पेज

कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 1 मई 2012

भारत और अन्य देश - श्री जसवंत सिंह, पूर्व विदेश मंत्री, भारत सरकार से साक्षात्कार



भारत और चीन

भारत के लिए  अग्नि - 5  जिसकी मारक क्षमता 5000 किमी. से ज्यादा है के सफल परीक्षण के साथ 19  अप्रैल 2012  का दिन ऐतिहासिक बन गया.पूरी दुनिया स्तब्ध नजरो से देखती रह गयी और भारत सुपर मिसाइल क्लब जिसके सदस्य अभी तक रूस,अमेरिका,चीन और फ़्रांस थे,  में शामिल हो गया.अग्नि - 5  जद में समूचा चीन समेत लगभग आधी दुनिया आ गयी है जिसके कारण चीन की मीडिया में बेचैनी बढ़ गयी है.चीन के एक अखबार ने अग्नि 5 के टेस्ट पर चीन ने भारत की मिसाइल क्षमता पर सवाल उठाये है.मसलन अखबार में कहा गया है कि भारत अग्नि 5 से ICBM क्लब में शामिल होने के दावे कर रहा है. अग्नि 5 मिसाइल केवल पांच हजार किलोमीटर तक ही मार कर सकती है, जबकि इंटरकॉन्टिनेंटल बलिस्टिक मिसाइल ( ICBM) की मारक क्षमता 8 हजार किलोमीटर होती है. यही नहीं अखबार में भारत को एक गरीब देश की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि "भारत अभी भी एक गरीब देश है , इंफ्रास्ट्रक्टर और निर्माण के क्षेत्र में वह पीछे है, लेकिन वहां की जनता नाभिकीय हथियार की वकालत करती है ".भारत को अखबार में चेतावनी देते हुए लिखा गया है, "अगर यह मिसाइल चीन के अधिकतर हिस्सों पर निशाना लगाने में भी सक्षम है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि भारत विवादित मुद्दों पर कुछ हासिल कर लेगा.भारत को पता होना चाहिए कि चीन की परमाणु क्षमता कहीं ज्यादा मजबूत है.भारत हथियारों के मामले में चीन के आगे कहीं भी नहीं ठहरता है !" अखबार में कहा गया है कि पश्चिमी देश भारत की इस "हथियारों की होड़" पर चुप हैं.ज्ञातव्य है कि नाटो ने  अग्नि - 5  के सफल परीक्षण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि " भारत का परमाणु अप्रसार रिकॉर्ड बेहद अनुशासित, शांतिपूर्ण और शानदार रहा है ". अमेरिका ने भी कुछ इसी तरह का सकारात्मक बयान दिया है और चीन का मानना है कि भारत उसका प्रतिद्वंदी नहीं है. चीन का मीडिया बौखलाहट में कैसी भी बयानबाजी करे परन्तु श्री जसवंत सिंह का मानना है कि हमें प्रतिक्रिया स्वरुप बौखलाने की जरूरत नहीं है. भारत का  अग्नि - 5  का यह सफल परीक्षण पहला वैज्ञानिक परीक्षण है.हमें प्रगति करने के साथ - साथ संयम रखते हुए अनुशासन के साथ आगे बढ़ना चाहिए.चीन भले ही अपने मानचित्र में भारत के अरुणाचल प्रदेश को लगातार दिखता हो परन्तु श्री सिंह का मानना है कि भारत को यह कदापि मान्य नहीं है.वही चीन द्वारा भारत के घेराबंदी के बारे श्री सिंह का कहना है कि मानसिक घेराबंदी करने की जरूरत नहीं है.समुचित शक्ति से , अपनी कूटनीतिक के प्रभाव से और सामरिक शक्ति से इसका कटाक्ष किया जा सकता है. 

भारत और बंगलादेश

भारत में बंगलादेशी घुसपैठ अपने चरम पर है ,  ऐसे विकट परिस्थिति में श्री सिंह का कहना है कि वहा के नागरिको पर यह गरीबी की मार है तथा भारत-बंगलादेश के बीच जो विभाजन हुआ वह संतोषजनक नहीं था  जिसके चलते घुसपैठ जैसी घटनाये हो रही है. भारत और बंगलादेश लगभग 54 साझी नदियों के जल के भागीदार है. ऐसे में दोनों देशो के बीच नदी जल बटवारे को लेकर अनबन होती रहती है परन्तु श्री सिंह का मानना हैकि दोनों देशो के बीच अनबन इतनी नहीं है जितनी समझदारी से पानी का बटवारा किया जाना चाहिए.भविष्य में सुंदरवन का संकट सियाचीन न  बन जाये इस पर श्री सिंह कहते है कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि भौगोलिक दृष्टि से सुन्दावन समुद्र तट पर है और सियाचीन हिमालय की चोटियों के बीच है.ऐसा माना जाता है कि सुन्दर वन लगातार फ़ैल रहा है और दोनों देश अपना - अपना उस पर दावा करते है जिससे टकराहट की नौबत आ जाती है.बंगलादेश में लोकतंत्र के मसले पर श्री सिंह कहते है कि वहा पर लोकतंत्र वैसे ही होगा जैसे वहा के लोग निभायेगे.

भारत और पाकिस्तान
सियाचीन के मसले पर 24 जुलाई 2010 को ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान को सियाचिन ग्लेशियर से अपनी सेनाएं हटा लेनी चाहिएक्योंकि इससे दोनों देशों के खजाने पर भारी बोझ पड़ रहा है.8 अप्रैल 2012 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा भारत की यात्रा के बाद ही जनरल कयानी ने संकेत दिया था कि पाकिस्तान सियाचिन से सैन्य वापसी पर विचार कर सकता है.हालाँकि बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने जनरल कयानी के बयान को ख़ारिज करते हुए कहा कि भारत के साथ सियाचिन मुद्दे को लेकर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है.इन दोनों विरोधभासी बयानों पर श्री सिंह का कहना है कि इसे विरोधभासी ही मानकर चलना चाहिए, नीति नहीं है, हम अपनी नीति सियाचीन के बारे में स्पष्ट रखें और देशहित के अनुसार काम करे. पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भारत यात्रा को श्री सिंह जरदारी की निजी यात्रा के रूप में देखते है.श्री सिंह का कहना है कि वह गरीब नवाज की दरगाह पर माथा टेकने आये थे.ज्ञातव्य है   अभी हाल में ही हुई पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भारत यात्रा को लेकर कई तरह की अवधारणाये बनी थी. मुंबई हमलों के गुनहगार हाफिज सईद पर पकिस्तान द्वारा अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गयी ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा निमंत्रण दिए जाने के मसले पर श्री सिंह कहते है कि निमंत्रण वो दे सकते है भारत के प्रधानमंत्री उसको स्वीकार करे उससे पहले सोच कर स्वीकार करे.पाकिस्तान में लोकतंत्र के भविष्य पर श्री सिंह का मानना है कि यह उतना ही सबल और सफल होगा जितना वहा के लोग उसको रखेंगे.भारतपाकिस्तान के क्रिकेट मैच को झेलते राजनैतिक दंश के बारे में श्री सिंह कहते है यह खेलना चाहिए अगर आप उसमे जो संकट है उसके साथ उसको झेलने को तैयार है तो खेलना चाहिए.ज्ञातव्य है इस बार के आईपीएल में पाकिस्तान की क्रिकेट की टीम शामिल नहीं है.   


भारत और अमेरिका
न्युक्लियर डील भारत के पक्ष में है कि नहीं है इस मसले पर श्री सिंह का मानना है कि इस डील की गहराइयों  को समझना जरूरी है.अगर न्यूकिलियर समझौते से न्यूकिलियर  सामग्री हमारे देशहित में मिलती है तो पक्ष में है, अगर उसको हम ठीक से लागू नहीं कर पाते है तो पक्ष में नहीं है.आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका के दोहरे नजरिया पर श्री सिंह कहते है कि हर देश की नीति देशहित पर बनती है.हमें अमेरिका से ज्यादा अपेक्षा करने की जरूरत नहीं है.

भारत का श्री लंका और ईरान के खिलाफ वोट
भारत का श्री लंका और ईरान के खिलाफ वोट करने से कुछ लोग यह मानने लगे थे कि भारत अपने इस कदम से अमेरिका का पकिस्तान की अपेक्षा ज्यादा विश्वासपात्र बनने की होड़ में लगा हुआ है.इस मसले पर श्री सिंह का मानना है कि हमें उस मसले पर पड़ना ही नहीं चाहिए.केवल देशहित ही एक मापदंड है.और नजरिये से इसे देखना चाहिए.  

भारत  के विश्व महाशक्ति बनने में आने वाली मुख्य कठिनाईयाँ  

श्री सिंह के अनुसार भारत को विश्व महाशक्ति बनने में आने वाली मुख्य कठिनाइया कि आर्थिक, प्रशासनिक, पड़ोसी देश के साथ के साथ सम्बन्ध ठीक न होना है.उनका मानना है कि पड़ोसी देश के साथ सम्बन्ध ठीक न होने की बेडी जब तक पडी रहेगी तब तक हम अपनी नियति के अनुसार काम नहीं कर पाएंगे.अगर सफल सरकार और सबल सरकार भारत में नहीं होगी हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ नहीं कर सकते.और आर्थिक वृद्धि नहीं होगी देश में तो हम अंतर्राष्ट्रीय क्या सपने देखते है ?
   
- राजीव गुप्ता