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शनिवार, 24 मार्च 2012

केन्द्रीय बजट और ग्रामीण भारत


  
 
पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन से सबक लेते हुए एवं  रेल बजट से उत्पन्न हुए गर्म सियासी माहौल के बीच वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने यूपीए सरकार की दूसरी पारी का तीसरा बजट पेश करते हुए अपने को आम आदमी अर्थात ग्रामीण भारत से जुड़ाव दिखाने का प्रयास किया ! हालाँकि ग्रामीण भारत के लिए जितनी घोषणाएं वित्त मंत्री ने की है वह अभी अपर्याप्त है परन्तु फिर भी कुछ हद तक स्वागत योग्य है लेकिन यह भी कड़वा सच है आने वाले समय में महंगाई की मार से आम आदमी फिर से और त्रस्त होगा क्योंकि वित्त मंत्री द्वारा सेवा कर में दो प्रतिशत (पहले दस प्रतिशत थी अब बारह प्रतिशत हो जायेगी ) की वृद्धि के प्रयोजन के साथ  - सा आम जनता को दी जा रही  सब्सिडी में कटौती का बंदोबस्त कर दिया गया है जिसके कारण लोक - लुभावनी घोषणाओं के साथ - साथ महंगाई का दंश झेल रहा आम आदमी की जेब अब और भी ढीली होगी ! या यूं कहा जाय कि मामला अब एक हाथ दे और एक हाथ ले का हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी !
 
बहरहाल इस बजट से कुछ हद तक किसानो को जरूर फायदा होगा और अब किसानों को किसानी घाटे का सौदा नहीं रह जायेगा ! ज्ञातव्य है कि एन एस एस ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 41 फीसदी किसान अपनी किसानी छोड़ना चाहते है ! 2.5 की ग्रोथ दर से कृषि क्षेत्र जहां अपनी सांसे गिन रहा था तो ऐसे में कृषि एवं सहकारिता विकास के लिए वित्त मंत्री द्वारा चालू वित्त वर्ष आयोजना परिव्यय को 18 फीसदी बढाकर 17123 करोड़ रूपये (2011 -2012 ) से 20 ,208 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) करने के साथ-साथ कृषि कर्ज में  भी 1 ,00 ,000  करोड़ रुपये का इजाफा करते हुए 4,75,000 करोड़ रुपये (2011 -2012 ) से 5,75,000 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) की व्यवस्था कर दी गयी है जिससे कुछ हद तक सूदखोरों से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है ! साथ ही किसानों को प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर पर अल्पावधि फसल ऋण के लिए ब्याज आर्थिक सहायता को जारी रखा गया है एवं कर्ज समय से चुकाने वाले किसानो को प्रतिशत की अतिरिक्त राहत की व्यवस्था की जायेगी ! 

यूरिया उत्पादन - क्षेत्र में अगले पांच वर्ष में आत्म निर्भरता का लक्ष्य स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक लगभग 25 प्रतिशत यूरिया आयत किया जाता है साथ ही उर्वरक सब्सिडी किसानो और रिटेलरों को सीधे देने की घोषणा भी स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक ऐसा माना जाता था कि उर्वरक सब्सिडी के 40 प्रतिशत से ही किसान लाभान्वित होते थे बाकी 60 प्रतिशत उर्वरक उद्योग  उर्वरक सब्सिडी का लाभ उठाते थे ! सरकार ने नंदन नीलकणि जो कि आईटी नीति से संबंधित है की अध्यक्षता वाले कार्यबल की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा है कि सब्सिडी का सीधा अंतरण किया जायेगा और इनके आधार पर एक  मोबाइल आधारित उर्वरक प्रबंध प्रणाली तैयार की गई है जिसे 2012 में पूरे देश में लागू किया जाएगा !  उर्वरकों के दुरूपयोग में कमी और सब्सिडियों पर व्यय कम करने के उपायों से 12 करोड़ किसान परिवारों को लाभ होगा ! वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 में कृषि क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए कई लुभावनी घोषणाएं की है जो कि स्वागत योग्य है !
 
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक - नाबार्ड
समन्वित ग्रामीण विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र में संमृद्धि सुनिश्चित करने हेतु कृषि लघु उद्योगों , कुटीर एवं ग्रामोद्योगों हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्प कलाओं के विकास में आने वाली ऋण समस्याओ के निपटान हेतु बनाई  गयी इस योजना को वित्त मंत्री ने 10 ,000 हजार करोड़ रुपये प्रावधान किया है !
 
किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी
किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी  का उद्देश्य मौसमी कृषि परिचालनो के लिए  पर्याप्त , कम लागत पर और समय पर बिना किसी झंझट के अल्पावधि ऋण प्राप्त करने में कृषको को होने वाली कठिनाइयों को दूर करना है ! मौखिक पट्टेदार काश्तकारों और बटाईदारों आसी सहित सभी कृषक वर्गों को इस योजना में शामिल किया गया है ! कृषि यंत्र खाद व अन्य खेती से जुड़े समानो की खरीदारी के लिए उपयोग में आने वाला किसान क्रेडिट कार्ड से अब एटीएम की तर्ज पर नकदी भी प्राप्त किया जा सकेगा ! इससे किसानो को फसल के समय कृषि यंत्रबीजउर्वरक इत्यादि के लिए ऊंचे दरों पर ब्याज लेने की आवश्यकता नहीं होगी ! साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड की खरीद सीमा बढ़ाने पर भी सरकार विचार कर रही है ! गौरतलब है कि वर्तमान समय में किसानो को 25 ,000 रूपये तक की सीमा का किसान क्रेडिट कार्ड दिया जा रहा है !
 
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले हर एकल परिवार जिसमे माता पिता और उन पर आश्रित बच्चे शामिल है का साल में सौ दिन का अकुशल शारीरिक काम मांगने और प्राप्त करने का हक बनता है ! इसके अंतर्गत उपेक्षित समूहों को रोजगार प्रदान किया गया ! फरवरी 2011 तक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भागीदारी क्रमशः 28  24  प्रतिशत रही वही महिलाओ की भागीदारी वित्त वर्ष 2010 -2011 में 47 प्रतिशत तक हो गयी ! ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा से पलायन रोकने में काफी मदद मिली है ! इस महत्वपूर्ण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के लिए आगामी वित्त वर्ष 2012 - 2013 में सरकार ने 33 ,000 हजार करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया है ! हालाँकि पिछले वित्त वर्ष में मनरेगा को 40 ,000 करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया था !
 
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन - एनआरएलएम
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिदेश में सभी निर्धन परिवारों तक पहुँच सुनिश्चित करनाउन्हें स्थाई जीविका के अवसर उपलब्ध करवाना और गरीबी से ऊपर आने तक उनका पोषण करना निहित है ! एनआरएलएम के माध्यम से बेरोजगार ग्रामीण निर्धन युवाओं के कौशल विकास तथा विशेष रूप से विकसित क्षेत्रों में नौकरियों में रोजगार उपलब्ध कराने अथवा लाभकारी स्वरोजगार एवं लघु उद्योगों में रोजगार उपलब्ध कराने का उद्देश्य है ! सरकार ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 एनआरएलएम को 34 प्रतिशत के बढ़ोत्तरी करते हुए 3915 करोड़ रूपये का प्रायोजन किया है !
 
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना - एनआरएचएम
इस बार ग्रामीणों के  स्वास्थ्य  की चिंता करते हुए वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012-2013  के लिए  विगत वर्ष में किये गये 18,115 करोड़ रुपए आबंटन को बढ़ाकर 20,822 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया है  !
 
बुनकर क्षेत्र को विशेष राहत 
स्‍वचालित शटल-रहित करघों को 5 प्रतिशत के बुनियादी सीमा-शुल्‍क से पूर्ण छूट देने का प्रस्‍ताव किया गया है और स्‍वचालित रेशम चरखी और प्रसंस्‍करण मशीनरी और इनके पुर्जों को भी बुनियादी शुल्‍क से पूरी छूट दे दी गयी है ! एक तरफ जहां 5 प्रतिशत की बुनियादी सीमा-शुल्‍क की इस छूट और मौजूदा रियायती दर को केवल नई टेक्‍सटाईल मशीनरी तक सीमित रखा गया तो दूसरी तरफ सेकेंड हैंड मशीनरी के लिए 7.5 प्रतिशत के बुनियादी शुल्‍क का प्रस्‍ताव किया गया जिससे बुनकर समाज को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी !
 
इसके साथ - साथ ग्रामीण पेयजल और स्‍वच्‍छता के लिए बजटीय आबंटन को 27 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ातें हुए वर्ष 2012-13 में 14,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍तावप्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए आबंटन को 20 प्रतिशत बढ़ाते हुए 24,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया है ! साथ ही पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर अपना ध्‍यान केन्‍द्रि‍त करते हुए उन्‍होंने पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि की धन राशि में लगभग 22 प्रतिशत वृद्धि करते हुए वर्ष 2012-13 में आबंटन राशि 12,040 करोड़ रुपए करने की वित्त मंत्री द्वारा घोषणा की गयी ! ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि के अ‍धीन आबंटन को बढ़ाकर 20,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया एवं सर्वशिक्षा अभियान के लिए 25,555 करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने की घोषणा भी की गयीजो विगत वर्ष की तुलना में 21.7 प्रतिशत अधिक है ! इसी प्रकार राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के परिव्‍यय को 7860 करोड़ रुपए से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2012-13 में 9217 करोड़ रुपए करने का भी प्रस्‍ताव किया गया है !
 
भारत के राज्‍यों में हरित क्रांति लाने के उपायों के परिणामस्‍वरूप धान के उत्‍पादन और उत्‍पादकता में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है ! हरित क्रांति में भाग लेने वाले राज्यों ने 70 लाख टन चावल पैदा कर एक नयी मिशाल कायम की परिणामतः धान के उत्‍पादन को और बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपए के आबंटन को बढ़ाकर वर्ष 2012-13 में 1000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया ! साथ ही राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत विदर्भ सघन सिंचाई विकास कार्यक्रम के लिए 300 करोड़ रुपए आबंटित करने का भी प्रस्‍ताव किया गया ! राष्‍ट्रीय प्रोटीन पूरक आहार मिशन को सुदृढ़ बनाने और डेयरी क्षेत्र में उत्‍पादकता बढ़ाने के उद्देश्‍य से विश्‍व बैंक की सहायता से 2242 करोड़ रुपए की परियोजना की घोषणा एवं मछली पालन आदि के लिए वर्ष 2012-13 में परिव्‍यय को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपए किया जाना स्वागत योग्य कदम है ! देश में सिंचाई सुविधा के विस्‍तार के लिए आबंटन को 13 प्रतिशत बढ़ाकर वर्ष 2012-13 के दौरान 14,242 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव एक सराहनीय कदम के साथ - साथ अपर्याप्त है !
 
देश में खुले आसमान के नीचे लाखो - करोड़ों टन सड़ते अनाजों को बचाने के लिए   खाद्यान्‍नों की अतिरिक्‍त भंडारण क्षमता सृजित करने के उद्देश्‍य से भी कई उपायों की घोषणा तो की परन्तु उन  भंडारण में बिजली पहुँचाने की व्यवस्था कैसे होगी यह नहीं बताया गया ! बहरहाल वित्त मंत्री द्वारा ग्रामीण भारत को सशक्त और सुदृढ़ करने के लिए उठाया गया कदम अपर्याप्त परन्तु कुछ हद तक सराहनीय है बशर्ते इन घोषणाओं के पालन एवं उसमे पारदर्शिता हो ! भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी वर्तमान यूंपीए - 2  सरकार से ईमानदारी की अपेक्षा करना थोडा मुश्किल जरूर है परन्तु समुचित राशि अगर उन्ही के हाथो में पहुचे जिनके लिए आबंटित की गयी है तो निश्चित ही ग्रामीण भारत का जीवन आगामी वित्त वर्ष में थोडा सुधरेगा !

                - राजीव गुप्ता लेखक

शनिवार, 3 मार्च 2012

तेल - आधारित अर्थव्यवस्था का विकल्प सोचना ही होगा



 
अब यह कहना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णतः  कच्चे तेल पर आधारित हो चुकी है बिलकुल भी अतिश्योक्ति नहीं होगा ! मशीनीकरण के इस आधुनिक युग में लगभग सभी उत्पादन - क्षेत्र ऊर्जा - आधारित है ! भारत में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत "पेट्रोलियम पदार्थ" है ! "पंचलाईट" से लेकर सुपरसोनिक हवाई जहाज़ और अंतरिक्षयान तक लगभग सभी उपकरणों में ईंधन के रूप में पेट्रोलियम पदार्थ का ही उपयोग होता है जिसका सरोकार समाज के हर तबके से है ! इसलिए हम कह सकते है कि वर्तमान समय में तेल रूपी "विश्व - मोहिनी" से प्रभावित होकर महंगाई "सुरसा"  की भांति अपना मुंह दिन-प्रतिदिन फैलाकर बढ़ाये जा रही है ! जिसकी मार से आम आदमी त्रस्त हैऔर सरकार विश्व - पटल पर तेल के दामों में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड लेती है ! परन्तु जबसे यूंपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है आये हर दूसरे  - तीसरे महीने निजी कम्पनियाँ मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा किये जा रही है ! ज्ञातव्य है कि पिछले साल पेट्रोल के दामों मे लगभग आठ रूपये से भी अधिक तक का इजाफा किया गया ! इसका कारण निजी कम्पनियाँ  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की लगातार बढ़ती हुई  कीमत बताती हैं ! गौरतलब है कि वर्तमान में कच्चे तेल की कीमत १२१ यूएस डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक है ! अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे के भी मुख्यतः कई  कारण हैं जैसे चीन और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में तेल की मांग में लगातार हो रही बढ़ोत्तरीतेल - उत्पादक देशो जैसे अरब देशलीबिया आदि में हो रही राजनैतिक अस्थिरता और वहां उपजे जन असंतोष तेल-भण्डार में हो रही निरंतर कमीसटोरियों का दबदबा इत्यादि !
 
अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है कि मांग और आपूर्ति का समीकरण ही किसी भी वस्तु के  मूल्य को प्रभावित करता है ! दुनिया के लगभग सभी देश अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से रखने के लिए कच्चे तेल पर निर्भर है ! कच्चे तेल की मांग में लगातार जिस अनुपात में इजाफा हो रहा है उस अनुपात में आपूर्ति में इजाफा न होना तेल-मूल्यों की लपटों को गगनचुम्बी बना रहा है ! परन्तु तेल-आपूर्ति बढाकर इस समस्या से तात्कालिक निजात पाया जा सकता है जैसा कि भारत ने जून २०११ में करके दिखाया था ! ज्ञातव्य है कि २५ जून २०११ से अगले तीन दिनों तक भारत ने तेल-आपूर्ति को बढ़ा दिया था जिससे कि तेल के दामों में कुछ गिरावट आई थी हालाँकि बाद में कीमत फिर से उछल गयी थी ! परन्तु तेल-इतिहास यह कहता है कि मात्र तेल-आपूर्ति से इस गगनचुम्बी आग पर दीर्घकालीन के लिए निजात पाना संभव नहीं है ! इसलिए हमें तेल की मांग पर भी अंकुश लगाना ही होगा !  २००८ के बाद एक ऐसा समय भी आया था जब तेल-मूल्य घटकर ३० डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था ! यह चमत्कार कोई रातोरात नहीं हो गया था ! तेल-मूल्य को नीचे लाने में मुख्यतः यूरोप और अमेरिका की आर्थिक मंदी जिम्मेदार थी ! आर्थिक मंदी होने के कारण उन देशों में करों की बिक्री कम हो गयी,दूसरे देशों से आने वाली वस्तुओं की खरीदारी भी कम हो गयी और  जहाजो ने भी उड़ान भरना कम कर दिया था ! परन्तु अब पुनः एक बार फिर से तेल की मांग जोरो पर है ! जनवरी २०१२ को लन्दन में आयोजित  "मेना, MENA अर्थात मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका" आधारित दो दिवसीय सेमीनार में ओपेक - सेक्रेटरी जनरल ने बताया कि कच्चे तेल की वैश्विक मांग २०११ में ८८ मिलियन बैरल / प्रतिदिन थी जिसके २०१५ तक ९३ मिलियन बैरल / प्रतिदिन २०३५ तक ११० मिलियन बैरल / प्रतिदिन तक बढ़ने की सम्भावना है !  अगर मांग की इसी अनुपात में तेल - उत्पादन और उसकी आपूर्ति नहीं की गयी तो आने वाले समय में एक बार फिर समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी ! 
 
 ईरान जैसा देश जहां पेट्रोलियम - पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है उसने भी ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाकर समूचे विश्व को अचम्भित कर दिया ! ज्ञातव्य है कि अभी हाल ही में कुछ दिनों पूर्व ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका के लाख विरोध के बाद आगे बढ़ाते हुए नाभिकीय - ऊर्जा से विद्युत् उत्पादन के लिए ईरान के राष्ट्रपति ने परमाणु-सयंत्र का उद्घाटन किया और विश्व को दिखाने के लिए उसका टेलीकास्ट भी कराया ! इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों इटलीफ्रांसस्‍पेनग्रीसनीदरलैंड,पुर्तगाल को तेल बेचने से भी मना कर दिया ! गौरतलब है कि इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है ! तेल न मिलने से इन देशो के अर्थव्यवस्था और ख़राब होगी ! अमेरिका की भी अर्थव्यवस्था पहले से ख़राब है ! अमेरिकी जनता महंगाईबेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है ! समूचा विश्व मुख्यतः विकसित देश तेल पर अपना आधिपत्य ज़माने के लिए किस हद तक संघर्षरत है इसका अंदाजा उनकी विदेश नीति को देखकर लगाया जा सकता है ! वैसे तो तेल पर आधिपत्य को लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही कई देशों के बीच होड़ लग गयी थी !
 
अमरीका  अपनी नजर काकेशिया और कैस्पियन इलाके के तेल भण्डार रूस ईरानईराक तथा सोवियत संघ के विखंडित हिस्सों में जो बड़े पैमाने पर मौजूद थे पर गडाए हुए था ! इसकी पुष्टि अभी हाल ही में हुए एक घटनाचक्र से लगाया जा सकता है ! गौरतलब है कि अमरीका ने अपनी  सैन्य कार्यवाही में लादेन और तालिबान के कट्टर हिस्से को ख़त्म कर और वहां अपनी मनमाफिक सरकार स्थापित किया जिससे अमेरिका न केवल अपने तात्कालिक लक्ष्य को पूरा किया अपितु उसके दूरगामी लक्ष्य यानी अफगानिस्तान के माध्यम से यूरेशियाई - ह्रदय क्षेत्र अर्थात तेल निर्यातक क्षमता वाले छोटे-छोटे  देशों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी बना ली ! इसलिए अमेरिका अब उज्बेकिस्तानतुर्कीपाकिस्तानअफगानिस्तान इजराइल तथा पश्चिमी देशों के साथ मिलकर  एशिया के चारो शक्तिशाली देश जिसमे रूसचीनभारत और ईरान शामिल है के विरुद्ध समीकरण बनाने में जुट गया है ! शंघाई-५ ( रूसचीनताजिकिस्तानकज़ाकिस्तानऔर किरगिस्तान ) की स्थापना तथा इस समूह की ईरान के साथ मित्रता और ईराक के प्रति सहानुभूति एवं भारत-रूस की बढ़ती मित्रता ने अमेरिका के समीकरण-संतुलन को असंतुलित कर दिया ! अपने समीकरण को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने उज्बेकिस्तान से रक्षा - संधि कर ली ! इस प्रकार दुनिए के अब सभी देश अपनी विदेश नीति को तेल-केन्द्रित कर रहे है ! भविष्य में भारत की विदेश नीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह कहना मुश्किल है परन्तु संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को तेल - आधारित से मुक्त करना होगा तथा उसका विकल्प खोजना ही होगा !  
                  राजीव गुप्तालेखक