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रविवार, 11 दिसंबर 2011

धोखों के बाद भी इरादे बुलंद हैं




जब आप सच्चे दिल से किसी चीज को पाने का दृढ निश्चय कर लेते हैं तथा उसे पाने के लिए अपना कदम आगे बढ़ा देते हैं तो सबसे पहले आपकी दृढ़ता को ईश्वर द्वारा अनेकों कसौटियों पर परखा जाता हैं और अगर आप उन कसौटियों पर खरे उतर जाते है तो पूरी कायनात आपके साथ कदम से कदम मिलाकर एक ऐसे अभेद्य कारवां का निर्माण कर देती है जिसे भेदने की कोशिश कर रहे विरोधी मुंह की खा जाते हैं या यूँ कहे कि उनका हर तीखा वार मीठा बन कर उन पर ही उल्टा पड़ जाता है ! वर्तमान समय में जन लोकपाल की लड़ाई लड़ रहे श्री अन्ना हजारे - टीम ने इस बात को सिद्ध कर दिया हैं !

सरकार द्वारा बार - बार उन पर आक्रमण होता है , उनके पर कतरने की नाकाम कोशिश सरकार द्वारा होती रहती है ! रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के ऊपर पुलिसिया कार्यवाही के बाद  १६ अगस्त ,  २०११ को किस प्रकार सरकार के वकील मंत्रियों के दमन - चक्र द्वारा आन्दोलन को कुचलने का दुस्साहस किया गया जनता अभी इसे ठीक से भूली भी नहीं थी कि दूर-संचार मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने एस.एम्.एस भेजने की सीमा तय कर और  इंटरनेट की दुनिया को नियंत्रण करने की नाकाम कोशिश कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को ही छीनने का जो कुकृत्य किया गया तथा स्थाई समिति की रिपोर्ट के माध्यम से सरकार द्वारा जनता को धोखा देकर जो वादा-खिलाफी की गयी उन सब बातों का जबाब देने के लिए  ११ दिसंबर , २०११ को जंतर-मंतर पर उमड़ा जन सैलाब सरकार की चूलें हिलाने के लिए काफी था  ! 

इस बार अन्ना - टीम ने अपनी रणनीति में थोडा बदल कर राजनैतिक पार्टियों को भी संवाद के लिए अपने मंच पर बुलाकर एक स्वस्थ लोकतंत्र की मर्यादा को बरकरार रखा जो कि स्वागत योग्य है ! कुछ मुद्दों को छोड़कर लगभग वहां पर उपस्थित सभी राजनैतिक दलों ने अन्ना-टीम की हाँ में हाँ मिलाते हुए  एक सशक्त लोकपाल लाने का आश्वासन दिया जो कि अन्ना-टीम के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! जनता दल यूनाइटेड को छोड़कर बीजेपी समेत लगभग सभी राजनीतक दलों ने एक सुर में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कही , वही ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर लगभग सहमति दिखी परन्तु सिटीजन चार्टर सीबीआई और न्यायपालिका को लोकपाल के अंतर्गत लाने पर थोडा मतभेद भी था जो कि बाद में ख़त्म हो सकता है !  

टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल के अनुसार 'स्टैंडिंग कमिटी में 30 सदस्य हैं !  2 सदस्यों ने कभी इसमें हिस्सा नहीं लिया !  16 सदस्य इससे असहमत हैं, इसलिए इस रिपोर्ट को सिर्फ 12 सदस्यों की सहमति हासिल है !  7 कांग्रेस के हैं, इसके अलावा लालू प्रसाद यादव, अमर सिंह और मायावती की बीएसपी के सदस्य हैं ! ' उन्होंने कहा, 'इस रिपोर्ट की यही विश्वसनीयता है !' परन्तु यहाँ मुद्दा विश्वसनीयता का नहीं अपितु सरकार की नियति का है क्योंकि परेशानी तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब सरकार  अपने किये हुए वादे से मुकर जाय क्योंकि मामला यहाँ जन - भावना का है ! इतिहास साक्षी है कि जब सत्ता के मद में चूर सरकार अपनी हठधर्मिता से  जन - भावनाओं को अनसुना कर उसे बार - बार आहत करती है तो निश्चित रूप से वो अपनी कब्र खोद लेती है ! आपातकालीन के समय श्री जय प्रकाश ने रामलीला मैदान से सरकार को ललकार कहा था कि " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है " क्योंकि उस समय सत्ता के मद में अंधी सरकार को संसद और सड़क के शोर में फर्क नहीं दिखाई पड़ रहा था ! सरकार को यही एहसास दिलाने के लिए जनता - जनार्दन ने जंतर - मंतर से एक बार फिर आगे के आन्दोलन के लिए हुंकार भरी ! 

लोकतंत्र की बुनियादी आदर्श के मुताबिक कोई भी सरकार स्वयं  सत्ता का स्रोत न होकर जनता के निर्णय को असली जामा पहनाने वाली अर्थात  कानून बनाने  वाली एक अधिकृत संस्था मात्र है इससे ज्यादा कुछ नहीं ! यह कहना सत्य है कि राज्य नागरिक समाज से ही बनता है ! इसलिए मूल तो नागरिक समाज ही है और राज्य नागरिक - समाज को चलाने  की व्यवस्था मात्र ! परन्तु सत्ता में बैठे उन लोगों को यह बात नहीं समझ आती !  मै सत्ता में बैठे लोगों से यह पूछना चाहता हूँ कि जब  हर दफ्तर लूट का अड्डा बन गया हो  , हर सरकारी काम बिना घूस  ( अभी हाल में ही मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर निगम के एक चपरासी के निवास से बरामद लगभग चार करोड़ की संपत्ति इसका ताजा उदहारण है ) के न हो सकता हो , बड़ी रिश्वत, बड़ा कमीशन, और बड़ा हिस्सा टैक्स चोरी  का अगर देश की सीमा से बाहर जाता हो  या देश के काले तहखानों में छुपा कर  रख दिया जाता हो  तो क्या देश के नागरिकों को यह अधिकार नहीं कि वो जनता के प्रतिनिधियों से यह सवाल करे या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाये तथा देश के बाहर गए काले धन को  वापस लाने एवं उसे राष्ट्र सम्पति घोषित करने की मांग करे  ? क्या यह सच नहीं है आज नगर पंचायत से लेकर संसद तक लोकतंत्र नहीं लूटतंत्र बन गया है ?

यह बात खुद कई राजनेता भी मान चुके है योजनाओं का पूरा पैसा कभी भी जनता के पास नहीं पहुंचता और तो और संसद में नोट के बदले वोट और यहाँ तक कि पैसे लेकर बदले में  संसद में प्रश्न  तक पूछा जाता है ! भ्रष्टाचार का सरकार को और क्या प्रमाण चाहिए मुझे लगता है सरकार नीतियों में नहीं अपनी नीयत  पर ज्यादा  ध्यान दे !    जब - जब लोकतंत्र की नैतिक शक्ति का चीर-हरण होगा तब तब जनता अपनी आवाज उठाती रहेगी, चाहे प्रतिनिधि कोई भी हो ! मुझे किसी की कही हुई पंक्तियाँ याद आती हैं  कि -   

 "सुविधाओं में बिके हुए लोग , कोहनियों पर टिके हुए लोग !
 बरगद की बात करते है गमलों में उगे हुए लोग !! " 

भारत का यह दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद बहुत से दूरदर्शी राजनेताओं की उपस्थिति के बावजूद सत्ताधारी वो बने जिनका आम जनता से दूर - दूर तक कोई सरोकार नहीं था ! परिणामतः आज तक हम उनकी अदूरदर्शिता के द्वारा लिए गए भारत - विकास के निर्णय से हो रहे असंतुलित विकास को भुगत रहे हैं जिससे आज भारत दो भागों  अर्थात ग्रामीण और शहरी भारत में बंट गया है ! जिसे श्री अन्ना हजारे  ने जंतर-मंतर के अपने सांकेतिक धरने के माध्यम से सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात कर अर्थात ग्राम-संसद की बात की जिसकी वकालत गांधी जी ने बहुत पहले ही की थी जो कि स्वागत योग्य है ! इसके साथ - साथ चुनाव सुधार की तरफ उनके  आन्दोलन का अगला कदम होगा ! इन सब उठापटक के  बीच सरकार अब अपनी हठधर्मिता छोड़कर देश के भले के बारे में सोचे और जनता से किये हुए अपनों वादों को पूरा करने की हिम्मत दिखाए तो शायद देश जापान से भी कई गुना ज्यादा तरक्की कर सकता हैं और जनता भी उनके वादा-खिलाफी को भूल जायेगी !           
                         
                                  - राजीव गुप्ता ( लेखक )
                      

रविवार, 4 दिसंबर 2011

गिरते घर , मरते लोग



      
मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में "मकान" की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है ! हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि सिर ढकने के लिए एक छत  अर्थात उसका  " अपना आशियाना "  हो जहां उसका परिवार प्रफ्फुलित एवं पल्लवित हो और इसी की  जद्दोजेहद में मनुष्य अपने जीवन की अधिकतम आयु लगा देता है , परन्तु जब यही आशियाना चाहे कारण कोई भी हो उसके अपनों की जान पर बन आये तो स्वाभाविकतः वह टूट जायेगा ! कुछ ऐसा ही हादसा वेस्ट दिल्ली के उत्तम नगर में रहने वाले गगन पाठक के परिवार के साथ हुआ !  गौरतलब है कि शनिवार ( 2 दिसंबर , 2011 ) की सुबह अचानक चार मंजिला मकान के भरभराकर गिर जाने से लगभग चार लोग मौत की नींद में सो गए जिसमे से तीन लोग ( माँ , पत्नी और बेटी ) तो गगन पाठक के परिवार के ही थे,  और लगभग दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए ! ललिता पार्क ( 15   नवम्बर, 2011 , पूर्वी दिल्ली ) और चांदनी महल ( 27 सितम्बर, 2011 , दरिया गंज ) के बिल्डिंग - हादसों के बाद यह तीसरा बड़ा हादसा था ! अब फिर से वही सरकार का स्क्रिपटिड ड्रामा शुरू हो जायेगा नेताओं का दौरा होगा , मृतकों के परिजनों से हमदर्दी, मुआवजे का ऐलान, विजिलेंस जांच के आदेश, इंजिनियरों का सस्पेंशन, दोषियों को कड़ी सजा का आश्वासन और भविष्य में ऐसी घटना न होने देने का संकल्प आदि - आदि ! 

एम्.सी.डी की वेबसाइड पर जारी सूची के अनुसार  27  मई 2010  से लेकर 2 दिसंबर  2011  तक लगभग 190 ऐसी कॉलोनियां है  जो कि अनधिकृत रूप से बनायीं गयी हैं ! दिल्ली जो कि भारत की राजधानी है , अगर फिर भी अनाधिकृत कौलिनायों का निर्माण हुआ है / हो रहा है यह इतना मत्वपूर्ण विषय नहीं है असली मुद्दा यह है कि किस विभाग की लापरवाही से ये अनाधिकृत निर्माण हुआ है / हो रहा है ?  लोगों का तर्क है कि एमसीडी नक्शा पास नहीं करती पर हमें तो रहने के लिए मकान चाहिए , इसलिए हमें रिश्वत देने से भी कोई परहेज नहीं है ! वही एमसीडी का कहना है कि हमने कड़े नियम बनाए हैं लेकिन पुलिस इस व्यवस्था को घूस लेकर खराब कर रही है !  हम तो अवैध निर्माण गिराना चाहते हैं लेकिन पुलिस हमारा साथ ही नहीं देती ! अगर पीडब्ल्यूडी या डीडीए की कमी से कहीं अवैध निर्माण हुआ है तो झट से एमसीडी में सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता कांग्रेस -  सरकार के खिलाफ  मोर्चा खोल देते हैं परन्तु अगर इससे उल्टा होता है अर्थात ललिता पार्क या चांदनी महल में कोई मकान गिरता है तो फिर दिल्ली सरकार और केंद्र के कांग्रेसी नेता एमसीडी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं ! अर्थात लाशों पर भी राजनेता अपनी राजनीति चमकाने से गुरेज नहीं करते ! 


एक जगह मैंने पढ़ा है कि 1977 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ईस्ट दिल्ली के वेलकम इलाके में सरकारी जमीन पर  रातों-रात सैकड़ों झुग्गियां एक साथ बसा दी गईं थी क्योंकि मामला वोट का था ! विरोध करने वाले विरोध करते रह गए वह कॉलोनी वहां हमेशा के लिए बसनी थी और बस गई !  यह तो मात्र एक उदहारण है ! दिल्ली में जाने कितने ऐसे उदहारण  मिल जायेंगे , जहां वोट की राजनीति के चलते कॉलोनियां हमेशा के लिए बसा दी जाती है ! ऐसी अवैध कॉलोनियों को बसाना और फिर पास कराना कोई नया काम नहीं है ! इस धंधे में पहले राजनेता उन्हें अपनी जीत के लिए बसाते है फिर उनसे  "नोट" लेकर अपना मुआवजा ऐठ लेते है ! ऐसी अवैध कॉलोनियों में बिजली से लेकर पानी तक  अर्थात लगभग आवश्यक सारी सुविधाएँ भी मिल ही जाती है ! नोट और वोट का  यह ऐसा मिश्रण होता है कि क्या मजाल कोई कुछ बोल दे ! एक बार कॉलोनी बस गई तो बस गई ,  फिर कोर्ट से लेकर सबके सब बेबस हो जाते हैं हालाँकि हाई कोर्ट ने कुछ साल पहले निर्देश दिया था कि ऐसी कॉलोनियों में किसी प्रकार की कोई नागरिक सुविधाएं न दी जाएं  , परन्तु मानवता की आड़ लेकर सब काम हो गया ! कॉलोनियों को सुविधाएं  दी गयी और उनके पास कराने का प्रस्ताव भी लाया गया  ! और तो और लगभग 1218 कॉलोनियों को तो प्रविजनल सर्टिफिकेट दे दिया गया है !    

हमें यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ कमियां नियमों में ही हैं जिसके चलते अवैध निर्माण के लिए लोग मजबूर भी हैं ! मसलन दिल्ली में 1958 में जो बिल्डिंग बायलॉज बने थे, आज भी उन्हीं पर अमल किया जाता है , जबकि यहाँ की जनसँख्या अब दुगने से भी ज्यादा हो गयी है ! कुछ कमेटियां जरूर बनीं पर  उनकी रिपोर्ट कभी लागू ही नहीं हो पायीं क्योंकि 1977 में 600 से ज्यादा जिन कॉलोनियों को पास किया गया  आज तक उनके नक्शे पास नहीं होते क्योंकि बायलॉज इसकी इजाजत नहीं देते ! चांदनी चौक जैसे इलाको में जहां के भवन सैकड़ो वर्ष पहले मिट्टी के ईंट - गारों से बने थे आज उनकी हालत जर्जर हो चुकी है , ऐसे इलाकों के बारे में एक बार अब पुनः सोचना ही होगा ! राजधानी होने के नाते वर्ष भर में लाखों लोग दिल्ली बसने / रोजगार की तलाश में आतें है जिससे सभी प्रकार की व्यवस्था बनाये रखने में दिक्कत तो होगी परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली का प्रशासन और राजनेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और लोग मरते रहे ! दिल्ली - पुलिस जिसकी पूरे देश भर में  मिशाल दी जाती हो , ऐसे में धडल्ले से अनाधिकृत रूप से निर्माण होना अपने आप में ही प्रश्न चिन्ह तो  खड़ा करता ही है ! इन सभी कमियों के बावजूद चाहे वह आम जनता की हो अथवा प्रशासन की सबको नोट और वोट की राजनीति से ऊपर उठकर इस समस्यां का समाधान खोजना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि अब ऐसे बिल्डिंग हादसे दिल्ली में न हो  और गगन पाठक जैसा कोई अपना परिवार खोये !    
    
                                                                - राजीव गुप्ता ( लेखक )