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बुधवार, 29 मई 2013

नक्सली हिंसा का प्रतिकार विकास से हो



अमेरिकी मार्क्सवादी नेता बाब अवेकिन के शब्दों में किसी भी प्रकार की क्रांति न तो बदले की कार्यवाही है और न ही मौज़ूदा तंत्र की कुछ स्थितियों को बदलने प्रक्रिया है अपितु यह मानवता की मुक्ति का एक उपक्रम है. परंतु मानवाधिकार को ढाल बनाकर भारत की धरा को मानवरक्तिमा से रंगने वालें बन्दूकधारी-कारोबारियों को बाब अवेकिन की यह बात समझ नही आयेगी. भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी) की दंड्कारण्य स्पेशल ज़ोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए बताया कि 25 मई को कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हमला इसलिये किया था क्योंकि इन्हे सलवा ज़ुडूम के प्रणेता महेन्द्र कर्मा को मारकर बदला लेना था. केन्द्र-सरकार जब नेताओं की सुरक्षा नही कर सकती और उसकी नाक के नीचे से इन नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार और पैसे पहुँचते है तो आम जनता की सुरक्षा तो भगवान भरोसे ही है. सरकार व नक्सलियो के बीच आम आदिवासी मात्र शरणार्थी बनकर रह गया है. न कोई प्राकृतिक आपदा आई, न कोई महामारी फैली परन्तु फिर भी आम आदिवासी को सरकार के राहत शिविरों मे रहना पड रहा है. देखते ही देखते पूरा क्षेत्र राहत शिविरों से पट  गया. जंगल मे राज़ा की भाँति विचरण करने वाला आदिवासी राहत शिविरों मे रहकर सरकारी दिनचर्या के हिसाब से जीने को मजबूर हो गया. उसके लिये इधर कुआँ उधर खाई वाली कहानी बन गई है. सरकार की बात करेगा तो नक्सली की गोली खानी पडेगी और अगर राहत शिविर छोडकर जायेगा तो नक्सली का जासूस कहकर सरकार की गोली खानी पडेगी. उसकी आज़ादी पूर्णत: छिन चुकी है या यूँ कहे कि उसके लिये अब आज़ादी के मायने ही बदल चुके है.
         
देश की विकास-धारा को गति देने वाला छत्तीसगढ देश का 20 प्रतिशत स्टील और 18 प्रतिशत सीमेंट का उत्पादन करता है. परंतु यह देश का दुर्भाग्य ही है कि नक्सलवाद के चलते छत्तीसगढ में उथल-पुथल मची हुई है. शायद नक्सली समर्थक अपने कुतर्कों के आधार पर आम आदिवासी को पूरी तरह बरगालाने मे सफल हो गये है कि सराकर के विकास का अर्थ है उनसे उनकी संपदा से बेदखल कर देना. केन्द्र सरकार को छत्तीसगढ को विशेष तौर पर अलग से आर्थिक मदद उडीसा के कालाहांडी की तर्ज़ पर देना चाहिये क्योंकि अकेले छत्तीसगढ में 32 प्रतिशत आदिवासी है और जबतक उन्हे सडक या रेल तंत्र से जोडा नही जायेगा विकास का असली अर्थ ये भटके हुए आदिवासी नही समझ पायेंगे. जल्दी से जल्दी जयराम रमेश द्वारा 50 करोड रूपये की मूल्य के प्रोजेक्ट गवर्नेंस एंड एसिलरेटेड लाईवली हुड्स सिक्योरिटी प्रोजेक्ट्स स्कीम (गोल्स) को लागू किया जाय. ताकि इस प्रोजेक्ट के द्वारा असमानता की खाई को पाटा जा सके. अन्यथा नक्सली समर्थक नेताओं व गैर सरकारी संगठनो के चंगुल मे फँसकर ये भटके हुए आदिवासी यूँ ही बन्दूक उठाते रहेंगे. अत: जितनी जल्दी हो सके केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर इस भयंकर समस्या को समय रहते सुलझा लेना चाहिये.

यह एक शाश्वत है कि किसी भी विचार से शत-प्रतिशत सहमत व असहमत नही हुआ जा सकता. इसके लिये लोकतंत्र मे तर्काधारित संवाद किया जा सकता है और अपने वैचारिक प्रकटीकरण के लिये संविधान ने हमें यह व्यवस्था दी है. नीतियों मे न्यूनता हो सकती है, जिसे समयानुसार संशोधित किया जा सकता है परंतु संविधान द्वारा प्रदत्त लोक-कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को ही धराशायी करने का अधिकार किसी को कैसे दिया जा सकता है. हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि लोकतंत्र में संवाद वह हथियार है जिसकी मदद से कोई भी जंग न केवल जीती जा सकती है अपितु संपूर्ण मानवता की भी रक्षा की जाती है. कोई भी देश वहाँ के निर्मित संविधान से चलता है परंतु स्थिति ज्यादा खतरनाक तब हो जाती है जब आम जनता को संविधान के खिलाफ ही भडकाकर उन्हे हथियार उठाने के लिये विवश कर दिया जाता हो. परंतु कुछ चिंतक-वर्ग अपनी कुंठित मानसिकता के चलते देश को अराजकता के गर्त मे ढकेल कर एक गृह-युद्ध आरंभ करना चाहते है. देश के नीति-निर्मातों को देश-विरोधी हर अभियान को हर स्तर पर अलग-थलग कर उसका बहिष्कार करने के लिये जो भी कठोर फैसले लेना हो तत्काल लेना चाहिये ताकि भारत की धरती पुन: ऐसी रक्त-रंजित न हो. 
   
इस सच्चाई को नकारा नही जा सकता कि आज़ादी के बाद से लेकर आजतक आदिवासियों के विकास के लिये जो भी कदम उठाया गया वह उस आदिवासी के शरीर की सभी 206 हड्डियों को मज़्ज़ा से ढकने के लिये नाकाफी रहा. आज भी उन्हे दो जून की रोटी व पीने के लिये पानी नसीब नही है. ऐसे मे उनके लिये विकास की बात करना मात्र एक छ्लावा है और शहरों की चमचामाती सडके और गगनचुम्बी इमारतें उनके लिये अकल्पनीय है. जिसका लाभ लेकर अरुन्धती राय सरीखे लोगों द्वारा आदिवासियों को सत्ता के खिलाफ बन्दूक उठाने के लिये प्रेरित व विवश किया जाता है. यही वें लोग हैं जो आम आदिवासी को यह समझाते है कि सत्ता द्वारा तुम्हे तुम्हारी संपत्ति से बेदखल कर तुम्हे विस्थापित कर दिया जायेगा. यह ठीक है कि कोई भी स्वस्थ समाज यह सहन नही कर सकता कि उसकी ही धरती पर उसे विस्थापित होकर रहना पडे. आज भी सरकार आम-जन को उसकी संपदा के अधिग्रहण का मुआवज़ा देती ही है. मुआवजे की राशि व प्रकृति को लेकर विवाद हो सकता है परंतु अगर कोई अपनी संपदा ही नही देगा तो सरकार विकास की इबारत कहाँ लिखेगी. सरकार यह सुनिश्चित कर उन आदिवासियों का भरोसा जीतकर वहाँ विकास मार्ग प्रशस्त करें कि इन आदिवासी क्षेत्रों मे यदि कोई आदिवासी विस्थापित होता है तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी. इस प्रकार का कोई भी संवाद आदिवासियों द्वारा सरकार से किया जा सकता है. उन आम आदिवासियों को यह भी समझना होगा कि जो सडक उनके जंगल-खेत-खलिहानों से होकर गुजरेगी वही सडक उनकी इस असमानता को दूर करेगी क्योंकि वर्तमान समय में सडकें ही विकास का प्रयाय है. यदि उनके बच्चे स्कूलों में शिक्षा लेंगे, देश-समाज को समझेंगे, संचार माध्यमों से जुडेंगे तभी तो वे भी भविष्य में देश के विकास मे भागीदार होंगे. सत्ता से सशस्त्र ट्कराव करना कोई बुद्धिमानी नही है क्योंकि जिस भी दिन इनके प्रेरणा-पुंजों को नियंत्रण मे लेकर  सत्ता यह दृढ निश्चय कर लेगी कि इन आदिवासियों के पास हथियार नही पहुँचने चाहिये उस दिन इन आदिवासियों के पास मात्र आत्मसमर्पण के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नही रह जायेगा. पंजाब के आतंकवाद का दमन इस बात का एक जीता-जागता उदाहरण है. देर-सवेर इन भटके हुए आदिवासियों को विकास की इस धारा मे आना ही होगा. परंतु सरकार यदि उन भटके हुए आदिवासियों को समझाने में सफल हो गयी तो उन मानवधिकारवादी- कारोबारियों की जीविका कैसे चलेगी मूल प्रश्न यह है.        
-          राजीव गुप्ता

शनिवार, 18 मई 2013

न्याय पाने की भाषायी आज़ादी



स्वतंत्रता पूर्व भारत मे सरकारी समारोहों में ‘गाड सेव द किंग’ या ‘गाड सेव द क़्वीन’ गाया जाता था. पर्ंतु 15 अगस्त 1947 से उसका स्थान ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे’ ने लिया. रातोंरात सभी सरकारी भवनो पर से ‘यूनियन जैक’ झंडा उतारकर तिरंगा झंडा लहरा दिया गया. भारत में स्वतंत्रता का जश्न मनाया गया. भारत को यह स्वतंत्रता लाखो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की कीमत पर मिली थी. पहली बार भारत के लोगों ने आज़ादी का अर्थ समझा था. देश का संविधान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और और राष्ट्रभाषा का बहुत महत्व होता है. इसी महत्ता के चलते देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तय हो गया परंतु बहुभाषी भारत मे राष्ट्रभाषा का चुनाव करने में बहुत समय लगा. देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है. हिन्दी के प्रचलन के चलते हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया गया था.
हिन्दी को राजभाषा का दर्जा
क्रांतिकारियों के संघर्षो के कारण देश को स्वाधीनता मिली परंतु संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता-पूर्व जुलाई, 1946 में ही हो गया था. 11 दिसम्बर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी सदस्य चुना गया. डा. कैलाश चन्द्र भाटिया ने एक लेख में लिखा है कि संविधान सभा की नियम समिति ने डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता मे 1946 में ही एक निर्णय ले लिया था कि संविधान सभा का कामकाज की हिन्दी या अंग्रेजी ही होगी और यदि कोई सदस्य अपनी मातृभाषा मे भाषण देना चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति से वह अपनी मातृभाषा मे भाषण दे सकता है. फरवरी, 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा के संबंध को उल्लेख नही था. परंतु कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी के अथक प्रयासों से 12,13,14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे राजभाषा के विषय पर चर्चा हुई और 14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मताओं ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया. इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि मे लिखी गई हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप मे अंगीकार किया गया. हलाँकि संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संविधान लागू होने से 15 वर्ष पश्चात तक अर्थात 25 जनवरी 1965 तक अंग्रेजी भाषा को संघ के सभी कार्यों के लिये अंग्रेजी भाषा मे करने की व्यवस्था की गई. साथ यह व्यवस्था भी की गई देश के महामहिम राष्ट्रपति यदि चाहें तो 15 वर्ष की अवधि पूर्व भी यह आदेश दे सकते है कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जा सकता है.    
हिन्दी और राष्ट्रपति के आदेश
राष्ट्रपति का पहला आदेश 27 मई 1952 को विधि-मंत्रालय की अधिसूचना के रूप में और भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ. इस आदेश के अनुसार राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिपत्रों को प्राधिकृत कर दिया गया. राष्ट्रपति का दूसरा आदेश 3 दिसम्बर 1955 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया जिसे संविधान (राजकीय प्रयोजनो के लिये हिन्दी भाषा) आदेश 1955’ के रूप में जाना जाता है. इस आदेश के अनुसार जनता से पत्र-व्यवहार, संसद और प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ, सरकारी संकल्प, राजभाषा को अपनाने वाले राज्यों से पत्र-व्यवहार, संधिय़ाँ व करार जैसे प्रमुख क्रियाकलापों में हिन्दी को अपनाने के लिये कहा गया. इसी आदेश के परिणामस्वरूप विभिन्न मंत्रालयों में हिन्दी-अनुवादकों की नियुक्तियाँ शुरू हुई. उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा कई आदेश जारी किये गये और 1963 में राजभाषा अधिनियम बना.
हिन्दी-प्रयोग में आशंकाएँ
हिन्दी-प्रयोग ने लोगों को कई आशंकाओं में डाल दिया. सैन्य-सेवा मे हिन्दी-प्रयोग से लोग सबसे ज्यादा आशंकित थे. उनका मानना था कि सेना के जवानो आदेश या उनके साथ वार्तालाप अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर कैसे उपयोग किया जाय. भाषा के कारण सैनिकों के मनोबलों और देश-सुरक्षा के साथ खिलवाड नही किया जा सकता. इसी प्रकार से हिन्दी-प्रयोग को लेकर लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएँ रही, जिसका कारण लोग मुख्यतया दैनिक कार्यों के निमित्त हिन्दी मे शब्दों की कमी मानते थे. कुछ कमोबेश यही हालत विधि क्षेत्र की भी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में न्यायालयों का अधिकतर कार्य फारसी भाषा में होता था. आज भी हम न्यायालयों के आदेशों मे हम फारसी भाषा का प्रभाव देख सकते हैं. 1836 तक आते-आते फारसी का उपयोग खत्म हो गया और उसका स्थान हिन्दी,अंग्रेजी और उर्दू ने ले लिया. 1950 में देशी रियासतों के भारत में विलय होने तक न्यायालयों का कामकाज़ प्रादेशिक भाषा मे ही होता था. ग्वालियर, पटियाला, बडौदा, जम्मू-कश्मीर हैदराबाद की रियासतें इसका प्रमुख उदाहरण हैं. इतना ही नही भारत की विशालता के चलते ही यहाँ पर कई भाषाई-राज्यों का भी गठन किया गया. और राज्यो को यह अधिकार दिया गया कि वे खुद तय करें कि उनकी राज्यभाषा क्या होगी. सारी परिस्थितियों पर चर्चा के उपरांत यह तय किया गया कि सभी राज्य एक दूसरे राज्य व केन्द्र के साथ राजभाषा में ही पत्र-व्यवहार करें. परंतु यह देश की विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर प्रयास करने के बावज़ूद आज भी राजभाषा सुचारू रूप से देश-स्तर पर संतोषजनक रूप से लागू नही है. आज भी अशिक्षित लोगों को न्यायालय मे न्याय उनकी मातृभाषा में नही मिलता है.  
पिछले दिनों कैट (केन्द्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण) से लेकर उच्च न्यायालय तक के दिये हुए फैसलों को पलटते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दी मे आरोपपत्र पाने के अधिकार पर ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने देश के हिन्दी-प्रेमियों की दम तोडती आस पर संजीवनी-बूटी सा असर किया. जिसने आम-जन को अपनी मातृभाषा मे न्याय पाने अधिकार की माँग करने वालों लोगों में एक आस की अलख को जगाया. दरअसल यह मामला मुम्बई के एक नौसेना कर्मी मिथलेश का था, जिसे उच्चाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार व उनका आदेश न मानने पर एक आरोपपत्र दिया गया था. नौसेना कर्मी ने हिन्दी भाषा मे आरोपपत्र की मांग की जिसे विभाग ने खारिज कर दिया. जिससे नौसेना कर्मी ने विभागीय जाँच मे भाग नही लिया. परिणामत: विभाग ने नौसेना कर्मचारी पर कार्यवाही कर सजा के रूप मे उसके वेतनमान मे कटौती कर दी. जिसे नौसेना कर्मचारी ने आरोपपत्र हिन्दी में न मिलने के कारण को आधार बनाते हुए विभागीय जाँच को रद्द करने की माँग की. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात आज भी सर्वोच्च न्यायालय और  अधिकांश उच्च न्यायालयों मे अपनी मातृभाषा मे आरोपी अपना पक्ष नही रख सकता. परिणामत: आरोपी को यह पता ही नही चल पाता कि उसके वकील माननीय न्यायाधीशों के समक्ष क्या तर्क कर रहें है. इसलिये आरोपी अपने आप को ठगा-सा महसूस करते है.
कहने को तो हिन्दी देश की राजभाषा है, परंतु आज भी प्रशासनिक व न्यायालय के कामकाज़ में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है. देश की शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ यही है कि ऐसे मामलों में न्याय के लिये उसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जिस भाषा को आरोपी समझता हो, ताकि कोई भी व्यक्ति तथ्यों को ठीक-ठाक समझकर अपना पक्ष रख सके. अब समय आ गया है कि अब राजभाषा अधिनियम की नये सिरे से समीक्षा की जाये क्योंकि किसी भी स्वतंत्र देश में मातृभाषा में अपना पक्ष रखना और जवाब मांगना किसी भी व्यक्ति का हक होता है.

-          राजीव गुप्ता 

गुरुवार, 9 मई 2013

वंदेमातरम् : धर्म नही देश पहले है



बसपा के माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क  कहते है, ‘यह सच है कि मै सांसद हूँ, पर मुसलमान पहले हूँ. मै इस्लाम के खिलाफ नही जा सकता.  इसलिए मै लोकसभा छोड़कर चला गया. अगर भविष्य में भी ऐसी स्थिति आई तो मैं वही करूंगा, जो आज किया है.’ समाजसेवी श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के वंदेमातरम्-नाद को अभी देश की जनता भूल भी नही पायी होगी कि श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के उसी ‘वंदेमातरम्-नाद’ पर ही विवाद खडा हो गया. दरअसल यह सारा विवाद 8मई 2013 को खडा हुआ. देश की सबसे बडी पंचायत अर्थात लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने से पहले सदन में 'वंदेमातरम्की धुन बजायी गई. धुन बजने के दौरान संभल से बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क सदन से उठकर बाहर चले जाते है. लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार माननीय सांसद के इस कदम पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्हें भविष्य में ऐसा नहीं करने की सख्त चेतावनी देते हुए कहती है कि 'एक माननीय सांसद वंदेमातरम् की धुन बजने के दौरान सदन से बाहर चले गए. मैंने इसका गंभीर संज्ञान लिया है. मैं जानना चाहूंगी कि ऐसा क्यों किया गया. ऐसा आगे कभी भी नहीं होना चाहिए.' राजनेताओ की इस पूरे वाकया पर टिप्प्णियाँ आती है. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भी बर्क के इस व्यवहार से असहमत है. पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान जी कहते है कि दुनिया के हर मजहब मे मातृभूमि के प्रति आदर, सम्मान, समर्पण की व्यवस्था है. जो मातृभूमि का आदर नही कर सकता उससे कानून द्वारा कराया जा सकता है. बसपा के माननीय सांसद द्वारा उठाये गये इस अपमानजनक कदम पर कांग्रेस के नेता और देश के विदेश मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि वंदेमातरम् गाना कतई बुरा नही है. उन्होने यह भी कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने भी वंदेमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप मे स्वीकार कर लिया था. ध्यान देने योग्य है कि 4 नवंबर 2009 को देवबंद मे उलेमाओ ने वंदेमातरम् न गाने का एक प्रस्ताव पारित किया था. जिस पर राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगो ने कडी आपत्ति जताई थी. भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि सदस्यों को राष्ट्रीय गीत के अपमान का कोई अधिकार नहीं है. परंतु अभी इस गंभीर मुद्दे पर बीएसपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई. इसके उलट माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने देश से माफी मांगने की बजाय अपनी हेकडी जमाते हुए ऐसा तर्क दिया हैजिससे विवाद और बढ गया. देश की भावनाये आहत हो रही है.

वंदेमातरम् का इतिहास

डा. भूपेन्द्र नाथ अपनी पुस्तक मे लिखते है कि 1760 मे एक बार भारत मे भयंकर अकाल पडा. उस समय भारत मे ईस्ट इंडिया का राज था और अंग्रेजो के खिलाफ संयासी अपने उद्घोष मे ‘ओम वंदेमातरम्’ कहा करते थे. 1866 के ओडिशा के अकाल को देखकर चिंतित हुए बंकिम चन्द्र ने एक उपन्यास लिखना प्रारंभ किया और 1882 मे उन्होने ‘वंदेमातरम्’ को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ मे शामिल कर लिया. कालांतर मे महर्षि अरविन्द ने वंदेमातरम् को नये-मंत्र की संज्ञा दी. यह पवित्र मंत्र ‘वंदेमातरम्’ कोलकाता मे भारतीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन मे पहली बार गाया गया. 28 दिसंबर, 1896 को कांग्रेस के अधिवेशन मे श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर ने स्वयं ही वंदेमातरम् को संगीतबद्ध कर दिया, और उसी अधिवेशन मे वंदेमातरम् को हर अधिवेशन गाने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. 1905 मे बंग-भंग के आन्दोलन मे वंदेमातरम् नामक इस मंत्र का ऐसा जादू चला कि इसके उद्घोष ने ब्रिटिश सरकार की चूले हिला दी. हालत यह हो गयी थी कि हर वंदेमातरम् बोलने वाले व्यक्ति को ब्रिटिश हुकुमत जेलो मे बन्द कर देती थी. हलाँक 1905 मे बनारस के अधिवेशन मे कुछ विवाद खडा हो गया था, परंतु उस विवाद को सुलझा लिया गया था और श्रीमती सरला देवी चौधरानी जी ने पूरा वंदेमातरम् गाया. 1906 मे जब ब्रिटिश सरकार ने वंदेमातरम् बोलने पर अडचन डालनी चाही तो आनन्द बाज़ार पत्रिका के संपादक श्री मोतीलाल घोष ने यहाँ तक कह दिया था, ‘चाहे गर्दन रहे या न रहे परंतु मैं तो वंदेमातरम् गाउंगा.’ गाँधी जी के 1920 के असह्योग आन्दोलन का प्रमुख नारा यही था. 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन मे वंदेमातरम् को गाया जाता रहा. यहाँ तक कि महात्मा गाँधी जी, दक्षिण अफ्रीका से लौटने के लगभग 2 वर्षो तक अपने सभी पत्रो का अंत वंदेमातरम् से ही करते थे. 1 जुलाई 1931 को गाँधी जी ने हरिजन मे भी लिखा, ‘मुझे कभी नही लगा कि वंदेमातरम् हिन्दुओ का गीत है. दक्षिण भारत के राष्ट्र कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने खुद लिखा, ‘ आओ इसकी अर्चना करे हम वंदेमातरम्.’ विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक लाला हरदयाल, महर्षि अरविन्द जैसे स्वतंत्रता सेनानियो ने वंदेमातरम्-गान को अंगीकृत किया.

वंदेमातरम् का विरोध

1908 मे मुस्लिम लीग ने अपने अमृतसर अधिवेशन मे सबसे पहले इस वंदेमातरम् – गान का विरोध किया और 1937 तक आते-आते यह उसके एजेंडे का विषय बन गया. कम्युनिष्ट विचारधारा के मानने वालो ने वंदेमातरम्-गान की जगह इंकलाब-जिन्दाबाद को अपनाया. 1923 मे मोहम्मद अली जो कि कांग्रेस के इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे, ने वंदेमातरम् के गान का जोरदार विरोध किया. वंदेमातरम्-गान का विरोध इतना अधिक बढ गया कि कांग्रेस के  हरिपुर अधिवेशन मे वंदेमातरम्-गान पर विचार करने हेतु 4 लोगो की एक समिति बनायी गयी और इस समिति ने यह तय किया कि वंदेमातरम्-गान के पहले 2 पद ही गाये जायेंगे.

स्वतंत्रता-पश्चात

14 अगस्त 1947 की मध्य रात को भी वंदेमातरम् के 2 पद गाये गये. भारतीय संविधान द्वारा वंदेमातरम् को भी राष्ट्रीय गान की तरह राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. परंतु इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वर्तमान के राजनेता वंदेमातरम्-गान को धर्म से जोडकर देखने लगे है जबकि वंदेमातरम्-गान स्वतंत्रता-प्राप्ति का सिद्ध मंत्र था. मई 1965, मे भारत के तीसरे कानून आयोग की 28वीं रिपोर्ट (दि इंडियन ओथ्स एक्ट 1873) पेश की गई, जिसके चेयरमैन जस्टिस जे.एल.कपूर थे. इस रिपोर्ट मे हिन्दू-मुश्लिम दोनो के लिये भारत के शपथ-फार्म मे यह स्पष्ट लिखा गया है कि मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि जो कहूंगा, सच कहूंगा. कुछ इसी तरह की अर्हता-संबंधी बात जन-प्रतिनिधियो के लिये संविधान के अनुच्छेद 84(क) और अनुच्छेद 173 (क) मे तथा संविधान की तीसरी अनुसूची मे यह साफ-साफ लिखा गया है कि मै, अमुक, जो राज्य सभा (या लोक सभा) का सद्स्य निर्वाचित (या नामनिर्देशित) हुआ हूँ, ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि मै विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करुंगा.”  यही शपथ बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क जी ने भी ली है. उनके इस अपमानजनक कृत्य से क्या यह मान लिया जाय कि इन्होने विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की झूठी कसम खायी थी, क्योंकि इन्होने अपने इस दंभ के चलते देश की जनता को और उन महान हुतात्माओ को जिन्होने देश को स्वतंत्र कराने हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, को भी लजा दिया. अब समय आ गया है कि संसद यह सुनिश्चित करे कि किसी भी ‘राष्ट्रीय-मानको’ का अपमान किसी भी सूरत-ए-हाल मे सहन नही किया जायेगा.   

-       राजीव गुप्ता