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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

व्यक्तिगत राय व्यक्तिगत तक ही सीमित होनी चाहिए




अरे  प्रशांत भूषण की पिटाई वाला समाचार आपने सुना ? बड़ी उत्सुकता से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने अपने एक अधेड़ उम्र के साथी से दिल्ली  की लाइफ लाइन कही जाने वाली मैट्रो में सफ़र करते हुए  पूछा !  हाँ देखा भी और सुना भी , परन्तु कुछ अच्छा नहीं लगा ! मुझे लगता है कि अगर थोड़ी बहुत  शर्म और इज्ज़त प्रशांत भूषण जी में बची है तो अब घर बैठे !  अब बहुत वाह - वाही लूट ली !  कल तक जो युवा अन्ना टोपी पहने इनके साथ सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहा था , इन्हें सर - आँखों पर बैठा रखा था आज वही इनको अपने लात -  घूंसों  से पीट  रहा है ? कैसा  दुर्भाग्य  है अन्ना जी का ? पहले  अग्निवेश  जी का असली  चेहरा  जनता  के सामने  आया  जो अब तक सफाई देते फिर रहे है और अब इनके एक और साथी  का ? दूसरे साथी ने थोडा दुखी होकर जबाब दिया !  अरे तुम्हारा कहना तो सही है पर वो भी तो गुंडों की तरह इनको आकर मारने लगा ! भारत एक लोकतान्त्रिक देश है सभी को अपनी बात रखने का हक है ! ऐसे थोड़ी ही है कि अगर आपको कोई मेरी बात नागवार गुजरी तो आप मुझे मारने लगेगे ? अच्छा हुआ जो  प्रशांत भूषण जी  ने खुद भी उस गुंडे को पहले पीटा फिर पुलिस के हवाले कर दिया ! उस गुंडे की अब सारी हेकड़ी निकल जायेगी !  पहले दोस्त ने अपने दोस्त को कानून का पाठ पढ़ते हुए अपनी बात कही ! संविधान ने क्या बोलना है और विरोध कैसे करना है इसकी सीमाए बना रखा  है ! आज तो अन्ना जी ने भी कह दिया कि कश्मीर को लेकर प्रशांत जी का निजी बयान था इससे अन्ना-टीम का कोई सरोकार  नहीं है ! अन्ना - टीम सिर्फ भ्रष्टाचार मिटाने के लिए बनी है , इसके आलावा अगर कोई कुछ कहता है तो सबकी अपनी व्यक्तिगत राय होगी ! अरे भाई अगर व्यक्तिगत राय है तो अपने तक ही सीमित रखो न ,  मीडिया  के सामने अपनी राय रखकर करोडो  लोगो को दु:खी , हैरान और स्तब्ध क्यों करते हो ? प्रशांत जी की इस हरकत से अन्ना जी को भी आने वाले समय में दो-चार होना पड़ेगा ! मुझे तो डर है कि इनके साथियों के बडबोलेपन के करण कही जनता ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी  इनसे मुह न मोड़ ले ? दूसरे साथी ने अपने दोस्त को जबाब  दिया ! 

मैट्रो की ये बातचीत सुनकर मै भी सोचने पर विवश हो गया ! बहरहाल दोनों तरफ से जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया हुई , बेहद खेदजनक है ! और होता भी ऐसे है बिना समाने वाले की भावनाओ को समझे हम अपनी व्यक्तिगत राय रख देते है या बना लेते है  और जब उसका कोई जबाब आ जाता है तो हम दु:खी हो जाते है , और फिर उसे सबक सिखाने की सोच लेते है जो यहाँ पर भी देखने को मिल रहा है ! होना यह चाहिए की समस्या की तह में जकार उसका निदान करने की कोशिश की जाय , क्योंकि गलत तो दोनों ही है बस अंतर केवल इतना है कि कोई कम है  और कोई ज्यादा है  !  जम्मू-कश्मीर भारत का था और है ! आजादी के बाद अभी तक पाकिस्तान  ने अपने नापक इरादे से कई बार भारत पर हमला किया और मुह की खाई ! आज भी वह भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवाद के सहारे अपनी नाकाम कोशिशे लगातार कर रहा है ! ऐसे सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत जी का ऐसा ओछा बयान पाकिस्तान की ही भाषा बोलता है जो कि पाकिस्तान के नाकाम इरादों को ही हवा देगा !  ऐसे में पाकिस्तान के लिए तो यही बात हो जायेगी कि - ' मुफ्त का चन्दन , घिस मेरे नंदन ' !   पाकिस्तान भी तो यही चाहता है कि भारत के अन्दर ही कश्मीर को लेकर फूट पड़ जाय !  जैसा कि अरुंधती राय , जिन्होंने कश्मीर की आज़ादी को ही इस समस्या का एकमात्र हल बताया है,  दूसरे पत्रकार दिलीप पडगांवकर जिन्होंने कश्मीर को विवाद का मुद्दा मानते हुए इसे सुलझाने में पाकिस्तान की भूमिका पर ज़ोर दिया है ! दिलीप पडगांवकर कश्मीर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए भारत सरकार द्वारा नियुक्त तीन वार्ताकारों में से एक हैं ! 

जहा तक प्रशांत जी जम्मू-कश्मीर से सेना हटाने की बात करते  है  तो मुझे समझ नहीं आया कि वकील साहब यह कैसे भूल गए कि  जम्मू - कश्मीर भारत का एक सीमावर्ती राज्य के साथ साथ आतंकवाद से प्रभावित  राज्य है ?  सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के किसी भी सीमावर्ती राज्य को सेना से मुक्त करना न केवल घातक है, अपितु अव्यवहारिक भी है । बहरहाल ! २६ अक्टूबर १९४७ को जम्मू-कश्मीर राज्य के महाराजा हरिसिंह जी द्वारा अपनी रियासत को भारत में विलीन करने के पश्चात कश्मीर का मसला सदा के लिए हल हो जाना चाहिए था !  परन्तु यह सर्वविदित है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत के अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन की सलाह मानकर भारत की विजयी सेना को रोका और पूरे मामले को राष्ट्रसंघ के राजनीतिक मंच पर पेश कर दिया !  १ जनवरी १९४८ को हुए इस महान प्रमाद को हम आज तक भोग रहे है ! स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू की  गलती और अदूरदर्शिता  के  कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से  ही चला गया और यह भी  उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र का लगभग 10 हजार वर्ग किमी. और कश्मीर क्षेत्र का लगभग 06 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के कब्जे में है। 1962 में  चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख के लगभग 36,500 वर्ग किमी. पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में पाकिस्तान ने भी चीन को 5500 वर्ग किमी. जमीन भेंटस्वरूप दे दी, ताकि चीन उसकी  सदैव रक्षा और मदद करता रहे ! 

प्रशांत जी की जहां तक जनमत-संग्रह की बात है, तो संयुक्त राष्ट्र के दो महासचिवों के साथ साथ बहुत लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर समस्या के समाधान के रूप में जनतम-संग्रह की मांग एकदम व्यर्थ है। यहां तक कि उन  दोनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिवों का ये भी मानना था कि जनमत-संग्रह की मांग अब अप्रासंगिक हो गया है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी जनमत-संग्रह की बात को खारिज करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक अलग ही फॉर्मूला पेश किया था। लेकिन पाकिस्तानी खर्चे पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी व प्रशांत जी जैसे उनके समर्थक अब भी जनमत-संग्रह और आत्म-निर्णय का राग अलाप कर अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है यह बेहद खेदजनक है ! ऐसे में जो हमारी  सुरक्षा के लिए रात दिन बम और गोलियों के बीच अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते करते शहीद हो जाते है  उन लाखो सैनिकों की शहादत का क्या अर्थ रह जायेगा ?  प्रशांत जी आज कश्मीर के बारे आप अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है कल को चीन अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताने लगेगा तो कभी नागालैंड अपनी आजादी की बात करने लगेगा ऐसे में आप अपनी व्यक्तिगत राय दे देकर देश की एकता और अखंडता को ही खतरा पहुचायेगे !  
- राजीव गुप्ता