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सोमवार, 25 मार्च 2013

माँ - एक मार्मिक कहानी

एक आँख से अंधी माँ अपने बेटे को स्कूल से लेने गई. उस एक आँख से अंधी माँ को देखकर उसके बेटे की मित्र-मंडली उसकी हँसी उडाने लग गये. परिणामत: उस बच्चे ने शर्मिन्दगी से बचने के लिये अपनी माँ को स्कूल आने के लिये मना कर दिया. वही माँ जो भरी-दुपहरी/ कपकपाती सर्दी मे या खुद बारिश मे भीगकर बेटे को बारिश से बचाकर अपने बेटे का स्कूल-बैग अपनी पीठ पर लादे आती थी, आज उसकी वजह से उसका बेटा तिरष्कृत होता है, बेटे के ये शब्द उसके कानो से कलेजे तक जा पहुँचे. उस माँ का हृदय छलनी-छलनी हो गया. वह माँ यह सोचने लगी कि मै अब अपनी ममता अपने बेटे पर नही थोपुंगी, वह अब बडा हो गया है, उसे जो करना है वह वो करे. उसे अब मेरी कोई परवाह नही तो कोई बात नही. माँ से नही रहा गया परंतु अपने बेटे की खुशी हेतु उसने अपने सुख की तिलांजलि दे दी.

कालांतर मे उस बेटे की नौकरी विदेश मे लग गई. अपनी प्रेमिका रूपी पत्नी के कहेनुसार उसने अकेली बूढी माँ को गाँव मे ही छोड दिया. कई बरस बीत गये. उस बीमार बूढी माँ से नही रहा गया. महाजन के पास जाकर अपना सारा खेत और घर बेचकर अपने बेटे के पास विदेश पहुँच गई. उस एक आँख से अंधी बूढी माँ को उसकी पतोहू (पुत्र-वधु) ने घर मे घुसने ही न दिया. अपने पति को तुरंत बुलाकर कहा कि इस बूढी औरत को तुरंत इसके गाँव छोड आओ वरना मेरा मुँह नही देखोगे.

पत्नी के कहेनुसार वह अपनी माँ को भला-बुरा कहकर उसे गाँव छोडने के लिये आ गया. एअरपोर्ट पर वह अपनी माँ को वही रुककर इंतज़ार करने के लिये कहकर वह पानी लेने के बहाने से वापस विदेश का हवाई जहाज पकडकर चला गया. माँ वही खडी अपने बेटे का इंतज़ार करती रही. जो कोई उस बूढी माँ से कुछ पूछता वह माँ यही कहती कि मेरे बेटे ने यही रुकने के लिये कहा है. कई दिन बीत गये. एक दिन एअरपोर्ट वालो ने भी उस बूढी माँ को एअरपोर्ट क्षेत्र से धक्का देकर बाहर निकाल दिया. एक राहगीर से उस बूढी माँ ने अपने गाँव के महाजन के लिये एक पत्र लिखवाकर महाजन के पास भिजवा दिया. उस पत्र पर लिखा देख कि इसे मेरे बेटे को ही देना, महाजन ने पत्र नही खोला. कुछ दिनो बाद भूख-प्यास से तडप-तडप कर इस बूढी माँ का देहांत हो गया.

कुछ दिनो बाद उस बेटे को कुछ आर्थिक तंगी पडी. पत्नी के कहने पर वह अपने गाँव की सम्पत्ति बेचने के लिये गाँव आ गया. गाँव के लोगो से पता चला कि अब उसकी माँ इस दुनियाँ मे नही रही. महाजन ने उसे अपने घर बुलाकर वह पत्र देते कहा कि बेटा इस पत्र को तुम्हारी माँ ने सिर्फ तुम्हे ही देने के लिये लिखा था. बेटे ने वह पत्र लिया. पत्र पढते हुए उस बेटे के आँखो से आँसुओ की धार बह निकली. उस पत्र मे लिखा था - बेटा जब तुम बहुत छोटे थे, तभी तुम्हारे पिता का स्वर्गवास हो गया था. एक दिन तुम खेल रहे थे कि अचानक तुम मुँह के बल गिर पडे थे, तुम्हारी एक आँख मे लकडी घुस गयी, जिसके कारण तुम्हारी एक आँख खराब हो गयी थी. डाक्टर से सलाह करने के बाद मैने अपनी एक आँख तुम्हे लगवा दी ताकि जमाने वाले तुम्हारा मजाक न बनाये. मैने कभी - भी तुम पर अपना कोई फैसला नही थोपा और न ही तुमने कभी मेरी खुशी जानने की कोशिश की. तुमने जिदवश जो कहा मैने मान लिया. तुम्हे पढाने के लिये मै घर-घर जाकर बर्तन माँजती थी, परंतु मैने तुम्हारी पढाई मे कोई कमी नही आने दिया. अपने जीवन के अंतिम पलो मे तुम्हे जी भरकर निहारने की हसरत लेकर मै तुम्हारे पास विदेश गई थी. तुम्हे जी भरकर देख लिया था, अब मेरे जीवन मे कोई इच्छा नही रही. बेटा अगर मैने तुम्हारी परवरिश मे कोई कमी रही हो तो मुझे माफ करना : तुम्हारी माँ - राजीव गुप्ता

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मार्मिक, दुखद, स्वजनों का यह हाल हो तो दुनिया को कैसे एक अच्छा स्थान बना पायेंगे हम।

सुनीता शर्मा ने कहा…

राजीव बेटे ,इस कहानी के वस्तुत : लेखक कौन है यह अभी याद नहीं आ रहा परन्तु एक कार्यक्रम में टी .वी पर इसका प्रसारण जब हुआ था तब हमने इस कहानी को अपनी स्कूल के बच्चों को नैतिक शिक्षा में लिया था ! कहानी किसी की भी हो किन्तु भारत निर्माण की ओर आपकी प्रबल इच्छा को बधाई व् शुभकामनाएं !