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शनिवार, 4 अगस्त 2012

आखिर नरेंद्र मोदी का कसूर क्या है

 

                                                         
भारत एक लोकतांत्रिक देश है ! अतः संविधान ने भारत की जनता को स्वतंत्र रूप से  अपना प्रधान चुनने की व्यवस्था दी है ! स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक हर राज्य की बहुसंख्यक जनता अपनी मनपसंद का अपने राज्य का मुखिया चुनती है और संवैधानिक व्यवस्था द्वारा वहा की जनता की भावनाओ का सम्मान किया जाता है ! लोकतान्त्रिक देश होने के कारण भारत में हर किसी को कर्तव्यो के साथ अपनी बात कहने की पूर्ण स्वतंत्रता है और इसीलिये भारत की मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ तक की संज्ञा जैसे शब्दों से अलंकृत किया जाता है पर अंतिम निर्णय का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा यहाँ की सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया है ! पर अगर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया, कुछ  राजनेता  और तथाकथित भारत के कुछ बुद्धिजीवी आपसी तालमेल से किसी एक राज्य की जन - भावनाओ के दमन पर उतारू हो जाये तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर उन्हें अपनी इस तानाशाही का अधिकार किसने दिया ? आये दिन उत्तरी गुजरात के वादनगर के साधारण मध्यम परिवार में जन्मे गुजरात के मुख्यमंत्री का सुनियोजित तरीके से मान-मर्दन कर सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी प्राप्त करने की पराकाष्ठा से भारत के सामने अब यह प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है कि क्या ऐसे लोगो का भारत के संविधान में विश्वास नहीं है ? आखिर नरेंद्र मोदी का कसूर क्या है ?

27 फरवरी 2002 को अयोध्या से वापस आ रहे 59 कारसेवको को साबरमती एक्सप्रेस के एस - 6 डिब्बे में जिन्दा जलाने की घटना से उत्पन्न हुई तीखी साम्प्रदायिक - हिंसा भारत के इतिहास में कोई पहली सांप्रदायिक - हिंसा की घटना नहीं थी ! इससे पहले भी 1947 से लेकर अब तक भारत में कई सांप्रदायिक - हिंसा की घटनाएं हुई है ! बात चाहे 1961 में  मध्यप्रदेश के जबलपुर में हुए साम्प्रदायिक-हिंसा की हो अथवा 1969 में गुजरात के दंगो  की हो , 1984 में सिख विरोधी हिंसा की हो, 1987 में मेरठ के दंगे हो , 1989 में हुए भागलपुर - दंगे की बात हो, 1992 - 93 में बाबरी काण्ड के बाद मुंबई में भड़की हिंसा की हो,  2008 में कंधमाल की हिंसा की हो या फिर अभी पिछले दिनों ही उत्तर प्रदेश के बरेली में फ़ैली सांप्रदायिक हिंसा की हो अथवा इस समय सांप्रदायिक हिंसा की आग में सुलगते हुए  असम  की हो जिसमे अब तक करीब तीन लाख लोगों ने अपना घर छोड़ा दिया ! हर साम्प्रदायिक-हिंसा के बाद राजनीति हावी हो जाती है ! परन्तु मीडिया का राजनीतिकरण हो जाने से निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया एक तरफ़ा राग अलापते हुए अपने - अपने तरीके से वह घटना की जांच कर जनमानस पर अपना निर्णय थोपते हुए अपने को संविधान के दायरे में रहने का खोखला दावा करती है जो कि निश्चय ही दुर्भाग्य पूर्ण है ! कोई भी देश वहा के संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्था से चलता है ! सभी नागरिको का यह कर्तव्य है कि वो एक दूसरे की भावनाओ का ध्यान रखते हुए देश की एकता और विकास में अपना योगदान दे यह एक कटु सत्य है कि विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे एक बहुत बड़ा रोड़ा बन कर उभरते है और साथ ही मानवता पर ऐसा गहरा घाव छोड़ जाते है जिससे उबरने में मानव को कई - कई वर्ष तक लग जाते है !

भारत जैसे शांति प्रिय देश में हर सांप्रदायिक - हिंसा की घटना निश्चित रूप से किसी व्यक्ति विशेष पर न होकर  सम्पूर्ण देश के ऊपर एक कलंक के समान है  ! ध्यान देने योग्य है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  पिछले शनिवार को असम में फ़ैली सांप्रदायिक - हिंसा की घटना को देखने के लिए गए थे और उन्होंने असम की सांप्रदायिक - हिंसा की घटना को देश का कलंक कहा था ! अभी तक का यह सच है कि देश में हुए हर आतंकवादी घटना, सांप्रदायिक - िंसा, जाति अथवा भाषाई झगडे निम्नस्तर की राजनीति की भेट चढ़ते देर नहीं लगती जो कि दुर्भाग्य-पूर्ण है  ! धर्मनिरपेक्षता की आड में अपने को साम्यवादी एवं समाजवादी कहने वाले  राजनेताओं और तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवियों ने अपने वाकपटु मुहफट बयानों के चलते  भारत की एकता और अखंडता को सदैव ही नुक्सान पहुचने में कोई कसर नहीं छोडी ! अवसरवादी राजनीति के चलते ये तथाकथित लोग मीडिया के सहारे विभिन्न आयोगों और माननीय न्यायालयों के निर्णयों को भी अपने वोट-बैंक के तराजू पर तौलते हुए देश में एक भ्रम की स्थिति पैदा करने में भी कोई कमी नहीं छोड़ते और अपने आपको न्यायाधीश समझते हुए फैसले देते हुए भी नहीं हिचकिचाते ! इसका उदाहरण हम कांग्रेस की जयंती नटराजन के उस बयान में देख सकते है जिसमे उन्होंने गोधरा - काण्ड पर आये न्यायालय को फैसले को बिना पढ़े अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि गोधरा - काण्ड के बाद हुए दंगो के लिए नरेंद्र मोदी ही दोषी है, इसके अलावा हम उत्तर प्रदेश में चुनाव के समय कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह के उस बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिसमे उन्होंने दिल्ली के जामिया एंकाउन्टर में मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिल्ली पुलिस के मनोबल को नेस्तनाबूत करने का दुस्साहस किया था !   इन्ही वाकपटुओ के बयानों के चलते  देश ने हमेशा सामाजिक सौहार्द, एकता , सुरक्षा जैसे राष्ट्रहित का अभाव महसूस किया है ! बात चाहे  1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् दंगो के बाद  हुई हिंसा को सही ठहराने के लिए कांग्रेस पार्टी के उन लोगो की हो जिन्होंने एक कहावत का सहारा लेते हुए कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है अथवा  अन्ना टीम के प्रशांत भूषण का कश्मीर पर बयान हो या फिर अभी असम के मुख्यमंत्री का वह बयान जिसमे उन्होंने कहा कि असम में हाल में हुई यह सांप्रदायिक - हिंसा अस्थायी थी !   

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया ही न जा सके इसकी तैयारी के लिए अभी से राजनीतिक पंडितो ने मीडिया के सहारे अपने  - अपने मोर्चे खोलकर जनमानस में नरेंद्र मोदी एक साम्प्रदायिक - हिंसा को बढ़ावा देने वाला व्यक्ति है ऐसी उनकी "ब्रांडिंगकी जा रही है ! इसी के चलते नरेंद्र मोदी से मिलने वाला हर व्यक्ति साम्प्रदायिक - हिंसा ो समर्थन करने वाला होगा ऐसा प्रचार अभियान चलाया जाना वास्तव में भारतीय राजनीति के लिए एक अक्षम्य अपराध है जिसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा ! अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव तक जिस किसी ने नरेंद्र मोदी की तारीफ की उसे इन बुद्धिजीवियों का दंश झेलना ही पड़ा , एक तरफ जहा शीला दीक्षित और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विजय दर्डा को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया तो वस्तानवी से लेकर शाहिद सिद्दकी इतने खुशनसीब नहीं रहे उन्हें उनके पद से मुक्त ही  कर दिया गया ! भारत की राजनीति नरेंद्र मोदी के साथ ऐसी छुआछूत का व्यवहार क्यों कर रही है और साथ ही  माननीय न्यायालयों ने भी गोधरा - दंगो का दोषी उन्हें नही माना और न ही जनता से माफी मागने के लिए कहा तो फिर ये मीडियाकर्मी और तथा कथित सेकुलर बुद्धिजीवी अपने अहम् के चलते संविधान की किस व्यवस्था के अंतर्गत उनसे माफी मागने के लिए लगातार कह रहे है ? मात्र चंददिनों में गोधरा - दंगो को नियंत्रण में लाने वाले और पिछले दस वर्षो में गुजरात में एक भी कही भी दंगा न होने देने वाले नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में क्या एक अछूत है ?  

परन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी है ! एक तरफ जहां ये सेकुलर बुद्धिजीवी और मीडिया की आड़ में राजनेता अपनी राजनीति की रोटियां सेकने में व्यस्त है तो वही इससे कोसो दूर गुजरात अपने विकास के दम पर भारत के अन्य राज्यों को दर्पण दिखाते हुए उन्हें गुजरात का अनुकरण करने के लिए मजबूर कर रहा है ! नरेंद्र मोदी पर लोग साम्प्रदायिकता की आड़ में जो भेदभाव का आरोप लगाया जाता है वह निराधार है ! एक आंकड़े के अनुसार गुजरात में मुसलमानों की स्थिति अन्य राज्यों से कही ज्यदा बेहतर है ! ध्यान देने योग्य है कि भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात के मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति सबसे अधिक है और सरकारी नौकरियों में भी गुजरात - मुसलमानों की 9.1 प्रतिशत भागीदारी के साथ अव्वल नंबर पर है ! इतना ही नहीं पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के 84वे स्थापन दिवस के मौके पर  गुजरात के कृषि विकास को देखते हुए कहा कि जलस्तर में गिरावट , अनियमित बारिश और सूखे जैसे समस्याओ के बावजूद गुजरात 9 प्रतिशत की अभूतपूर्व कृषि विकास दर के माध्यम से भारत के अन्य राज्यों पर अपना परचम लहरा है जबकि भारत की कुल कृषि विकास दर मात्र 3 प्रतिशत है ! विश्व प्रसिद्द ब्रोकरेज मार्केट सीएलएसए ने  गुजरात के विकास विशेषकर इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑटोमोबाइल उद्योग तथा डीएमईसी प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी गुजरात का विकास एक सीईओ की तरह काम कर रहे है ! यह कोई नरेंद्र मोदी को पहली बार सराहना नहीं मिली इससे पहले भी अमेरिकी कांग्रेस की थिंक टैंक ने उन्हें 'किंग्स ऑफ गवर्नेंस' जैसे अलंकारो से अलंकृत किया ! नरेंद्र मोदी को  टाइम पत्रिका के कवर पेज पर जगह मिलने से लेकर ब्रूकिंग्स के विलियम एन्थोलिसअम्बानी बंधुओ और रत्न टाटा जैसो उद्योगपतियों तक ने एक सुर में सराहना की है !

नरेंद्र मोदी की प्रशासक कुशलता के चलते फाईनेंशियल टाइम्स ने हाल ही में लिखा था कि देश के युवाओ के लिए नरेंद्र मोदी प्रेरणा स्रोत बन चुके है ! पाटण जिले के एक छोटे से चार्णका गाँव में सौर ऊर्जा प्लांट लगने से नौ हजार करोड़ का निवेश मिलने से वहा के लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठ गया ! ध्यान देने योग्य है कि अप्रैल महीने में  नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी काउंसिल जनरल पीटर तथा एशियाई विकास बैंक के अधिकारियों की मौजूदगी में एशिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा पार्क का उद्घाटन किया था जिससे सौर ऊर्जा प्लांट से 605 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा जबकि शेष भारत का यह आंकड़ा अभी तक मात्र दो सौ मेगावाट तक ही पहुंच पाया है ! भले ही कुछ लोग गुजरात का विकास नकार कर अपनी जीविका चलाये पर यह एक सच्चाई है कि गुजरात की कुल मिलाकर 11 पंचवर्षीय योजनाओं का बजट   भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट के लगभग समकक्ष है ! अपनी इसी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता के चलते आज भारत ही नहीं विश्व भी नरेंद्र मोदी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता है जिसकी पुष्टि एबीपी नील्‍सन ,  सीएनएन-आईबीएन और इण्डिया टुडे तक सभी के सर्वेक्षण करते  है और तो और  नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का अनुमान कई सोशल साइटो पर  भी देखा जा सकता है ! बावजूद इन सब उपलब्धियों के गुजरात को विकास के शिखर पर पहुचाने वाले नरेंद्र मोदी से छुआछूत - सा व्यवहार करना कहाँ तक सार्थक और तर्कसंगत है यह आज देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न है !

- राजीव गुप्ता 

10 टिप्‍पणियां:

राजीव उपाध्याय ने कहा…

प्रिय श्री गुप्ता
आपने एक गंभीर विषय को तारतम्य व् तथ्याधारित ढंग से पेश किया , इसके लिए बढ़ायी स्वीकार करें.
परन्तु यह चिंतन आवश्यक है कि हमारे विदेशियों के हाथ बिके मिडिया के दुष् प्रचार का कैसे सामना किया जाय.ऐसे हज़ारों लेख पांच मिनट के चैनल के दुष्प्रचार से हार जाते हैं .
साथ में मोदी जी को भी सलाह कि आवश्यकता है .सब दोस्तों को दुश्मन बना कर प्रजातंत्र में नहीं चल सकते . उन्हें भी लोगों को साथ ले कर चलने कि कला सीखनी चाहिए .
सुप्रयास के लिए धन्यवाद

गौतम चौधरी ने कहा…

राजीव आपको सादर साधुवाद
तथ्य और सत्य प्रस्तुत करने की क्षमता और सामथ्य बहुत कम लोगों के पास होती है। आपकी लेखनी में वे दोनों गुण परिलक्षित हो रहे हैं। इस महान उपलब्धि के लिए मैं आपके योग-क्षेम की कामना करता हूं। जहां तक मोदी जी की बात है तो मैं आपके विचार से थोडा असहमत हूं। मैंने मोदी जी को बहुत करीब से देखा है। बारीकी से अध्यन किया है। गुजरात में और अहमदाबाद एवं गांधीनगर में दो सालों तक संवाद-प्रेषण का काम किया है। निःसंदेह गुजरात के लिए आज के समय में नरेन्द्र भाई अपरिहार्य हैं। देष उन्हें किस रूप में ले रहा है वह मिमांषा और गहन मंथन का विषय है। जिस विकास की बात आप और आम मीडिया कर रही है वह विकास गुजरात में कही नहीं दिखता। गुजरात का विकास महज एक प्रचार है। सोलर-पार्क, सुरक्षा के नित नवीन उपकरण। इसे विकास मैं नहीं माना। विकास का मतलब आम लोगों के जनजीवन के उच्चीकरण से है। बडे-बडे मॉल और सीनेमाहॉल से विकास नहीं होता। विकास का मतलब समावेषी विकास है। गुजरात की जनसंख्या लगभग 6 करोड है। उस जनसंख्या में से दो करोड लोग दाहोद, साबरकांठा, पाटन, बनासकाठा, पंचमहल, नर्मदा बादि जिले में निवास करती है। आप केवल सूरत, राजकोट, अहमदाबाद और बडोदरा को देख रहे हैं। इसमें से भी तीन शहर सूरत, राजकोट और अहमदाबाद-गांधीनगर को छोड दें तो बडोदरा का हाल बहुत खास्ता है। कभी बडोदरा जाने का मौका मिले तो आप देखना। मैं कच्छ में भी गया हूं और द्वारिका के क्षेत्रों का भी भ्रमण किया है। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में बडी समस्या है। इस बार तो कई क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए मानामारी है। गुजरात की समृद्धि दो बातों पर आधारित है। एक तो वहां उत्पादन हाने वाले पेट्रोलियम पदार्थों पर और दूसरा कपास की खेती पर। कपास के कारण गुजरात के कुछ क्षेत्रों में समृद्धि आपको दिखेगी। हां मोदी जी ने विद्युत और सडक पर जोड दिया है। उसका भी आधार केसूभाई और अन्य मुख्यमंत्रियों ने ही तैयार किया था। अलंग और सूरत के निकट वाला औद्योगिक क्षेत्र का विकास कांग्रेस के शासन काल में सनत भाई मेहता ने करवाया था। मोदी जी ने आधानभूत संरचना के लिए आज तक कुछ भी नहीं किया। वे बस समाचार मैनेज करने में माहिर हैं। साथ ही अपने खिलाफ उठ रहे विवादों को अपने पक्ष में करने के खिलाडी हैं। आपने अपने आलेख में गोधरा और उसके बाद हुए दंगे की चर्चा की है। आपको पता होगा कि जिस समय कारसेवक जलाये गये उस समय मोदी जी ही गुजरात के मुख्यमंुत्री थे। गोधरा आज से नहीं सन 1934-35 से संवेदनषील है। जिस समय मोरारजी भाई देसाई वहां के प्रषासक थे उस समय में भी गोधरा में दंगा हुआ था। जब इस बात की जानकारी मोदी प्रषासन को थी तो उन्होंने वहां सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं किये। न्यायालय की आख्या को पढने से आपको पता चलेगा कि गोधरा में सुनियोजित हत्या की योजना बनी थी। मुस्लिम चरमपंथी विगत कई महीनों से बैठक कर रहे थे बावजूद मोदी प्रषासन अनभिज्ञ रही और गोधरा में निरीह हिन्दुओं की हत्या होने दिया। आज पूरा का पूरा भेंट द्वारका मुस्लिम चरमपंथियों का गढ बन गया है। मोदी प्रषासन सब जानते हुए मौन धारन किये हुए है। मीडिया का मैनेजमेंट मोदी जितना करते हैं, उतना इस देष में शायद ही कोई करता होगा। अपने इमेज को चमकाने के लिए उन्होंने दुनिया की सबसे बडी अमेरिकन पीआर एजेंषी को हायर कर रखा है। अब आप ही सोचें मोदी हमारे साथ कहां तक चल सकते हैं। और कुछ बातें यहां लिखना ठीक नहीं होगा। हम और आप लगभग एक ही विद्यालय के छात्र हैं। कुछ बातें जो मन में है उससे विचारधारा को ठेस पहुंच सकती है, इसलिए यहां लिखना उचित नहीं समझता हूं। बावजूद मैं भी मोदी को गुजरात के लिए अपरिहार्य मानता हूं। देष के प्रधानमंत्री के लिए उन्हें कुछ और परीक्षा पास करना होगा।
तथ्यपरक आलेख के लिए एक बार और धन्यवा। और हां, कुछ अटपटा लिख देने के लिए क्षमा करेंगे। क्योंकि बात जब निकलती है तो दूर तक जाती है।
गौतम चौधरी
चंडीगढ।

WORLD OF PK ROY ने कहा…

भारत को भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस के राष्ट्रवाद और देशभक्ति की आवश्यकता है। नरेंद्र मोदी यदि प्रखर देश भक्ति को अपना सकते हैं तो यकीनन आगे बढ सकेगें। किसी भी किस्म की सांप्रदायिकता देश को अंततः धवस्त कर देगी।

Rajnish Gupta ने कहा…

रॉय साहब आज धर्म निरपेक्षता और साम्प्रदायिकता पर बड़ी बहस चल रही है ,अपने को धर्म निरपेक्ष दिखाना एक फैशन सा है इस दौड़ में केवल हिन्दू ही है कोई भी मुस्लिम और इसाई कभी सांप्रदायिक नहीं हो सकता .असम में हिन्दू कत्लेआम पर यदि कोई बोलेगा तो वह सम्प्रद्यिक हो जायेगा ,कोसीकला के दंगो पर बोलेगा तो साम्प्रदायिक हो जायेगा ,केरल में हिन्दुयो की हत्या पर बोलना संप्र्द्यिकता है गुजरात के दंगो के १० साल बाद भी नरेन्द्र मोदी सम्प्रद्यिक परन्तु असम में हिन्दू की हत्यो के जिम्मेदार मुख्यमंत्री धर्मनिरपेक्ष ,मुसलमानों को आरक्षण देने की बात धर्मनिरपेक्षता ? अरे भाई जो हिन्दू बचपन से यही शिखता फूल मत तोड़ो ,सायं में पेड़ मत छुओ सो गए है ,चीटी मत मरो पाप लगेगा ,जीव जंतु से लेकर इंसान तक की सुरक्षा हमे बचपन से शिखयी जाती है विश्व के मंगल की कामना भी हिन्दू ही करता है तो हिन्दू साम्प्रदायिक कैसे हो सकता है ,हजारो लोगो की हत्या करने वाले मुस्लिम आतंकवादी आज भी धरमनिरपेक्ष भाई वह क्या परिभासा आपको पुन विचार करना होगा की संप्र्द्यिक कौन ?

कौशलेन्द्र ने कहा…

बन्धु श्री गुप्त जी!
आपने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाये हैं। 1- मोदी की नेतृत्व क्षमता और गुजरात का विकास,2- साम्प्रदायिक दंगे, 3- मोदी के विरुद्ध मीडिया की लामबन्दी और 4- निरंकुश होती भारतीय मीडिया।
इसमें कोई शक नहीं कि तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो मोदी अधिक सक्षम व्यक्ति हैं। यद्यपि भावी प्रधानमंत्री के लिये और भी सक्षम (सुब्रमण्यम स्वामी) लोग देश के पास हैं।
इन सभी बिन्दुओं में जो सर्वाधिक ज्वलंत और चिंतनीय बिन्दु है वह है निरंकुश होता मीडिया, अतः मैं इसी बिन्दु अपनी चर्चा को फ़ोकस करना चाहूँगा। विगत कुछ वर्षों से भ्रष्ट प्रशासनिक उच्चाधिकारियों और राजनेताओं की मांद में सेन्ध लगा पाने और उसकी सौदेबाजी में सफलता पा लेने के बाद से भारतीय मीडिय़ा के कुछ लोगों ने स्वयं को भारत का भाग्यविधाता और बादशाह मान लेने का भ्रम पाल लिया है। उनके कृत्य, उद्देश्य़, तौर तरीके और प्रस्तुतीकरण ने लोकतंत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन करने और मदारी बनकर देश को नचाने में अपनी महारत को बारम्बार प्रमाणित करने का निन्दनीय कृत्य किया है। स्वयं को स्वयम्भू तानाशाह और सर्वोपरि मान चौथे स्तम्भ की मर्यादाओं को ध्वस्त करते हुये विरोधपूर्ण दुष्प्रचार को निजी स्वार्थ का साधन बना लेने की निर्लज्ज होड़ आज के चौथे स्तम्भ का आचरण होता जा रहा है। यह मानसिकता अत्यंत घातक है स्वयं पत्रकारिता के लिये भी और लोकतंत्र के लिये भी। यद्यपि यह भी सच है कि उन्हें भ्रष्ट लोगों द्वारा स्पेस दिया जाता है किंतु यह स्पेस स्वीकार करना ही मीडिया की पवित्रता को कलंकित करने का मूल है। यह प्रश्न उठ सकता है कि जब चारो ओर मूल्यों के पतन की आँधी चल रही है तो केवल मीडिया से ही पवित्र आचरण की अपेक्षा क्यों? किंतु यह प्रश्न बेमानी है। पहरेदार से पहरेदारी की अपेक्षा किया जाना स्वाभाविक है और एक अपरिहार्य आवश्यकता भी। राजनेताओं ने देश को लूटा है, अधिकारियों ने देश को लूटने में राजनेताओं का साथ दिया है, पूँजीपतियों ने अवसरों को भुनाया है ...और इस सारी अराजकता के दौरान पहरेदारों ने अपने काम को मुस्तैदी से अंजाम देने में कोताही की है। पतन के शिखर की ओर बढ़ते लोगों को आगे बढ़ने से रोकने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज लोकतंत्र की रक्षा के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका जिसकी है वह भी अवसर को भुनाने में लग जाय तो आम आदमी की निराशा-हताशा अंतहीन हो जाती है। लॉबींग करने की अपेक्षा मीडिया को सारे तथ्य जनता के सामने जस के तस रखने चाहिये और निर्णय करने का उत्तरदायित्व जनता जनार्दन पर छोड़ देना चाहिये। मीडिया द्वारा निर्णायक की भूमिका का वरण कर लेना लोकतंत्र के लिये ख़तरनाक है। निरंकुश होते जा रहे मीडिया की लगाम को सजग और समर्पित मीडिया ही थाम सकती है। ...और हमें इस बात की प्रतीक्षा है।

कौशलेन्द्र ने कहा…

बन्धु श्री गुप्त जी!
आपने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाये हैं। 1- मोदी की नेतृत्व क्षमता और गुजरात का विकास,2- साम्प्रदायिक दंगे, 3- मोदी के विरुद्ध मीडिया की लामबन्दी और 4- निरंकुश होती भारतीय मीडिया।
इसमें कोई शक नहीं कि तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो मोदी अधिक सक्षम व्यक्ति हैं। यद्यपि भावी प्रधानमंत्री के लिये और भी सक्षम (सुब्रमण्यम स्वामी) लोग देश के पास हैं।
इन सभी बिन्दुओं में जो सर्वाधिक ज्वलंत और चिंतनीय बिन्दु है वह है निरंकुश होता मीडिया, अतः मैं इसी बिन्दु अपनी चर्चा को फ़ोकस करना चाहूँगा। विगत कुछ वर्षों से भ्रष्ट प्रशासनिक उच्चाधिकारियों और राजनेताओं की मांद में सेन्ध लगा पाने और उसकी सौदेबाजी में सफलता पा लेने के बाद से भारतीय मीडिय़ा के कुछ लोगों ने स्वयं को भारत का भाग्यविधाता और बादशाह मान लेने का भ्रम पाल लिया है। उनके कृत्य, उद्देश्य़, तौर तरीके और प्रस्तुतीकरण ने लोकतंत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन करने और मदारी बनकर देश को नचाने में अपनी महारत को बारम्बार प्रमाणित करने का निन्दनीय कृत्य किया है। स्वयं को स्वयम्भू तानाशाह और सर्वोपरि मान चौथे स्तम्भ की मर्यादाओं को ध्वस्त करते हुये विरोधपूर्ण दुष्प्रचार को निजी स्वार्थ का साधन बना लेने की निर्लज्ज होड़ आज के चौथे स्तम्भ का आचरण होता जा रहा है। यह मानसिकता अत्यंत घातक है स्वयं पत्रकारिता के लिये भी और लोकतंत्र के लिये भी। यद्यपि यह भी सच है कि उन्हें भ्रष्ट लोगों द्वारा स्पेस दिया जाता है किंतु यह स्पेस स्वीकार करना ही मीडिया की पवित्रता को कलंकित करने का मूल है। यह प्रश्न उठ सकता है कि जब चारो ओर मूल्यों के पतन की आँधी चल रही है तो केवल मीडिया से ही पवित्र आचरण की अपेक्षा क्यों? किंतु यह प्रश्न बेमानी है। पहरेदार से पहरेदारी की अपेक्षा किया जाना स्वाभाविक है और एक अपरिहार्य आवश्यकता भी। राजनेताओं ने देश को लूटा है, अधिकारियों ने देश को लूटने में राजनेताओं का साथ दिया है, पूँजीपतियों ने अवसरों को भुनाया है ...और इस सारी अराजकता के दौरान पहरेदारों ने अपने काम को मुस्तैदी से अंजाम देने में कोताही की है। पतन के शिखर की ओर बढ़ते लोगों को आगे बढ़ने से रोकने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज लोकतंत्र की रक्षा के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका जिसकी है वह भी अवसर को भुनाने में लग जाय तो आम आदमी की निराशा-हताशा अंतहीन हो जाती है। लॉबींग करने की अपेक्षा मीडिया को सारे तथ्य जनता के सामने जस के तस रखने चाहिये और निर्णय करने का उत्तरदायित्व जनता जनार्दन पर छोड़ देना चाहिये। मीडिया द्वारा निर्णायक की भूमिका का वरण कर लेना लोकतंत्र के लिये ख़तरनाक है। निरंकुश होते जा रहे मीडिया की लगाम को सजग और समर्पित मीडिया ही थाम सकती है। ...और हमें इस बात की प्रतीक्षा है।

KRANT M.L.Verma ने कहा…

जो लोग हिन्दू धर्म को साम्प्रदायिकता से जोड़कर देखते हैं मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है ऐसे ही लोगों के लिये मैंने कभी उर्दू में बहुत लम्बी नज़्म लिक्खी थी उसकी चन्द पंक्तियाँ यहाँ पेश कर रहा हूँ ताकि कुछ लोगों की अक्ल पर पड़ा हुआ पर्दा हट सके-
"आज खतरा नहीं उतना है मुसलमानों से,
जितना जयचन्द की औलादों से जो ज्यादा हैं;
मेरा कहना है कि उन सबसे निबट लो पहले,
कौम को अपनी मिटाने पे जो आमादा हैं;
हम तो लोहू की सियाही से ये सब लिखते हैं,
ताकि सोया ये लहू जागे कसम खाने को,
हम किसी जन्म में थे 'चन्द' कभी थे 'बिस्मिल',
देखें कौन आता है ये फर्ज़ बजा लाने को?"
मदनलाल वर्मा 'क्रान्त'

Dr. shyam gupta ने कहा…

-----सही लिखा है राजीव जी आपने ....मोदी का यही कुसूर है कि वे हिन्दू हैं ...बीजेपी/ आरएसएस से सम्बंधित ...जिसे आज भारत में छद्म धर्मनिरपेक्ष लोग...अछूत मानते हैं ..जैसे श्री कृष्ण को उस समय की अधर्मी राज सत्ताएं ....

---गुजरात का मैंने भी भ्रमण किया है....वहाँ जन सामान्य में लूट-मार, द्वंद्व आदि सामान्यतः कम हैं ...
--- ट्रेन से द्वारिका की ओर जाते समय स्थान-स्थान पर हरे झंडे घर घर पर फहराते हुए दिखाई दिए ...यह क्या है ?
---जहां तक पानी आदि की कमी की बात है वह तो सारे भारत भर में है...गुजरात तो मरुभूमि के निकट है ...

PRAN SHARMA ने कहा…

AAPKE VICHAARON SE MAIN SAHMAT HUN .

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आपका लेख विचारोत्तेजक है.

Nice.

हार्दिक शुभकामनाएं.