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मंगलवार, 29 मई 2012

महानगरो में बढ़ते तलाक




भारत के प्रमुख महानगरो जैसे दिल्ली,  मुम्बई, बैगलूरू , कोलकाता , लखनऊ में आये दिन तलाको की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है! अभी तक यह गलत धारणा थी कि तलाक की समस्या छोटे शहरो  और बिना पढ़े-लिखे समाज में ज्यादा है परन्तु आंकड़े कुछ और ही इशारा करते है!  एक सर्वे के अनुसार 1960 में जहा तलाक के वर्ष भर में एक या दो केस ही होते थे वही 1990 तक आते - आते तलाको की संख्या प्रतिवर्ष हजारो की गिनती को पार कर गयी! फैमली कोर्ट में 2005 में तो यह संख्या लगभग 7000 से भी अधिक हो गयी! आश्चर्य की बात यह तलाक लेने वालो में सबसे बड़ी संख्या 25 -35 वर्ष के नव-दम्पत्तियो की है! ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक इस समय दिल्ली में हर साल तलाक़ के आठ-नौ हज़ार मामले दर्ज हो रहे हैं ! मुंबई में तलाक़ के मामलों की सालाना संख्या करीब पांच हज़ार है !

विशेषज्ञों का मानना है कि  तलाक की संख्या में लगातार वृद्धि इसलिए भी हो रही है क्योंकि शहरी - समाज ने तलाकशुदा लडकियों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है! ग्रामीण - समाज की तरह अब उन्हें गिरी हुई नजर से नहीं देखा जाता! आजकल डिंक्स ( DINKS , अर्थात डबल इनकम नो किड्स ) का चलन जोर पकड़ रहा है जिसके कारण शादियाँ टूटने के कगार पर पहुच जाती है! आज-कल कामकाजी जोड़े 10 से 14 घंटे घर से बाहर रहते हैं! ऐसे में, एक-दूसरे पर उनका इतना भरोसा बन नहीं पाता! उस पर भी अगर कोई अपने स्पाउस को किसी के साथ हँसी-मजाक करते देख ले, तो उस रिश्ते को टूटने से कोई नहीं रोक सकता! बढ़ते डिवॉर्स केसेज की वजहें ऊपर से भले ही अलग-अलग हों, लेकिन गहराई से देखने पर आपस में भरोसे का ना होना ही इसका सबसे बड़ा कारण है! समाजशास्त्रियों का तर्क है कि युवा जोड़े  शादी से पहले तो एक-दूसरे पर बहुत भरोसा करते हैं, लेकिन बाद में वह तेजी से कम होने लगता है! रिश्तो में पारदर्शिता का होना बहुत जरूरी होता है! छोटी - छोटी बातो पर झूठ बोलना हो सकता है कि शुरुआती दौर में अच्छा लगे परन्तु कालांतर में यही तलाक का कारण भी बन सकता है ! क्योंकि रिश्तों की बुनियाद सच्चाई पर रखनी चाहिए न कि झूठ की पुलंदियों पर! अतः बजाय छोटी-छोटी बातो पर झूठ बोलने के एक दूसरे को विश्वास में लेना बहुत जरूरी होता है!


इंटरनेट अगर आपको पुराने दोस्तों से मिलवाकर आपको खुश कर सकता है, तो यह आपकी निजी ज़िंदगी को नरक भी बना सकता है! बात चाहे  नेट उपयोग करने की हो या फिर सोशल नेटवर्किंग साइट्स की, सच यही है कि इनके जरिए इंटरनेट आज संबंधो के बीच आ गया हैशादीशुदा ज़िंदगी  में दरार एक प्रमुख कारण यह भी है कि पुरुष/स्त्री परिवार को समय देने की बजाय ज्यादातर  गेम्स वर्ल्ड में खोए होते हैं जिससे उनका वैवाहिक जीवन प्रभावित होता है!यह भी कितना विरोधाभास है कि वही टेक्नॉलजी जो हमें पूरी दुनिया से जोड़ती है , अपने ही साथी से अलग कर देती है! इस बारे में सायकॉलोजिस्ट भी मानते है कि सोशल नेटवर्किंगसाइट्स के इस्तेमाल से विवाहित जोड़े  की लाइफ पूरी तरह प्रभावित हो रही है! दिन भर ऑफिस में काम करने के बाद पति -पत्नी से अपने शयनकक्ष  में बहुत कम भावनात्मक जुड़ाव रख पाता है , लेकिन पत्नी  दिन भर की सारी बातें और शिकायतें शयनकक्ष  में ही करती है! ऐसे में जब पति उसकी बातों का जवाब नहीं दे पाता , तो रिश्तों में दरार पड़नी शुरू हो जाती है! वही लिव-इन रिलेशनशिप में भी तलाक की सम्भावनाये ज्यादा होती है!  मई 2012 में बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस पी.बी. मजूमदार और अनूप मोहता बेंच ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप से लोगों की शादीशुदा जिंदगी को बर्बाद कर रहा है! कुछ एक्सपर्ट्स तो यहाँ तक कहते है कि महिलाओ की आर्थिक आजादी भी कही ना कही तलाक के कारण के रूप में उभर कर सामने आ रही है! क्योंकि रोजमर्रा के जीवन में ऐसे जोड़ों के बीच "मै ही क्यों करू" का अहम् भाव जग जाता है! परिणामतः बजाय एक दूसरे को सम्मान की नजर से देखने के एक दूसरे को नीचा दिखाने की फ़िराक में रहते है! ऐसे में शादी को वो ढोना शुरू कर देते है और बहुत जल्दी ही अलगाव तक पहुचने की नौबत आ जाती है !

देश के नगरों-महानगरों में रहनेवाले उन परिवारों की जिनमें कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा चार सदस्य होते हैंजिन्हें हम न्यूक्लियर फेमिली अर्थात एकल परिवार की संज्ञा देते है जिसमें पति-पत्नी और उनके बच्चे रहते है का चलन काफी बढ़ा है! पति-पत्नी में ज्यादातर दोनों ही काम करते हैं!  एकल परिवार  के रूप में रहना इनका कोई शौक नहीं होता , अपितु मजबूरी होती है क्योंकि ऐसे परिवारों को अपनी निजी ज़िंदगी में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होता! अक्सर इन लोगों ने या तो प्रेम विवाह किया होता है या पांरपरिक शादी के चंद महीनों बाद ही एक-दूसरे को समर्पित हो जाते हैं! लेकिन चार-पांच साल गुजरते ही कभी बच्चे की परवरिश, कभी रहने-खाने के तौर-तरीके, कभी करियर तो कभी साफ-सफाई जैसी मामूली बातों पर तकरार का दौर शुरू हो जाता है! फुरसत मिलते ही दोनों झगड़ना शुरू कर देते हैं! फिर एक दिन ऐसी नौबत आ जाती है कि पति-पत्नी को न तो अपनी परवाह रहती है, न ही बच्चों की और वे अलग होने का बेहद तकलीफदेह फैसला कर बैठते हैं! पहले संयुक्त परिवारों में महिलाओं की उलझनें आपस में ही बात करके सुलझ जाती थीं! परन्तु  आज एकल परिवारों के पास संयुक्त परिवारों जैसा कुशन नहीं है! पति-पत्नी को खुद ही एक दूसरे का पूरक बनना चाहिए वैसे भी मर्यादित नोक-झोक से तो प्यार ही बढ़ता है!

सोचने वाली बात यह है कि वे कौनसी परिस्थितियाँ होती हैं, जिनमें प्रकृति के सबसे सुन्दर रिश्ते में बंधने के लिये पैदा हुए स्त्री-पुरुष, जैसे ही पति-पत्नी के रिश्त में बंधते हैं, आपस में प्रेम करने के बजाय एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं! इस कड़वी, किन्तु सच्ची बात को हमें खुले दिल, और खुले दिमांग से समझना होगा! भारत में विवाह एक धार्मिक संस्कार है , मोक्षप्राप्ति का एक सोपान है! परिणामतः विवाह को मात्र  विलास वासना का सूत्रपात नहीं है अपितु  संयमपूर्ण जीवन का प्रारंभ भी माना गया है! मनुष्यों में पशु की भांति यथेच्छाचार न हो , इन्द्रिय-निग्रह  और भोगभाव मर्यादित रहें , भावों में शुचिता रहे , धीरे - धीरे संयम के द्वारा मनुष्य त्याग की ओर बढे , संतानोत्पत्ति द्वारा वंश की वृद्धि हो,  प्रेम को केन्द्र में रखकर उसे पवित्र बनाने का अभ्यास बढे , स्वार्थ का संकोच और परार्थ त्याग की बुध्धि जागृत होकर वैसा ही परार्थ त्यागमय जीवन बने इन्ही सब उद्देश्यों को लेकर भारत में विवाह को एक संस्था का दर्जा दिया गया था! तलाक जैसी इस वीभत्स समस्या से निजात पाने के लिए अब समाज को सोचने का समय आ गया है कही ऐसा ना हो कि पश्चिम का अन्धानुकरण करते -  करते हम अपने बहुमूल्य जीवन को नरक बना दे!


- राजीव गुप्ता , स्वतंत्र पत्रकार 

गुरुवार, 24 मई 2012

जनता पर तेल की मार




महंगाई की मार से जूझ रही जनता पर इस बार यूं.पी.ए. - की अब तक की सबसे  बड़ी मार पड़ी है ! इस मंगलवार को  यूं.पी.ए. -  ने सरकार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के सत्ता में तीन साल पूरे होने के उपलक्ष्य में  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से शाम को एक डिनर पार्टी का आयोजन किया गया जिसमे सरकार की तीन वर्षो की उपलब्धियों को गिनाया गया अभी  उपलब्धियों  का यह जश्न पूरे शबाब पर ही था कि अचानक तेल कंपनियों ने बुधवार की शाम को पेट्रोल की कीमत में 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी की घोषणा कर दी ! गौरतलब है कि पेट्रोल के दाम में कभी भी इतनी ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की गई ! इससे पहले पिछले साल बार 5-5 रुपये की बढ़ोतरी की जरूर गई थीजो सबसे ज्यादा थी ! तमाम राजनीतिक दबावों को दरकिनार कर तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी की है  ! डीजल और एलपीजी दाम नहीं बढ़ाए गए हैं गौरतलब है कि  डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए शुक्रवार को मंत्रियों के समूह की बैठक होने वाली है और इसी बैठक में इनके दामों में बढ़ोतरी का निर्णय लिया जाएगा ! वर्तमान समय में तेल रूपी "विश्व - मोहिनी" से प्रभावित होकर महंगाई "सुरसा"  की भांति अपना मुंह दिन-प्रतिदिन फैलाकर बढ़ाये जा रही है ! जिसकी मार से आम आदमी त्रस्त हैऔर सरकार विश्व - पटल पर तेल के दामों में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड लेती है ! गौरतलब है कि इस समय कच्चे तेल की कीमतों में कमी हुई है  ! परन्तु जबसे यूंपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है आये हर दूसरे  - तीसरे महीने निजी कम्पनियाँ मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा किये जा रही है !

वित्त मंत्री ने पेट्रोल की कीमत में वृद्धि के लिए डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार गिरते स्तर को बताया ! गौरतलब है कि बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले रेकॉर्ड 56 रुपये के पार पहुंच गया और अर्थशास्त्रियों ने यह आशंका जताई है कि रुपये में और कमजोरी आ सकती है ! यह प्रति डॉलर 60 रुपये के स्तर तक गिर सकता है ! बुधवार को एक वक्त रुपया एक डॉलर के मुकाबले 56.21 रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया थाजो अब तक की रुपये की सबसे बड़ी गिरावट है ! ज्ञातव्य है कि भारत बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम पदार्थ का आयात करता है और इसका भुगतान डॉलर में होता है ! डॉलर के मुकाबले रुपया 55 से भी नीचे जाने के कारण तेल कंपनियों का घाटा बढ़ गया है ! अर्थशास्त्रियों का यह तर्क है कि तेल कंपनियों को बढ़ी हुई कीमतों के पहले तक पेट्रोल पर करीब 12 रुपये और डीजल पर 15 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा था ! 2011-12 में तेल कंपनियों को 1,38,541 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था ! सरकार ने 83,500 करोड़ की भरपाई की !  

सरकार का यह तर्क कि पेट्रोलियम मूल्य पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है  गले नहीं उतरता ! कारण बहुत साफ़ है कि जब राज्यों में चुनाव हो रहे थे तब तेल कंपनियों दाम नहीं बढ़ाये और अभी हाल में ही संसद का बजट सत्र मंगलवार को ही खत्म हुआ है तब भी तेल कंपनियों ने दाम नहीं बढ़ाये ! हालाँकि अटकलों का बाजार पूरे जोर पर था कि अब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का ऐलान कभी भी हो सकता है ! सरकार कुछ भी तर्क देती रहे पर उसकी मंशा पर भी अब सवाल खड़े हो रहे है ! ऐसा लगता है सरकार परदे की पीछे से राजनीति कर रही है ! क्योंकि मंगलवार को ही संसद का बजट सत्र समाप्ति के बाद पेट्रोलियम मिनिस्टर एस. जयपाल रेड्डी ने तेल की कीमतें तुरंत बढ़ाने की जरूरत बताईलेकिन कहा कि इससे पहले राजनीतिक दलों से बात करनी होगी ! सरकार ने बात की या नहीं यह तो वही जाने पर तेल की कीमते जरूर बढ़ा दी गयी जिससे उनके अपने ही सहयोगियों आग-बबूला हो रहे है !

सरकार का कहना है कि आरबीआई रुपये की कमजोरी को रोकने की कोशिश कर रहा हैलेकिन उसकी कोशिश नाकाफी साबित हो रही है ! तमाम कोशिशों के बावजूद रुपये की गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है ! अगर रुपये की गिरावट इसी तरह जारी रहीतो घटते औद्योगिक उत्पादन के बीच आयात आधारित उद्योग बर्बाद हो सकते हैं ! सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थ ही नहीं खाने पीने के तेलों की कीमत बढ़ सकती है ! साथ ही दाल की कीमतें भी काफी बढ़ सकती हैं ! आम जनता के किचन का बजट बिगड़ सकता है ! इन सबकी मार आखिरकार आम जनता पर ही पड़ेगी ! कांग्रेस पार्टी का चुनाव के समय एक प्रसिद्द नारा था कि  "कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ" परन्तु अब यह नारा बेमानी सा लगने लगा है क्योंकि  लाख टके का यही सवाल है कि आम आदमी जाये तो कहा जाय ?

वर्तमान  भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जो कि एक विश्व विख्यात अर्थशास्त्री भी है  जब 1991 में  पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री थे तब इन्होने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया और  उस समय की इनकी  आर्थिक सुधार की पहल से पिछले दो दशको में भारत की अर्थव्यवस्था की गिनती चुनिन्दा शक्तिशाली देशो में होने लगी ! इसका अंदाजा हम वर्ष 2010 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से भी लगा सकते है जिसमे उनके भारत आने का एक उद्देश्य अमेरिका व्यापार के लिए भारतीय -बाजार को खोलना भी शामिल था ! गत तीन वर्ष की उपलब्धियों का चाहे जितना नगाड़ा बजाया जाय परन्तु  सरकार की अब साख बची भी है या नहीं इसका अंदाज़ा लगाना बड़ा मुश्किल है क्योंकि  देश इनसे आर्थिक सुधार के मुद्दों पर हर भारतीय कुछ करिश्माई जरूरी कदम लेने की आस से देखता था ! 

अब हर तबके के लोग सरकार की किरकिरी कर रहे है ! गौरतलब है कि अभी हाल ही में एनएसएसओ के ताजा आंकड़ो के आधार पर यह कहा गया कि लगभग 60% जनता गरीबी में रहती है !  इतना ही नहीं अभी हाल में ही अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैडर्ड एंड पूअर्स ने राजकोषीय घाटे की बिगडती स्थिति तथा नीति-निर्णय के स्तर पर चलते राजनीतिक दिशाहीनता को देखते हुए भारत की रेटिंग को नकारात्मक कर दिया है ! इतना ही नहीं एक अन्य रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की ख़राब होती अर्थव्यवस्था के लिए श्री मनमोहन सिंह को ही जिम्मेदार ठहराया था ! इन एजेंसिया की विश्वव्यापी इतनी बड़ी साख है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी रिपोर्टो के आधार पर ही विदेशी अन्य देशो में निवेश करते है !  सरकार अभी भी अपनी बची हुई साख को भी दांव पर लगाने से नहीं बाज आ रही है !  जब किसी भी सरकार की साख लगातार कम हो रही हो  , महंगाई रोकने में नाकाम हुई हो और तेल - मूल्यों में ऐसी बेतहासा बढ़ोत्तरी हो रही हो जिसकी मार आम आदमी पर पड़ रही हो वर्तमान सरकार के कामकाज के तौर तरीको पर प्रश्न चिन्ह तो खड़ा होगा ही !


राजीव गुप्ता स्वतंत्र पत्रकार