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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

कहीं जनता के विश्वास का फिर चीरहरण तो नहीं होगा ?



वी.डी.सी. , प्रधानी , स्कूल , ईंट का भट्टा , और राशन - तेल का कोटा भी उन्ही के पास है !  उनकी कई गाड़ियाँ चलती है !  कंधें पर दू-नाली लाइसेंसी बन्दूक लटकाए उनके आदमी हाट - बाजार के दुकानदारों से जबरन चुंगी वसूलने के लिए आते है ! अपनी ताक़त का एहसास कराने के लिए बाजार में घुसने से पहले वो  हवाई फायर भी करते है ! सब कुछ वो ब्लैक कर देते है ! घर में बेटी की शादी हो तो भी हमें  हर जरूरी सामान ब्लैक में ही खरीदना पड़ता है !  साहब हमें आजतक कभी  न तो राशन कार्ड के मुताबिक न तो पूरा राशन मिला और न ही कभी मिटटी का तेल ! वो कुछ भी कर सकते है ! हम गरीब - दुखिया की कौन सुनेगा ?  पुलिस वाले भी उन्हें सलाम ठोंकते है ! थानेदार और दरोगा साहब तो हर महीने उनके घर पर  मेहमान की तरह आते  रहते है ! साहब उनके खिलाफ अदालत में गवाही देने की बात तो दूर की है साहब,पूरे गाँव में किसी की क्या मजाल जो उनके खिलाफ कुछ बोल दे ? अगर किसी ने हिम्मत जुटाई तो उसका या तो राम - नाम  सत्य हो गया या तो गवाही देने वाला ही जेल चला गया !   साहब वो पैसे वाले है !  जज साहब को भी वो फीस देकर उल्टा  उसे ही फसवा कर  जेल भिजवा देते है !  अन्ना साहब ने यह कसम खायी है कि वो कचहरी के भ्रष्ट जजों के खिलाफ करवाई करवाने के लिए कानून बनवायेगे ! इसलिए उनके समर्थन में मै अपनी तीन बेटियों और दो बेटों को घर पर अकेले छोड़कर  अपनी पत्नी के साथ यहाँ रामलीला मैदान में अपनी खेती को भगवान् - भरोसे छोड़कर  आया हूँ , बिना किसी बिछौने के भीगी हुई घास पर लेटे हुए , रात्रि लगभग 2 बजे , भिंड जिले के खरका गाँव के मिजाजी लाल जी ने अपनी व्यथा बताते हुए रामलीला मैदान में आने का करण बताया !  आप सब शहर के लोग पढ़े-लिखे हैं,  और यहाँ शहर में रहते है आप सब भी कुछ दिन की छुट्टी लेकर हमारे साथ तपस्या कीजिये क्या पता आप सब की सरकार जल्दी सुन ले ! साहब आप लोगों की तपस्या से हम बेचारे गरीब-दुखिया को गाँव  में सताया  नहीं जायेगा, हमें भी पूरा राशन मिलेगा , हमारे  बच्चे भूखे नहीं सोयेगे कहते हुए उनकी धर्म पत्नी ने हमसे रामलीला मैदान में आने का आग्रह किया ! 

साहब ! हमें पूरी मजदूरी मिलेगी , ठेकेदार और प्रधान को हिस्सा नहीं देना पड़ेगा , पीला / लाल राशन - कार्ड बनवाने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा ! एक बात और बताऊ साहब जी बड़े  अस्पताल में ( सरकारी अस्पताल ) डाक्टर को भर्ती करने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा ! साहब हमारी एक ही बहु थी , गर्भवती थी , भर्ती कराने के लिए  बड़े अस्पताल ले गया , डाक्टर साहब ने  भर्ती करने  के लिए मोटी रकम मांगी , मैं नहीं दे पाया तो डाक्टर साहब ने मेरी बहु को भर्ती नहीं किया ! अस्पताल के बाहर ही दर्द के मारे छटपटाते हुए बहु ने पोते को जन्म देकर हमसे रूठ कर भगवान् के पास चली गयी !  अब आप ही बताइए साहब हम गाँव के किसान मेहनत  - मजदूरी करके अपना पेट भरते है , घूस देने के लिए इतना पैसा कहा से लायें !  "भालत माता ती - तय"  , कहते हुए एक करीब पांच साल का बच्चा हाथ में तिरंगा लिए हुए और "मै अन्ना हूँ" की टोपी लगाये हुए यूं.पी. के एक खालौर गाँव के रामावतार जी की गोद में आकर बैठ गया ! यही हमारा पोता है साहब ! आप स्कूल जाते हो ? मैंने उस बच्चे पूंछा ! वो बच्चा हमारी तरफ देखने लगा शायद उसको समझ नहीं आया ! अभी ये तो बहुत छोटा है ये 5 कि.मी. दूर स्कूल कैसे जायेगा ? रात्रि लगभग 3 बजे बीडी पीते हुए , उस बच्चे की  तरफ से जबाब रामावतार जी ने दिया !         

हम नेत्रहीनों को आज भी भीख मांग कर अपना पेट भरना पड़ता है  , और तो और सरकारी सहायता पाने के लिए रकम का लगभग आधा हिस्सा घूस देना पड़ता है ! इसलिए मै अपनी नेत्रहीन पत्नी के साथ अन्ना जी के समर्थन आया हूँ , रात्रि करीब 4 बजे फरीदाबाद के सच्चिदानंद जी  ने हमें अपने रामलीला मैदान में आने का करण बताया ! हमारे बहुत आग्रह करने पर सच्चिदानद एक देशभक्ति गीत " ये मेरे वतन के लोगों..." सुनाया  ! इसके बाद मेरी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई ! 

अन्ना जी के ऊपर सरकार द्वारा किये गए चार जून की रात्रि का जलियावाला बाग - सा अपना घनघोर कु-कृत्य दोहराना चाहती थी परन्तु समय रहते जनता ने सरकार के मंसूबों को भांप लिया और  अन्ना  जी की समर्थन  में  सड़क  पर  आ  गयी  !  जहां एक तरफ अन्ना समर्थन में छत्रसाल स्टेडियम में आम लोगों के द्वारा दी गयी स्वतः गिरफ्तारी हो रही थी तो दूसरी तरफ सरकार के दांव-पेंचों से दिल्ली  की सड़कों पर अन्ना जी भ्रमण कर रहे थे ! अंत में सात दिन के लिए सरकार के वकील-मंत्रियों ने अन्ना जी को सरकारी आवास अर्थात तिहाड़ जेल मुहैया करवा दी और अगले ही कुछ पलों में उन्हें छोड़ दिया गया  ! बस यही से भारत का भोला जनमानस सरकार की इस क्रूरता के खिलाफ और भारत के संविधान द्वारा नागरिको को प्रदत्त  मौलिक अधिकार के हनन के  मुद्दे पर सारी  जनता अर्थात सड़क से लेकर संसद तक अन्ना जी के समर्थन में आ गयी ! परिणामतः दिल्ली में अनशन न करने देने की जिद पर अड़ी सरकार को मजबूरी में रामलीला मैदान देना पड़ा ! मेरे मन में यह प्रश्न लगातार उठ रहा था की इतने लोग दिल्ली जैसे शहर में आये कैसे ? कौन थे ये लोग ? इन प्रश्नों का उत्तर जब मै स्वयं रामलीला मैदान गया तो मुझे स्वयं ही मिल गया !     

बहरहाल , भारत की जनता के बारे में प्रायः ऐसा कहा जाता है कि यहाँ की जनता समझदार के साथ - साथ बहुत भोली है ! जनता के बीच जाकर उनसे बात करने के बाद लगा मुझे लगा कि लोग सच ही कहते है,  मै इस बात से पूर्णतः सहमत भी हूँ !  परन्तु 16 अगस्त , 2011 को जिन मांगों को लेकर अन्ना जी ने अपने साथियों के साथ भारत से लगभग 65 % भ्रष्टाचार ख़त्म करने कि बात कही थी,  क्या अन्ना जी की वो मांगे 27 अगस्त , 2011 तक सरकार द्वारा मान ली गयी ?  मसलन :-

  1.  सरकार अपना कमजोर बिल वापस ले। नतीजा : सरकार ने बिल वापस नहीं लिया।
  2.  सरकार लोकपाल बिल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाये। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।
  3.  लोकपाल के दायरे में सांसद भी हों : नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र नहीं।
  4.  तीस अगस्त तक बिल संसद में पास हो। नतीजा : तीस अगस्त तो दूर सरकार ने कोई समय सीमा तक नहीं तय की कि वह बिल कब तक पास करवाएगी।
  5.  बिल को स्टैंडिंग कमेटी में नहीं भेजा जाए। नतीजा : स्टैंडिंग कमिटी के पास एक की बजाए पांच बिल भेजे गए हैं।
  6.  लोकपाल की नियुक्ति कमेटी में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।
  7.  जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा नियम 184 के तहत करा कर उसके पक्ष और विपक्ष में बाकायदा वोटिंग करायी जाए। नतीजा : चर्चा 184 के तहत नहीं हुई, ना ही वोटिंग हुई।
उपरोक्त के अतिरिक्त तीन अन्य वह मांगें जिनका जिक्र सरकार ने अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में किया है वह हैं :-
  1. सिटिज़न चार्टर लागू करना,
  2. निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना,
  3. राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति करना। प्रणब मुखर्जी द्वारा स्पष्ट कहा गया कि इन तीनों मांगों के सन्दर्भ में सदन के सदस्यों की भावनाओं से अवगत कराते हुए लोकपाल बिल में संविधान कि सीमाओं के अंदर इन तीन मांगों को शामिल करने पर विचार हेतु आप (लोकसभा अध्यक्ष) इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजें। 
मुझे ऐसा लगता है कि 15 अगस्त 1947  देश  जहां खड़ा था आज भी वही खड़ा है ! कही टीम अन्ना द्वारा किए गए समझौते ने देश को उसी बिंदु पर लाकर तो नहीं खड़ा कर दिया ?  जनता के विश्वास की सनसनीखेज सरेआम लूट को विजय के  नारों की आड़ में छुपाया तो नहीं जा रहा है ? क्या एक बार फिर भोली जनता के विश्वास का चीर - हरण होगा ? ….. फैसला आप करें।   

- राजीव गुप्ता 

बुधवार, 17 अगस्त 2011

विनाशकाले विपरीतबुद्धि






  देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए जो आवाज उठी है उसे दबाने की कोशिश करने वाले और सत्ता के मद में चूर सत्ताधारियों के लिए अगर यह कहा जाय कि " विनाशकाले विपरीतबुद्धि " तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी अपितु भारतीय चिंतको का यह ब्रह्म वाक्य आज सौ फीसदी सच होता दिख रहा  है !

 त्रेता युग में, जिस प्रकार मंदोदरी ने हठ छोड़ने के लिए रावण को लाख समझाया परन्तु जब वो दम्भी रावण न माना तो मंदोदरी खुद ही अपने मन को समझाने लगी कि अब तो बिधाता ही प्रतिकूल हो गए है !     

मंदोदरी ह्रदय कर चिंता ! भयऊ कंत पर बिधि बिपरीता !! ( सुन्दर काण्ड )

( मंदोदरी ह्रदय में चिंता करने लगी की पतिपर बिधाता प्रतिकूल हो गए है ! ) 


उसी प्रकार इस दम्भी सरकार ने किसी की नहीं सुना ! उनके इस कुकृत्य का फ़ल तो समय के गर्भ में है ! परन्तु इन दम्भियों ने खुद अपने को कटघरे में खड़ा कर लिया !     


 इतिहास अपने को  दोहराने को आतुर है, परन्तु इन प्रधानमंत्री के सलाहकार और सत्ताधारी वकीलों को सड़क और संसद के शोर में कोई फर्क दिखाई नहीं देता ! सत्ताधारी यह भूल गए कि अनशन से ही आँध्रप्रदेश और पंजाब जैसे राज्य बने थे ! परन्तु अनशन के नाम पर इस बार उन्होंने सीधी टक्कर उस आम जानता से लिया है जो स्वयं जनार्दन है और जिसका प्रतिनिधित्व एक फकीर कर रहा है ! इतिहास साक्षी है कि जब - जब भी किसी संत ने समाज को जगाकर अन्याय के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया तब-तब समाज ने भगवान राम के रूप  में , छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में अपना नेता पाया ! फकीर बिना किसी स्वार्थ के जब अपने पागलपन पर उतरता है जैसा कि सत्ता पक्ष के एक नेता ने कहा, बदलाव निश्चित हो जाता है ! कल तक ये सत्ताधारी  बिना शर्त अनशन के लिए इजाजत ना देकर अपनी ताल ठोंक रहे थे परन्तु अब यही सत्ताधारी आज घुटनों के बल , अपनी नाक रगड़ते हुए उसी पागल फकीर के आगे नतमस्तक हो रहे है ! संविधान का हवाला देकर ये  सत्ताधारी जनता के अधिकारों का चीर हरण करते हुए अपने जनार्दन अर्थात जनता को गुमराह कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते थे जिसे जनता ने भांप लिया और इन्हें इनके खतरनाक मंसूबों को  कामयाब नहीं होने दिया ! और उसी आम आदमी ने अपनी शक्ति दिखाई जिसकी आवाज ये अपने अत्याचार से दबाना चाहते थे ! ये लगातार चालें चलते रहे और मुह की खाते हुए एक के बाद एक गलत फैसले लेकर इन्होने खुद अपनी भ्रष्टाचारी और अत्याचारी लंका को जलाने का इंतजाम कर लिया है जैसे कभी त्रेता युग में रावण ने किया था !   


रहा  नगर बसन घृत तेला ! बाढी पूंछ कीन्ह कपि  खेला !! ( सुन्दर काण्ड  )

( घी , तेल हनुमान जी की पूंछ पर लपेट कर , लंका को जलाने का  पूरा बंदोबस्त रावन ने खुद करवा दिया ! )


इन्हें हनुमान जी की तरह जनता ने मूक होकर , विनती कर समझाने की बहुत कोशिश की और अपनी सहनशक्ति का परिचय देती रही , परन्तु रावण की तरह ये सत्ताधारी लोग अपने दंभ में इतने मतवाले हो गए इन्हें किसी की भावना और मूक भाषा समझ नहीं आई ! 

बिनती करूँ जोरी कर रावण ! सुनहु मान तजि मोर सिखावन !! ( सुन्दर काण्ड )

हनुमान ने कहा , हे रावण ! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती  करता हूँ , तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो !





 सत्ता के पास अब एक ही नेता है जिन्होंने विभीषण की तरह रावण रूपी इन सत्ता - मतवाले वकीलों को वर्तमान हालत से निपटने का गुर जरूर बताया होगा , परन्तु विदेशों में पढ़े और अंग्रेजी बोलने वाले वकीलों ने अपनी दलीलों से उन्हें भी चुप करवा दिया होगा ! इस समय इन सत्ता मतवालों को जो भी सही बात बताएगा वो इनकी नजरों में दोषी होगा ऐसा जान पड़ता है ! इन्होने अपना संतुलन खो दिया है ! तभी उलटे - उलटे फैसले लेकर खुद फसते जा रहे है !  


जहाँ सुमति तहां सम्पति नाना ! जहाँ कुमति तहां बिपति निदाना !! 
तव उर कुमति बसी बिपरीता ! हित अनहित मनहूँ रिपु प्रीता !! सुन्दर काण्ड )

( बिभीषण कहते है कि - जहा सुबुद्धि रहती है वहां नाना प्रकार की सम्पति ( सुख की स्थिति ) रहती है  और जहाँ कुबुद्धि है वहां परिणाम में विपत्ति ( दुःख की स्थिति ) रहती है !
आपके ह्रदय में उल्टी बुद्धि  बसी है ! इसी से आप हित को अहित को और शत्रु को  मित्र मान रहें है ! )


तात चरन गहि मागऊँ रखाहूँ मोर दुलार !
सीता देहूं राम कहूँ अहित  होई तुम्हार !! 40 !! ( सुन्दर काण्ड )

बिभीषण कहते है कि - हे तात ! मै चरण पकड़कर आपसे भीख मांगता हूँ ( विनती ) करता हूँ की आप मेरा दुलार रखिये ( मुझ बालक के आग्रह को स्नेह पूर्वक स्वीकार कीजिये ) ! श्री राम जी को सीता जी दे दीजिये , जिससे आपका अहित  हो !

सुनत दसानन उठा रिसाई ! खल तोही निकट मृत्यु अब आई !! ( सुन्दर काण्ड )

यह सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला रे दुष्ट ! अब मृत्यु तेरे निकट  गयी है ! )


 अब तो यहाँ  तक सुनने में आ रहा है कि मंदोदरी की तरह इनके अपने भी इन्हें कोसने लगे है ! 

निकट काल जेहि आवत साईं ! तेहि भ्रम होई तुम्हारिहि नाईं !! ( लंका काण्ड )

 ( मंदोदरी कहती है कि - हे   स्वामी ! जिसका काल ( मरण-समय ) निकट  जाता है , उसे आप की तरह ही भ्रम हो जाता है ! ) 



आम जनता तो अब अंगद की तरह चीख चीखकर कह रही है कि - 

मरू गर काटि निलज कुलघाती ! बल बिलोकी  बिहरति  नहि छाती  !! ( लंका काण्ड )

 ( अंगद कहते है कि - अरे निर्लज्ज ! अरे कुल्नाशक ! गला काटकर ( आत्म हत्या करके ) मर जा ! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती ! ) 



 इन सत्ता - मतवालों की लंका तो जल गयी ! लेकिन इस कुकृत्य से अब इनके अपने ही डर कर इनसे ही पूछने लगे है कि - 

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका ! जब तें जारि गयऊ कपि लंका !!  
निज निज गृहं  सब करहि बिचारा ! नहीं निसिचर कुल केर उबारा !! ( सुन्दर काण्ड )

( लंका को  जबसे हनुमान जी जलाकर गए तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे  ! अपने-अपने घरों में सब विचार करते हैं की राक्षस कुल की रक्षा का अब कोई उपाय नहीं हैं ! )



   - राजीव गुप्ता
  9811558925