसा कोई प्रस्ताव नही था परंतु हाँ यह बात जरूर आई थी कि जनता को सरयू तट पर भेज दिया जाय और वें सरयू की एक मुट्ठी बालू लाकर यहाँ डाल दें. लेकिन यह बात स्वीकार नही हुई.
प्र. आपकी कारसेवा की घोषणा के वक्त क्या प्रधानमंत्री ने आपसे कुछ समय मांगा था ?

उ. हाँ ! साधु – संत प्रधानमंत्री से मिलने गये थे उसमें उन्होने संतो से कहाँ था कि मुझे कोई रास्ता निकालने के लिए कुछ समय दीजिए. प्रधानमंत्री ने संभवत: 23 या 24 जुलाई, 1992 को चार महीने का समय माँगा था जो कि जुलाई, अगस्त, सितम्बर अक्टूबर. नवम्बर....नवम्बर में ही खत्म हो गया था.

प्र. इस बीच क्या सरकार ने कोई रास्ता निकालने की कोशिश की थी अथवा श्री नरसिम्हा राव चाहते थे कि विहिप को कारसेवा करने दिया जाय ?

उ. सरकार के अन्दर-अन्दर क्या चल रहा था ये तो सरकार बताये. हमारा संबंध तो समाज से था परंतु श्री नरसिम्हा राव अपने मन से यह जरूर चाहते होंगे कि देश पर से यह कलंक जरूर हटना चाहिए.

प्र. आपको ऐसा क्यों और कैसे लगता है कि श्री नरसिम्हा राव अपने मन से यह जरूर चाहते होंगे कि देश पर से यह कलंक जरूर हटना चाहिए ?

उ. हाँ ! मुझे श्री नरसिम्हा राव के व्यवहार से ऐसा लगता है. उसके कई प्रमाण हैं जिस आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि श्री नरसिम्हा राव अपने मन से यह जरूर चाहते थे कि देश पर से यह कलंक जरूर हटना चाहिए, जैसे वे चाहते तो जिस केन्द्रीय सुरक्षा बलों को अयोध्या से 15 किमी. दूर रोक रखा था, उसे राज्य सरकार को सौंप देते परंतु अयोध्या की सुरक्षा स्थानीय प्रशासन के हाथों में ही रहने दिया. केन्द्रीय सुरक्षा बलों अयोध्या की सुरक्षा स्थानीय प्रशासन के हाथों में सौंप देते, वहीं बात खत्म हो जाती. परंतु उन्होने ऐसा नही किया.

प्र. समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार अभी हाल में आपने फैज़ाबाद में कहा था कि यदि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बनते है तो अयोध्या में राममन्दिर का निर्माण कार्य शुरू हो जायेगा. इस पर आपकी क्या टिप्प्णी है ?

उ. समाचार पत्रों की शब्दावली क्या है यह पने पढा नही है. महत्वपूर्ण यह नही है कि कौन व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है, महत्वपूर्ण यह है कि अयोध्या के इस पवित्र स्थान को अपने स्वाभिमान, सम्मान का विषय मानने वाले और बाबर के प्रतीक को अपमान समझने वाले ऐसे सांसदो की संख्या संसद के अन्दर कितनी है. अगर संसद में राम- भक्त सांसदो की संख्या नही है तो देश का प्रधानमंत्री कोई भी बनता रहे, श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी भी देश के प्रधानमंत्री थे और जब श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी से राम-मन्दिर की बात की गई तो उन्होने कहा कि आपने इस काम को करने की ताकत ही नही दी है. श्री अटल जी की बात बिल्कुल ठीक थी.

प्र. आपकी इस बात से क्या यह मान लिया जाय कि 2014 के चुनाव में भाजपा के टिकट बँटवारे पर विहिप अपना दबाव बनाकर राम-भक्तों को टिकट दिलवायेगा ?

उ. ऐसा नही है. हम देश के समस्त हिन्दू समाज को यह आह्वान कर रहें हैं कि 18 वर्ष के युवकों सहित देश के  सभी नागरिको को अपना मत अवश्य देने जाना चाहिए, अपने मित्र को वोट देना, अपनी बिरादरी को वोट देना या देश के लिए वोट देना और अपना मत देते समय यह विचार को जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि हम किस उद्देश्य के लिए अपना मत दे रहें हैं अर्थात जिससे हिन्दुस्थान का गौरव बढे उस उद्देश्य के लिए देना. मै यह दावे से कह सकता हूँ कि लोग यदि देश के लिए अपना मत देंगे तो संसद में अच्छे लोग चुनकर जायेंगे.
  
प्र. अयोध्या में मन्दिर-निर्माण को लेकर विहिप कुछ दिन पूर्व ही लगभग देश के कई वर्तमान सांसदो से भी मिला है. आपको सांसदो से कैसी प्रतिक्रिया मिली ?

उ. हाँ ! हमारे कार्यकर्ताओं ने अभी कुछ दिन पूर्व ही देश के 500 से अधिक वर्तमान सांसदों से मिले थे. देश के सभी राज्यों से हमारे कार्यकर्ता आये थे और उन्होने अपने – अपने राज्य के सभी राज्यसभा और लोकसभा सांसदों से भेंट की है, जिसमें कांग्रेस सहित सभी दलों के सांसद थे जिनमें हिन्दू-मुसलमान सहित सभी समाज व सभी मत-पंथो के सांसद हैं. हमारे कार्यकर्ताओं ने माननीय सांसदो को रामजन्म भूमि के विषय पर एक तथ्य-पुस्तिका  दी जिसमें यह सब बातें लिखी गई थी कि राममन्दिर विषय पर मुस्लिम समुदाय ने एक वचन दिया था, भारत सरकार ने एक श्वेत पत्र भी निकाला था, सितम्बर 1994 को कुछ शपथ दिया गया जो कि रिकार्ड में है. हमारे कार्यकर्ता माननीय सांसदो को ये सब बातें याद दिलाने गए थे और उनसे निवेदन किया था कि राममन्दिर विषय पर एक ही हल है – कानून. आप अपने दलों से इस विषय पर चर्चा कीजिए और इस विषय को देश के सम्मान का विषय बनाईये. सभी सांसदो ने हमारे मत से अपनी सहमति जताई और यहाँ तक कहा कि हमें रामममन्दिर विषय पर इन सब तथ्यों की जानकारी ही नही थी कि मुस्लिम समुदाय का वचन क्या है, सरकार का श्वेत-पत्र क्या है. इतना ही नही हमने राममन्दिर – संबंधित सभी जानकारी राष्ट्रपति महोदय, श्री मुलायम सिंह यादव सहित सभी सांसदो को दिया. प्रत्येक सांसदों ने अपनी पार्टी की व्हिप-व्यवस्था की बात करते हुए कहा कि हम चाहकर भी कुछ नही कर सकते.  

- राजीव गुप्ता

2 टिप्‍पणियां:

Ravi Ojha ने कहा…

वाह बेहतरीन साक्षात्कार ! सटीक प्रश्न सटीक उत्तर ……!!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (07-12-2013) को "याद आती है माँ" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1454 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'