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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

आरक्षण पर राजनीति



राज्यसभा द्वारा सोमवार को भारी बहुमत से 117वाँ संविधान विधयेक के पास होते ही पदोन्नति मे आरक्षण विधेयक के पास होने का रास्ता अब साफ हो गया है. अब यह विधेयक लोकसभा मे पेश किया जायेगा. हलांकि इस विषय के चलते भयंकर सर्दी के बीच इन दिनो राजनैतिक गलियारो का तपमान उबल रहा था. परंतु इस विधेयक के चलते यह भी साफ हो गया कि गठबन्धन की इस राजनीति मे कमजोर केन्द्र पर क्षेत्रिय राजनैतिक दल हावी है. अभी एफडीआई का मामला शांत भी नही हुआ था कि अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये पदोन्नति मे आरक्षण के विषय ने जोर पकड लिया. एफडीआई को लागू करवाने मे सपा और बसपा जैसे दोनो दल सरकार के पक्ष मे खडे होकर बहुत ही अहम भूमिका निभायी थी, परंतु अब यही दोनो दल एक-दूसरे के विरोध मे खडे हो गये है. इन दोनो क्षेत्रीय दलो के ऐसे कृत्यो से यह एक सोचनीय विषय बन गया है कि इनके लिये देश का विकास अब कोई महत्वपूर्ण विषय नही है इन्हे बस अपने – अपने वोट बैंक की चिंता है कि कैसे यह सरकार से दलाली करने की स्थिति मे रहे जिससे उन्हे तत्कालीन सरकार से अनवरत लाभ मिलता रहे.  
   
2014 मे आम चुनाव को ध्यान मे रखकर सभी दलो के मध्य वोटरो को लेकर खींचतान शुरू हो गयी है. उत्तर प्रदेश के इन दोनो क्षेत्रीय दलो के पास अपना – अपना एक तय वोट बैंक है. एक तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी पर अपना विरोध प्रकट करते हुए यूपीए सरकार से अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये आरक्षण पर पांचवी बार संविधान संशोधन हेतु विधेयक लाने हेतु सफल दबाव बनाते हुए एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने दलित वोट बैंक को सुदृढीकरण करने का दाँव चला तो दूसरी तरफ सपा ने उसका जोरदार तरीके से विरोध जता करते हुए कांग्रेस और भाजपा के अगडो-पिछडो के वोट बैंक मे सेन्ध लगाने का प्रयास कर रही है.

इस विधेयक के विरोध मे उत्तर प्रदेश के लगभग 18 लाख कर्मचारी हडताल पर चले गये तो समर्थन वाले कर्मचारियो ने अपनी – अपनी कार्यावधि बढाकर और अधिक कार्य करने का निश्चय किया. भाजपा के इस संविधान संशोधन के समर्थन की घोषणा करने के साथ ही उत्तर प्रदेश स्थित उसके मुख्यालय पर भी प्रदर्शन होने लगे. सपा सुप्रीमो ने यह कहकर 18 लाख कर्मचारियो की हडताल को सपा-सरकार ने खत्म कराने से मना कर दिया कि यह आग उत्तर प्रदेश से बाहर जायेगी और अब देश के करोडो लोग हडताल करेंगे. दरअसल मुलायम की नजर अब एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने को राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने की है क्योंकि वो ऐसे ही किसी मुद्दे की तलाश मे है जिससे उन्हे 2014 के आम चुनाव के बाद किसी तीसरे मोर्चे की अगुआई करने का मौका मिले और वे अधिक से अधिक सीटो पर जीत हासिल कर प्रधानमंत्री बनने का दावा ठोंक सके.

मुलायम को अब पता चल चुका है कि दलित वोट बैंक की नौका पर सवार होकर प्रधानमंत्री के पद की उम्मीदवारी नही ठोंकी जा सकती अत: अब उन्होने अपनी वोट बैंक की रणनीति के अंकगणित मे एक कदम आगे बढते हुए अपने माई (मुसलमान-यादव) के साथ-साथ अपने साथ अगडॉ-पिछडो को भी साथ लाने की कोशिशे तेज कर दी है. उनकी सरकार द्वारा नाम बदलने के साथ-साथ कांशीराम जयंती और अम्बेडकर निर्वाण दिवस की छुट्टी निरस्त कर दी जिससे दलित-गैर दलित की खाई को और बढा दिया जा सके परिणामत: वो अपना सियासी लाभ ले सकने मे सफल हो जाये. दरअसल यह वैसे ही है जैसे कि चुनाव के समय बिहार मे नीतिश कुमार ने दलित और महादलित के बीच एक भेद खडा किया था ठीक उसी प्रकार मुलायम भी अब समाज मे दलित-गैर दलित के विभाजन खडा कर अपना राजनैतिक अंकगणित ठीक करना चाहते है.

कांग्रेस ने भी राज्यसभा मे यह विधेयक लाकर अपना राजनैतिक हित तो साधने के कोई कसर नही छोडा क्योंकि उसे पता है कि इस विधेयक के माध्यम से वह उत्तर प्रदेश मे मायावती के दलित वोट बैंक मे सेन्ध लगाने के साथ-साथ पूरे देश के दलित वर्गो को रिझाने मे वह कामयाब हो जायेंगी और उसे उनका वोट मिल सकता है. वही देश के सवर्ण-वर्ग को यह भी दिखाना चाहती है कि वह ऐसा कदम मायावती के दबाव मे आकर उठा रही है, साथ ही एफडीआई के मुद्दे पर बसपा से प्राप्त समर्थन की कीमत चुका कर वह बसपा का मुहँ भी बन्द करना चाहती है. भाजपा के लिये थोडी असमंजस की स्थिति जरूर है परंतु वह भी सावधानी बरतते हुए इस विधेयक मे संशोधन लाकर एक मध्य-मार्ग के विकल्प से अपना वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश मे है. दरअसल सपा-बसपा के बीच की इस लडाई की मुख्य वजह यह है कि जहाँ एक तरफ मायावती अपने को दलितो का मसीहा मानती है दूसरी तरफ मुलायम अपने को पिछ्डो का हितैषी मानते है. मायवती के इस कदम से मुख्य धारा मे शामिल होने का कुछ लोगो को जरूर लाभ मिलेगा परंतु उनके इस कदम से कई गुना लोगो के आगे बढने का अवसर कम होगा जिससे समाजिक समरसता तार-तार होने की पूरी संभावना है परिणामत: समाज मे पारस्परिक विद्वेष की भावना ही बढेगी.

समाज के जातिगत विभेद को खत्म करने के लिये ही अंबेडकर साहब ने संविधान मे जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की थी परंतु कालांतर मे उनकी जातिगत आरक्षण की यह व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ गयी. 1990 मे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के निर्णय ने राजनैतिक दलो के राजनैतिक मार्ग को और प्रशस्त किया परिणामत: समूचा उत्तर प्रदेश इन्ही जातीय चुनावी समीकरणो के बीच फंसकर विकास के मार्ग से विमुख हो गया. इन समाजिक - विभेदी नेताओ को अब ध्यान रखना चाहिये कि जातिगत आरक्षण को लेकर आने वाले कुछ दिनो आरक्षण का आधार बदलने की मांग उठने वाली है और जिसका समर्थन देश का हर नागरिक करेगा, क्योंकि जनता अब जातिगत आरक्षण-व्यवस्था से त्रस्त हो चुकी है और वह आर्थिक रूप से कमजोर समाज के व्यक्ति को आरक्षण देने की बात की ही वकालत करेगी.

बहरहाल आरक्षण की इस राजनीति की बिसात पर ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो समय के गर्भ में है, परंतु अब समय आ गया है कि आरक्षण के नाम पर ये राजनैतिक दल अपनी – अपनी राजनैतिक रोटियां सेकना बंद करे और समाज - उत्थान को ध्यान में रखकर फैसले करे ताकि समाज के किसी भी वर्ग को ये ना लगे कि उनसे उन हक छीना गया है और किसी को ये भी ना लगे कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी उन्हें मुख्य धारा में जगह नहीं मिली है. तब वास्तव में आरक्षण का लाभ सही व्यक्ति को मिल पायेगा और जिस उद्देश्य को ध्यान मे रखकर संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी वह सार्थक हो पायेगा.      
-          राजीव गुप्ता

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

जुगाड - राजनीति के भंवर मे एफडीआई




अपनी जुगाड-राजनीति के लिये प्रसिद्ध यू.पी.ए. - 2 सरकार वर्तमान समय मे अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के ऐलान के साथ कि एफडीआई मुद्दे पर संसद मे नियम 184 के तहत चर्चा होगी. परिणामत: एफडीआई पर आखिरकार सरकार का रुख नरम पड़ा और संसद मे गतिरोध टूटा. यू.पी.ए.-2 के अहम सहयोगी सपा, बसपा और डीमके जैसे दलो ने वर्तमान सराकार को बचाने हेतु भले ही सशर्त समर्थन देने की बात की हो परंतु आज़ादी के बाद से सत्ताधारी दलो के पास इससे ज्यादा राजनैतिक दिवालियापन अब तक देखने को नही मिला. यह कैसी जुगाड की राजनीति है कि जो दल सडको पर जनता के हित की बात करते हुए सत्ताधारी दलो की नीतियो का खुलकर विरोध करने हेतु धरना-प्रदर्शन कर अपनी गिरफ्तारी देते है वही दल संसद के अन्दर सत्ता की मलाई खाने हेतु उन्ही सत्ताधारी दलो की सरकार को गिरने से बचाने हेतु उनका संकटमोचन बनकर खडे हो जाते है.

डीएमके ने तो यहाँ तक कह दिया कि  अगर वे एफडीआई के विरोध में वोट करते हैं तो यह यूपीए सरकार के लिए खतरा होगा और बीजेपी के सत्ता में आने से बाबरी मस्जिद जैसी घटनाएं हो सकती हैं. वही सपा और बसपा का तर्क है कि साम्प्रदायिक शक्तियो को सत्ता से दूर रखने हेतु ही वे सरकार के साथ खडी होंगी. जबकि सच्चाई यह है कि अभी पिछले दिनो चार राज्यो आन्ध्र प्रदेश - चारमीनार , असम - कोकराझार, महाराष्ट्र मुम्बई, उत्तर प्रदेश फैज़ाबाद, बरेली, कोसीकलाँ मे साम्प्रदायिक दंगे भडके परंतु इन सभी राज्यो मे भाजपा की सरकार न होकर कांग्रेस, एन.सी.पी व सपा जैसे दलो की ही सरकार है. इसके उलटे गुजरात, मध्यप्रदेश, छतीसगढ, झारखंड, गोवा, कर्नाटक, बिहार आदि जिन राज्यो मे भाजपा व उसके समर्थक दलो की सरकार है वहाँ पर इस समय किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक दंगे नही हुए. इन दलो के बयानो को देखते हुए क्या यह मान लिया जाय कि राजनीति मे देश के विकास का मुद्दा अब कोई स्थान नही रखता तथा चर्चा विकास केन्द्रित होने की बजाय सिर्फ साम्प्रदायिकता की आड मे सत्ता लोलुपता के चलते जुगाड-केद्रित ही राजनीति पर होगी.       

22 नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र की हंगामेदार शुरुआत के बीच तृणमूल कांग्रेस द्वारा पेश किया गया अविश्वास प्रस्ताव जरूरी समर्थन न मिल पाने की वजह से लोकसभा में भले ही गिर गया. परंतु  पूंजी निवेश के नाम पर एफडीआई का फैसला अब उसके गले की फांस बन चुका है. एफडीआई पर सरकार के फैसले के विरोध मे जहाँ 4-5 दिसम्बर को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के चलते व्यापारी सडको पर उतरेंगे तो वही इस गम्भीर विषय पर राजनैतिक पंडित संसद मे बहस कर वोटिंग करगे. संप्रग सरकार खुदरा व्यापार में सीधे विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध करने वाले दलों को जोड़-तोड़कर जुगाड से उन्हे अपने साथ कर संसद में बहुमत जुटाने में अगर सफल हो भी जाती है तो माकपा महासचिव प्रकाश करात के अनुसार वाम दल उसे लागू करने के लिए फेमा में संशोधन के समय भी मत विभाजन पर जोर देगा. उनके अनुसार केंद्र की संप्रग सरकार अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देने के बाद अब वह संसद में बहुमत जुटाने के लिए इसका विरोध करने वाले दलों को जोड़ने-तोड़ने में लगी है. सपा नेता राम गोपाल यादव के अनुसार अगर सरकार एफडीआई का मुद्दा राज्यसभा में लाती है तो वे उसके खिलाफ मतदान करेंगे परंतु लोकसभा मे सपा सरकार के साथ खडी रहेगी. कृषि मंत्री शरद पवार के अनुसार भारत मे बहुब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का स्वागत है और इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा. दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के अनुसार बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लागू करना गरीबों के खिलाफ अपराध है. एक तरफ प्रधानमंत्री द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बडी कंपनियों के उतरने से प्रत्येक वर्ष एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा पर हकीकत यह है कि इसके कारण करीब पांच करोड़ लोगों की आजीविका छिन जाएगी. इसका ताज़ा उदाहरण यह भी है कि  अमेरिका और मेक्सिको जैसे देशों में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति दिया जाना विफल  साबित हुई. इन राजनैतिक पंडितो के मंतव्यो से यही लगता है कि अब बिसात बिछ चुकी है और इनके बीच चल रहे शह और मात के खेल के बीच आम जनता पिसकर मात्र तमासबीन बनी हुई है.


इसका एक पहलू और भी है कि  अगर हम कुछ दिनो पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये "शहीदी वाले" वक्तव्य पर ध्यान दे  जिसमे उन्होने कहा था कि जाना होगा तो लडते-लडते जायेंगे”  तो पायेंगे कि महँगाई, भ्रष्टाचार जैसे गम्भीर आरोपो से घिरी सरकार अब अपनी छवि सुधारने मे लग गयी है. उसके पास सरकार चलाने के लिये जुगाड से पर्याप्त संख्या बल है और अगर कभी उस संख्या बल में कोई कमी आई तो उसके पास आर्थिक पैकेज और सीबीआई रूपी ऐसी कुंजी है जिसकी बदौलत वह किसी भी दल को समर्थन देने के लिए मजबूर कर सकती है. अगर इतने में भी बात न बनी और मध्यावधि चुनाव हो भी गए तो कांग्रेस जनता को यह दिखाने के लिए हमने अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तो की थी पर इन राजनैतिक दलों ने आर्थिक सुधार नहीं होने दिया का ऐसा भंवरजाल बुना जायगा कि आम-जनता उसमे खुद फंस जायेगी.

इस समय भारत की जनता के सम्मुख राजनैतिक दलों की विश्वसनीयता ही सवालो के घेरे में है और वह इन सब उठापटक के बीच मौन होकर स्थिति को भांप रही है. सरकार बेनकाब हो चुकी है और महँगाई की मार से आम जनता त्राहि - त्राहि कर रही है.  आम आदमी जो छोटे - मोटे व्यापार से अभी तक अपना परिवार पाल रहा था सरकार ने अपने एफडीआई के  फैसले से उसको बेरोजगार करने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार है. सरकार को यह ध्यान रखना चाहिये कि विदेश निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश मे व्यापार करने के लिये ही आयेंगी अत: वे अपने मुनाफे के बारे मे ही सोचेंगी.

भारत जैसा देश जहां की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो , आर्थिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु आर्थिक सुधार भारतीयों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा न कि विदेशियों के हितो को ध्यान में रखकर.  ऐसे मे सरकार किसके इशारे पर और किसको खुश करने के लिये और क्या छुपाने के लिए आर्थिक सुधार के नाम पर इतनी जल्दबाजी में इतने विरोधे के बावजूद  इतने बड़े - बड़े फैसले ले रही है असली मुद्दा यह है. राजनेता तो राजनीति करते ही है परन्तु परेशानी तो आम जनता को ही होती है ऐसे में भला आम जनता जाये तो कहाँ जाये.

-          राजीव गुप्ता





मंगलवार, 27 नवंबर 2012

नाम पर होती राजनीति






राममनोहर लोहिया अस्पताल, महात्मा गान्धी मार्ग, पटेल चौक, महावीर जयंती पार्क इत्यादि महापुरुषो, देशभक्तो, समाजसेवियो के नाम पर रखे गये दिल्ली के अस्पतालो, सडको, चौको और पार्को का नाम हम देख सकते है जिन्हे पढ्कर निश्चित ही हमे उन देशभक्तो का देश को योगदान याद आता है जिससे हम गौरवान्वित मह्सूस करते है. अगर हम एक नजर अतीत मे डाले तो पायेंगे कि भारत मे नाम को लेकर कई दिग्गज देशभक्तो ने भी संघर्ष किये है, परंतु उनकी नाम-परिवर्तन के पीछे की मंशा राजनीति न होकर देशभक्ति की भावना थी. 1922 मे दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना कर विधानसभा के अन्दर से अंग्रेज सरकार क विरोध करने हेतु कलकत्ता (वर्तमान नाम कोलकाता) महानगर पालिका का चुनाव जीता और वे स्वयम् महापौर बन गये तथा उन्होने सुभाष चन्द्र बोस को कलकत्ता महानगर पलिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया था. सुभाष चन्द्र बोस जब कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कर्यकारी अधिकारी बनाये गये तो उन्होने कलकत्ता महानगर पालिका का पूरा तंत्र एवम उसकी कार्यपद्धति तथा कोलकाता के रास्तो के नाम बदलकर उन्हे भारतीय नाम दे दिया था. कुछ इसी तरह का काम समाजवादी राजनारायण ने भी किया. उन्होने बनारस के प्रसिद्ध बनिया बाग़ में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की स्थापित प्रतिमा के टुकड़े – टुकडे कर गुलामी के प्रतीक को मिटटी में मिला दिया हलाँकि उनके इस कृत्य के लिये पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था परंतु  आज उसी पार्क को लोकबन्धु राजनारायण पार्कके नाम से जाना जाता है.

परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इतिहास ने उस हेमू के नाम को ही बिसार दिया जिसने पानीपत के तीसरे युद्ध से पूर्व 22 युद्ध लड़े, जिनमें 20 में अफगानों को व 2 में अकबर की सेना को पराजित किया. अकबर की सेना 7 अक्तूबर, 1556 को तुगलकाबाद, दिल्ली की लड़ाई में हेमचन्द्र से हारकर भाग गई. हेमचन्द्र का तब सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य के रूप में दिल्ली में राज्याभिषेक हुआ. गाजी की उपाधि पाने के लिए अकबर द्वारा हेमू का सिर काट कर उसे काबुल भेजा गया और धड़ तुगलकाबाद के किले में टांग दिया गया. हेमू व उनके पिता और परिवार पर किए गए इन अत्याचारों से भी अकबर का संरक्षक बैरम खां संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने हेमू के समस्त भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया.  

अपनी फतह के जश्न में उसने हजारों बंदी भार्गवों और सैनिकों के कटे सिरों से मीनारें बनवार्इं गयी जिसका उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चन्द्र ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत, सल्तनत से मुगलो तक मे भी किया है. ऐसी एक मीनार की मुगल पेंटिंग राष्ट्रीय संग्रहालयदिल्ली में आज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है और नवस्थापित पानीपत संग्रहालय में भी प्रदर्शित है. इतना ही नही अकबर की क्रूरता का राजस्थान आज भी गवाह है जिसके कारण महाराणा प्रताप  को घास तक की रोटियाँ खानी पडी थी. औरंग्जेब की क्रूरता तो आज भी इतिहास मे अक्षम्य है जिसका मुक़ाबला छत्रपति शिवाजी महाराज ने डट कर किया और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की.

परंतु वर्तमान समय मे देशभक्ति को राजनीति ने अपने पंजे मे जकड लिया है. सार्वजनिक जगहो जैसे अस्पताल, सडक, चौक, पार्क इत्यादि का नामकरण  मात्र एक राजनीति करने का हथियार बनकर रह गया है अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी. सत्ताधारी राजनेता कभी अपने नाम पर तो कभी अपने दल के किसी अन्य श्रेष्ठ के नाम पर अथवा समाज के किसी विशेष वर्ग को खुश करने के लिये ऐसे सार्वजनिक सभी स्थलो का नामकरण कर राजनीति करते आये है.

अभी हाल मे ही पिछले दिनो पहले जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता स्थित इंदिरा भवन का नाम बदलकर क्रांतिकारी कवि काजी नजरूल इस्लाम के नाम पर रखना चाहा तो यह खबर अखबारो और समाचार चैनलो की सुर्खिया बनी थी क्योंकि इमारत का नाम बदले जाने के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने कहा था कि वे काजी नजरूल इस्लाम के खिलाफ नहीं है लोकिन इंदिरा गांधी का इस तरह से अपमान नहीं सहा जा सकता. उल्लेखनीय है कि इस इमारत का निर्माण वर्ष 1972 में किया गया और कांग्रेस के एक सत्र के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस भवन में ठहरी थीं.

2004 मे तत्कालीन केन्द्रिय पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने अंड्मान की राजधानी पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल सेलुलर जहाँ वीर सावरकार को दो जन्मो का आजीवन कारावास की सजा के लिये रखा गया था वहा वीर सावरकर के नाम की पट्टिका लगी थी को बदलवाकर  महात्मा गान्धी जी के नाम की पट्टिका लगवा दी थी जबकि गान्धी जी का सेलुलर जेल से कोई दूर-दूर तक सम्बन्ध ही नही था.

सिर्फ बंगाल ही नही एक समय उत्तर प्रदेश मे भी नाम-परिवर्तन को लेकर राजनीति काफी गर्म हुई थी जब उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने पूर्ववर्ती माया सरकार का एक बड़ा फैसला बदल दिया था.  मायावती सरकार द्वारा यूपी के सात् जिलों के नाम बदल दिए गये थे लेकिन सपा सरकार ने इस निर्णय को बदलते हुए सभी सात जिलों को उनके पुराने नाम लौटाने का निर्णय लिया.

विज्ञान से लेकर मान्यताओ तक मे नामकरण की व्यवस्था बहुत प्राचीन और सटीक है. भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है. शरीर नष्ट होता हैकितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं. हिन्दू धर्म संस्कारो में नामकरण-संस्कार पंचम संस्कार है. जिसके तीन आधार माने गए हैं. पहलाजिस नक्षत्र में शिशु का जन्म होता हैउस नक्षत्र की पहचान रहे. इसलिए नाम नक्षत्र के लिए नियत  अक्षर से शुरू होना चाहिएताकि नाम से जन्म नक्षत्र का पता चले और ज्योतिषीय राशिफल भी समझा जा सकें. दूसरामूलरुप से नामों की वैज्ञानिकता बनें और तीसरा यह कि नाम से उसके जातिनामवंशगौत्र आदि की जानकारी हो जाए.  गुरु वशिष्ठ द्वारा  श्रीराम आदि चार भाइयों का नामकरण और महर्षि गर्ग द्धारा श्रीकृष्ण का नामकरण उनके गुण-धर्मों के आधार पर करने की बात सर्वविदित है.

विज्ञान की भाषा मे भी किसी वस्तुगुणप्रक्रिया, परिघटना आदि को समझने-समझाने के लिये उसका समुचित नाम देना आवश्यक होता है. नाम देने की पद्धति को ही नामकरण अर्थात नोमेंक्लेचर कहा जाता है जिसमे तकनीकी शब्दों की सूचीनामकरण से संबन्धित सिद्धान्तप्रक्रियाएं आदि शामिल होते है. जीव विज्ञान मे द्विपद नामकरण प्रजातियो के नामकरण की एक प्रणाली है जिसे कार्ल लीनियस नामक एक स्वीडिश जीव वैज्ञानिक द्वारा शुरू किया गया. जिसमे उन्होने पहला नाम  वंश अर्थात जीनस का और दूसरा प्रजाति विशेष का विशिष्ट नाम को चुना था.  उदाहरण के लिएमानव का वंश होमो है जबकि उसका विशिष्ट नाम सेपियंस हैतो इस प्रकार मानव का द्विपद या वैज्ञानिक नाम होमो साप्येन्स् है. इतना ही नही रसायन विज्ञान मे आईयूपीइसी नामकरण की व्यवस्था से  आज भी स्कूलो मे विभिन्न प्रकार के रसायनो के नाम उनके गुण-धर्मो के आधार पर रखने की पद्धति सिखायी जाती है.  

जब विज्ञान और मान्यताओ मे गुण-धर्म की महत्ता के आधार पर ही नामकरण-पद्धति का अस्तित्व है तो इतना सब कुछ जानते हुए भी न जाने क्यों अकबर को महान व औरंग्जेब, इब्राहिम लोदी जैसे अन्य मुस्लिम आक्रान्ताओं के नाम को महिमामंडित करने हेतु आज भी भारत की राजधानी की सडको का नाम इन आक्रांताओ के नाम पर है और तो और इन सडको का रख्र-रखाव करने वाली नईदिल्ली नगरपालिका को भी नही पता कि इन सडको का नाम इन आक्रांताओ के नाम पर क्यो रखा गया है व उसका आधार क्या हैध्यान देने योग्य है कि भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. भारत को गुलाम बनाने और लूटने के उद्देश्य से आये सभी विदेशी पूर्व मध्यकालीन-मध्यकालीन शासको को नाको चने चबवाने होते हुए भारत के कई महान सपूतो ने अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया इस बात का पता हमें इतिहास के पन्नो से चलता है. आये दिन हम उन सभी शहीदों को श्रद्धान्जलि देते है जो हँसते-हँसते भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने हेतु अपने प्राणों को देश-हित में न्योछावर कर दिया. जिन्हें याद करके हर भारतीय गौरवान्वित महसूस करता है. परन्तु देश की राजधानी दिल्ली की कुछ सडको के नाम उन्ही "पूर्व-मध्यकालीन एवं मध्यकालीन शासको" के नाम पर रखी गयी है जिन्होंने भारत को सैकड़ो वर्ष गुलाम बनाये रखा. हमे यह सदैव ध्यान रखना चाहिये कि जो देश अपना इतिहास भूल जाता है वह अपना अस्तित्व व पहचान खो बैठता है.
-          राजीव गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

गुजरात : जैसा मैने देखा



पिछ्ले दिनो मुझे गुजरात जाने का अवसर मिला. शहर की चकाचौन्ध से कोसो दूर ग्रामीणो के बीच कई दिनो तक उनके साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. अभी तक मैने गुजरात के बारे मे अच्छा – बुरा  मात्र मीडिया की माध्यम से ही सुना था परंतु गुजरात की आम-जनता से सम्मुख होने का यह अनुभव मुझे पहली बार प्राप्त हुआ. एक तरफ जहा मीडिया मोदी के जादू के बारे मे अपना आंकलन प्रस्तुत करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ वह 2002 मे गोधरा मे हुए दंगो से आगे सोच ही नही पा रहा. इसी बीच अमेरिका-ब्रिटेन द्वारा मोदी की तरीफ ने मुझे गुजरात देखने को और अधिक बेचैन कर दिया. एक तरफ जहां ये सेकुलर बुद्धिजीवी और मीडिया की आड़ में राजनेता अपनी राजनीति की रोटियां सेकने में व्यस्त है तो वही इससे कोसो दूर गुजरात अपने विकास के दम पर भारत के अन्य राज्यों को दर्पण दिखाते हुए उन्हें गुजरात का अनुकरण करने के लिए मजबूर कर रहा है . 

 मोदी के जादू के बारे मे वहा के ग्रामीण-समाज से मुझे जानने का अवसर मिला. सड्के अपनी सौन्दर्यता से मेरा ध्यान अपनी ओर बार-बार खींच रही थी. पुवाडवा, चनडवाना, मांगरोल, धोरडो, खावडा, कुरण, धौलावीरा, लखपत, क़ानेर, उमरसर जैसे अनेक गांवो मे खस्ता हालत मे सड्को को ढूंढ्ने की मैने बहुत कोशिश की पर असफल रहा. लगभग हर गांव को सडको से जुडे हुए देखकर मुझे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की उस दूरदर्शिता की याद आ गयी जिसे उन्होने जोर देकर भारत के हर गांव को सडक से जोड्ने के लिये प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक योजना की शुरुआत की थी.


गुजरात के प्रत्येक गांव मे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होती है ग्रामीणो की इस बात ने मुझे और हैरत मे डाल दिया, परंतु उनकी यह बात सौ प्रतिशत सच थी कि गुजरात के सभी गांवो मे बिजली कभी नही जाती. उत्सुकतावश मैने उनसे बिजली वितरण प्रणाली और बिजली चोरी की बात भी की तो उनके माध्यम से पता चला कि बिजली वितरण प्रणाली के चलते बिजली चोरी यहा सम्भव ही नही है क्योंकि हर घर मे बिजली का मीटर लगा है और पूरे गांव क एक अलग से बिजली का मीटर लगा है. हर गांव के सरपंच को यह निर्देश है कि गांव के बिजली के मीटर की रीडिंग और हर घर के मीटर की रीडिंग का कुल योग बराबर होना ही चाहिये अन्यथा जबाबदेही सरपंच के साथ-साथ पूरे गांव की ही होगी. परिणामत: बिजली चोरी का सवाल ही नही उठता.

समरस ग्राम पंचायत के बारे मे उनसे पहली बार जानने का मौका मिला. ग्राम पंचायत को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से नरेन्द्र मोदी द्वारा समरस ग्राम पंचायत की शुरुआत की गयी. समरस ग्राम पंचायत का अर्थ समझाते हुए मुझे उन लोगो ने मुझे बताया कि हमारे यहा अन्य राज्यो की भांति सरपंच का चुनाव कोई सरकारी मशीनरी द्वारा न होकर अपितु गांव के लोग ही मिलकर अपना सरपंच चुन लेते है और ऐसे सभी समरस ग्राम पंचायत को विकास हेतु सरकार अलग से वितीय सहायता देती है. परिणामत: सरपंच के चुनाव हेतु सरकारी खर्च बच जाता है और गांव के लोगो के मन-मुताबिक उनका मुखिया भी मिल जाता है.  कुरण गांव के लोगो ने सोढा प्राग्जि एवम सता जी का उदाहरण भी बताया कि उनके यहा मुस्लिम समुदाय की संख्या लगभग 50,000 है और हिन्दु समुदाय की संख्या लगभग 400 ही है परंतु सोढा प्राग्जि एवम सता जी जो कि हिन्दु समुदाय से ही थे उनके निर्णयो की कसमे आज भी लोग खाते है. छोटे-मोटे झगडो का निपटारा पंचायत द्वारा गांव मे ही कर दिया जाता है.   उन सबकी यह बात सुनकर मुझे मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पंच-परमेश्वर एवम गान्धी के पंचायत राज की याद आ गयी. वास्तव मे अपनी कई खूबियो के चलते गुजरात की पंचायत व्यवस्था देखने लायक है.

वैसे तो कुरण गांव मे रहने वाले लोग अनुसूचित जाति से सम्बन्धित है परंतु उस गांव के मन्दिर मे पुरोहित भी अनुसूचित जाति से ही है. इस गांव का आदर्श उन कुंठित राजनेतओ के मुह पर तमाचा है जो समाज विभेद की राजनीति करते हुए छुआछूत को बढावा देते हुए अपने वोट बैंक की राजनीति करते है. गुजरात के हर गांव मे एक पानी – संग्रहण की व्यवस्था है जिसका उपयोग सामूहिक रूप से सभी ग्रामीण अपने जानवरो को पानी पिलाने, कपडे धोने, एवम स्नान इत्यादि के लिये करते है. खेती की सिंचाई हेतु सरकार द्वारा कई छोटे-छोटे तालाब बनवाये गये है जिसमे बारिश का पानी संग्रहित किया जाता है. परिमात: किसानो को सिचाई हेतु भरपूर पानी मिलता है.  

इतना ही नही इस गांव मे ही 8वी तक का स्कूल है जिससे बच्चो को प्राथमिक पढाई हेतु गांव से बाहर जाने की नौबत ही नही आती. इस स्कूल मे लड्के – लड्कियो का अनुपात भी बराबर ही है. गांव के इस स्कूल की खासियत यह है कि यहा पर बच्चो को सीधे  बायोसेफ प्रोग्राम जो कि  जी सी ई आर टी, गान्धीनगर द्वारा संचालित होता है से उनका पूरा पाठ्यक्रम पढाया जाता है. इस स्कूल के  सभी बच्चो कम्पय़ूटर से न केवल अपने पाठ्यक्र्म को पूरा करते है अपितु वे अपनी समस्याये सीधे इंटरनेट के जरिये जी सी ई आर टी से भी पूछ सकते है. .   अध्यापिकाओ की संख्या अध्यापको की संख्या से अधिक ही है. इस स्कूल के पुस्तकालय की तरफ आप स्वत: ही खींचे चले जाते है.   





वैसे तो गांव के नजदीक ही कोई न कोई कम्पनी लगी है जिससे वहा के स्थानीय निवासियो को रोजगार सुलभ है परंतु लोगो का मुख्य व्यवसाय पशु-चारण और दुग्ध – उत्पादन ही है. एक-एक घर मे लगभग सैकडो गाय है. झुंड के झुंड चरती गायो को देखकर तो मुझे एक बार द्वापर युग और गुप्त-काल की याद आ गयी जहा नन्दगांव मे भगवान श्रीकृष्ण गायो को चराने जाते थे और दूध की नदिया बहती थी. मुझे सबसे आश्चर्य की बात यह लगी कि इन गायो का स्वामी हिन्दू समुदाय से न होकर मुस्लिम समुदाय से थे और वे सभी भी गाय को दूध-उत्पादन के लिये ही पालते है. हिन्दु समुदाय के साथ – साथ  उनके लिये भी गाय पूजनीय ही है साथ ही कभी भी वहा गाय का वध नही किया गया. घी से सराबोर रोटी के साथ छाछ अनिवार्यत: मिलेगी. इतना ही नही गांव के लोगो द्वारा दूध/छाछ सप्ताह मे दो दिन मुफ्त मे बांटा जाता है. एक बार तो मुझे लगा कि शायद मै किसी सपने मे हू परंतु यह ग्रामीण गुजरात की वास्तविकता थी. कई-कई दिन घर से बाहर लोग पशुओ को चराते रहते है और एक गाडी पैसे देकर उन पशुओ का सारा दूध इकट्ठा कर यात्रियो के लिये चलने वाली सरकारी बसो की सहायता से शहर मे पहुचा देती है. परिणामत: उन सभी को रोजगार उनके घर पर ही मिल जाता है. 
         
 कच्छ के सफेद रण और भगवान द्त्तात्रेय के मन्दिर जहा कभी लोग जाने से भी डरते थे परंतु आज दृश्य पूर्णत: बदल चुका है. नरेन्द्र मोदी द्वारा इन स्थानो को पर्यटन का रूप देने से आज देश ही नही विदेशो से भी लोग कच्छ के सफेद रण और भगवान द्त्तात्रेय के मन्दिर को देखने आते है. हर वर्ष रणोत्सव मनाया जाता है जिसमे गुजरात के ग्रामोद्योग को बढावा देने हेतु हस्तकला इत्यादि की प्रदर्शनी लागायी जाती है जिसे देखने लाखो की संख्या मे विदेशी सैलानी आते है. परिणामत: वहा के ग्रामीण समाज को रोजगार वही उपलब्ध हो जाता है. इतना ही नही भुज से लगभग 19 किमी दूर एशिया का सबसे उन्नत केरा नामक एक गांव है. इनके घर शहर की कोठियो जैसे ही है व इस गांव के हर परिवार का कोई न कोई सद्स्य एनआरआई है. 

महिलाये देर रात तक बिना किसी भय के शहर/गांव व नदियो/झीलो के सौन्दर्य घाटो पर घूमती है. अहमदाबाद का चिडियाघर सौन्दर्यता का एक विशिष्ट उदाहरण है. कानून – व्यवस्था के बारे मे गुजरात के कुछ पुलिसवालो से बात करके पता चला कि उन्हे अपवाद स्वरूप ही महीने मे किसी झगडे इत्यादि मे जाना पड्ता है. और तो और ग्रामीण गुजरात मे मुझे कही भी हिन्दु-मुस्लिम समुदाय के बीच किसी भी प्रकार की विभाजन की रेखा देखने को नही मिली जैसा कि बारबार मीडिया द्वारा दिखाया जाता है. इतना ही नही एक आंकड़े के अनुसार गुजरात में मुसलमानों की स्थिति अन्य राज्यों से कही ज्यदा बेहतर है . ध्यान देने योग्य है कि भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात के मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति आय सबसे अधिक है और सरकारी नौकरियों में भी गुजरात - मुसलमानों का प्रतिशत अन्य राज्यो की तुलना मे अव्वल नंबर पर है .  और तो और एक बार तो पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के 84वे स्थापन दिवस के मौके पर  गुजरात के कृषि विकास को देखते हुए यहा तक कहा था कि जलस्तर में गिरावट , अनियमित बारिश और सूखे जैसे समस्याओ के बावजूद गुजरात 9 प्रतिशत की अभूतपूर्व कृषि विकास दर के माध्यम से भारत के अन्य राज्यों पर अपना परचम लहरा है जबकि भारत की कुल कृषि विकास दर मात्र 3 प्रतिशत है . विश्व प्रसिद्द ब्रोकरेज मार्केट सीएलएसए ने  गुजरात के विकास विशेषकर इन्फ्रास्ट्रक्चर , ऑटोमोबाइल उद्योग तथा डीएमईसी प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी गुजरात का विकास एक सीईओ की तरह काम कर रहे है . यह कोई नरेंद्र मोदी को पहली बार सराहना नहीं मिली इससे पहले भी अमेरिकी कांग्रेस की थिंक टैंक ने उन्हें 'किंग्स ऑफ गवर्नेंसजैसे अलंकारो से अलंकृत किया . नरेंद्र मोदी को  टाइम पत्रिका के कवर पेज पर जगह मिलने से लेकर ब्रूकिंग्स के विलियम एन्थोलिस, अम्बानी बंधुओ और रत्न टाटा जैसो उद्योगपतियों तक ने एक सुर में सराहना की है .

नरेंद्र मोदी की प्रशासक कुशलता के चलते फाईनेंशियल टाइम्स ने हाल ही में लिखा था कि देश के युवाओ के लिए नरेंद्र मोदी प्रेरणा स्रोत बन चुके है . पाटण जिले के एक छोटे से चार्णका गाँव में सौर ऊर्जा प्लांट लगने से नौ हजार करोड़ का निवेश मिलने से वहा के लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठ गया . ध्यान देने योग्य है कि अप्रैल महीने में  नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी काउंसिल जनरल पीटर तथा एशियाई विकास बैंक के अधिकारियों की मौजूदगी में एशिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा पार्क का उद्घाटन किया था जिससे सौर ऊर्जा प्लांट से 605 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा जबकि शेष भारत का यह आंकड़ा अभी तक मात्र दो सौ मेगावाट तक ही पहुंच पाया है . भले ही कुछ लोग गुजरात का विकास नकार कर अपनी जीविका चलाये पर यह एक सच्चाई है कि गुजरात की कुल मिलाकर 11 पंचवर्षीय योजनाओं का बजट भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट के लगभग समकक्ष है . 
                                       
गुजरात के सरदार बल्लभ भाई पटेल को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री न बनाकर इतिहास मे एक पाप किया गया था जिसकी सजा पूरा देश आज तक भुगत रहा है परंतु वर्तमान समय मे अब ऐसा कोई पाप न हो यह सुनिश्चित करना होगा. नरेन्द्र मोदी जो कि संघ के प्रचारक भी रहे है परिणामत: उन्हे समाज के बीमारी की पहचान होने के साथ-साथ उन्हे उसकी दवा भी पता है. अत: अपनी इसी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता के चलते आज भारत ही नहीं विश्व भी नरेंद्र मोदी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता है जिसकी पुष्टि एबीपी नील्‍सन ,  सीएनएन-आईबीएन और इण्डिया टुडे तक सभी के सर्वेक्षण करते  है और तो और  नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का अनुमान कई सोशल साइटो पर  भी देखा जा सकता है .   

राजीव गुप्ता , स्वतंत्र पत्रकार