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Sunday, November 27, 2011

नेता और जन आक्रोश





जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हो , विदेशों में जामा काले धन को स्वदेश में लाने के लिए सरकार टालमटोल का रवैया अपनाये तो ऐसा में जनता में आक्रोश होना लाजमी है ! अगर सरकार अब भी न चेती तो कही हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाय जिसका आगाज़ एक शख्स  ने वर्तमान कृषि मंत्री शरद पावर जी पर थप्पड़ मार कर अपने आक्रोश का इजहार तो कर दिया जो कि बहुत ही निंदनीय है परन्तु सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा कही ये हालात और भड़क कर बेकाबू न हो जाय !   
फ़्रांस की 1756 की क्रांति का इतिहास साक्षी है , जो कि कोई सुनियोजित न होकर जनता के आक्रोश का परिणाम थी !  जब जनता किंग लुईस के शासन में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान होकर सडको पर उतरी और तो पूरे राजघराने को ही मौत के घाट उतारते हुए अपने साथियों को ब्रूस्सील ( Brusseel ) जेल को तोड़कर बाहर निकाल कर क्रांति  की शुरुआत की ! परिणामतः वहां  लोकतंत्र  के साथ - साथ  तीन नए शब्द  Liberty , Equality ,  Fraternity  अस्तित्व में आये ! वास्तव में उस समय राजघराने का जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था ! इसका अंदाजा हम उस समय की महारानी मेरिया एंटोनियो के उस वक्तव्य से लगा सकते है जिसमे उन्होंने भूखमरी और महंगाई से बेहाल जनता से कहा था कि " अगर ब्रेड नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते ! "

ऐसी ही एक और क्रांति सोवियत संघ में भी हुई थी ! जिसका परिणाम वहां की जारशाही का अंत के रूप में हुआ था ! कारण लगभग वहां भी वही थे जो कि फ़्रांस में थे जैसे खाने-पीने की वस्तुओं का आकाल , भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता और सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का दमन ! सोवियत संघ में लोकतंत्र तो नहीं आया परन्तु वहां कम्युनिस्टों  की सरकार बनीं !

जब अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर हो , मंहगाई के साथ - साथ बेरोजगारी दिन - प्रतिदिन बढ़ रही हो , और सरकार अपनी दमनकारी एवं गलत नीतियों से जनता की आवाज को दबाने कोशिश कर रही हो तो जनता सडको पर उतरकर अपना आक्रोश प्रकट करने लग जाती है और यदि समय रहते हालात को न संभाला गया तो यही जनता भयंकर रूप लेकर सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल करने से पीछे भी नहीं हटती जिसका गवाह इतिहास के साथ साथ अभी हाल हे में हुए कुछ देशों के घटनाचक्र है ! सत्ता - परिवर्तन करने के लिए लोग अपने शासक गद्दाफी का अंत करने से भी पीछे नहीं हटे ! एक तरफ  कभी अमेरिका और ब्रिटेन के लोग आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के चलते प्रदर्शन करते है तो वही दूसरी तरफ मिस्र की जनता सड़कों पर हैजिसके चलते  मिस्र आज भी सुलग रहा है !

आंकड़ो की बजीगीरी सरकार चाहे जितनी कर ले पर वास्तविकता इससे कही परे है ! बाज़ार में रुपये की कीमत लगातार गिर रही है अर्थात विदेशी निवेशक लगातार घरेलू शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे है ! गौरतलब है कि रुपये की कीमत गिरने का मतलब विदेशी भुगतान का बढ़ जाना है अर्थात पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें और बढ़ेगी ही जिससे कि अन्य वस्तुओ की कीमतों में भी इजाफा होगा ! महंगाई को सरकार पता नहीं क्यों आम आदमी की समस्या नहीं मानना चाहती ? एक तरफ जहां हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री है , विदेशों में जाकर आर्थिक संकट से उबरने की सलाह देते है और अपने देश में मंहगाई से आम आदमी का कचूमर निकाल कर कहते है कि हमारे पास कोई जादू की छडी नहीं है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री जी महंगाई कम होने की तारीख पर तारीख देते रहते है जैसे कि कोई अदालतीये कार्यवाही में तारीख दे रहे हो ! 

अगर हम पिछले कुछ वर्षों में हुए बदलाओं पर नजर दौडाएं तो पाएंगे कि उदारीकरण के कारण समाज में असमानता ही  ज्यादा बढी है ! क्योंकि अमीर (लगभग 8200 ) और ज्यादा अमीर बनता जा रहा है तो गरीब ( लगभग 60 करोड़ से भी अधिक जिसमे से लगभग 40 करोड़ तो बी.पी.एल. कार्ड धारक हैं ) और ज्यादा गरीब ! उदारवादी आर्थिक नीतियों का फायदा सीधे - सीधे पूंजीपतियों को ही होता है और आम आदमी महंगाई के बोझ - तले पिसता रहता है ! रामलीला मैदान में लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना नेतृत्व धरने में जिस प्रकार से आम जनता के आलावा नौजवानों ने भाग लिया उससे साफ जाहिर होता है आम जनता सरकार की नीतियों से त्रस्त है और वो बदलाव चाहती है परन्तु वर्तमान अपनी गंभीरता नहीं दिखती है ! 

और तो और सरकार के मंत्री अपने बडबोलेपन से जनता को दिलासा देने की बजाय उनके धैर्य को ललकारते हुए खाद्य-बस्तुओं के कीमते बढ़ने की भविष्यवाणी कर व्यापारियों को खाद्य-बस्तुओं की कीमते बढ़ाने का मौका दे देकर आम जनता  को ही महंगाई के बोझ तले और ज्यादा दबा देते है ! गौरतलब है कि पिछले दिनों वर्तमान केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा था कि अगर आम जनता के पास कोल्ड्रिंक खरीदने के लिए पैसा है तो सब्जी खरीदने के लिए क्यों नहीं और कई बार दूध, दाल , सब्जी आदि खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने के संकेत से कालाबाजारी शुरू हो गयी और अगले ही इन वस्तुओ की कीमते आसमान छूने लगी थी ! 

अब असली मुद्दा यह है कि आम आदमी जाये  तो कहाँ जाये ? ऐसे में जनता में सरकार के प्रति आक्रोश  तो लाज़मी ही है ! जनता अपने आक्रोश का प्रदर्शन कभी कॉमनवेल्थ घोटाले  के आरोप में जेल में बंद सुरेश कलमाडी पर तो कभी घूस लेने के आरोपी पूर्व संचार मंत्री सुखराम पर चप्पल फेंक करती है ! इस आक्रोश से साफ़ जाहिर है कि जनता महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कला धन इत्यादि मुद्दों के प्रति बहुत ही ज्यादा गंभीर है उनके इस आक्रोश को सत्ताधीशों की   समझ में आना  चाहिए !  जनता का यह आक्रोश कोई विकराल रूप ले ले उससे पहले सरकार को आत्मचिंतन कर इस सुरसा रूपी महंगाई की बीमारी से जनता को निजात दिलाना ही होगाक्योंकि एक बार राम मनोहर लोहिया जी  ने भी कहा था कि  जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं किया करती है , ऐसे में मुझे लगता है कि नेताओं की इन गलत नीतियों से जनता में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है !  
                
                                                                          - राजीव गुप्ता लेखक एवं स्तंभकार   
                                                                             

1 comments:

सुलभ said...

सहमत
सही कहा है आपने.