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गुरुवार, 21 जुलाई 2011

प्रकृति : भारतीय चिंतन





यत्र वेत्थ वनस्पते देवानां गृह्य नामानि !
तत्र हव्यानि गामय !!
                                                    ( हे  वनस्पते ! हे आनंद के स्वामी !  जहां तुम  दोनों के गुह्य नामों को जानते हो, वहां, उस लक्ष्य तक हमारी भेटों को ले जाओ ! )
या आपो दिव्या उत वा स्रवंति खनित्रिमा उत वा याः स्वयंजाः ! 
समुदार्था  याः  शुचयः पवाकस्ता आपो देवीरिः मामवन्तु  !!
                                             ( दिव्य जल जो या तो खोदी हुई या स्वयं बहती हुई नहरों में बहता है, जिनकी गति समुद्र की ओर है, जो पवित्र है, वह दिव्य जल मेरी पालना करे ! )

ऋग्वेद की इन श्रुतियों से हम यह कह सकते है हमारे पूर्वजों का प्रकृति के प्रति कितना गहरा  चिंतन ना केवल था अपितु प्रकृति को वो परमपिता परमेश्वर की  अर्धांगिनी मानकर उसके साथ दैनिक दिनचर्या में तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास भी करते थे ! 
                                                                
                                                                                       नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे, सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया !
                                           गृहीतशक्तित्रितयाय देहीनामन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने !! (श्रीमदभागवतमहापुराण- द्वितीय स्कंध - 12 ) 
       
( उन पुरुषोत्तम भगवान् के चरण कमलों में कोटि-कोटि प्रणाम है, जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय की लीला करने के लिए सत्त्व, रज, तथा तमो गुण रूप तीनो शक्तियों को स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का रूप धारण करते है, जो समस्त चर-अचर प्राणियों के ह्रदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान है , जिनका स्वरुप और उसकी उपलब्धि का मार्ग बुद्धि के विषय नहीं है, जो स्वयं अनंत है तथा जिनकी महिमा भी अनंत है ! ) 
गायन्त्य ..........बिभ्रत्युत्पुल कान्यहो !!     
                                                                                                    ( श्रीमदभागवतमहापुराण- दशम स्कंध, तीसवां अध्याय ,  4 - 13 ) 

( भगवान् श्री कृष्ण के विरह में गोपियाँ वनस्पतियों से , पेड़-पौधों से जैसे पीपल,पाकर,बरगद,कुरबक,अशोक,नागकेशर,पुन्नाग,चंपा,तुलसी,मालती,मल्लिके,जाती,जूही,रसाल,परियल,कटहल,
पीतशाल,कचनार,जामुन,आक,बेल,मौलसिरी,आम,कदम्ब,नीम,पृथ्वी आदि-आदि ! )

भगवान् कृष्ण के अंतर्ध्यान होने पर व्याकुल गोपियों ने उपरलिखित प्रकृति के निम्नलिखित घटकों से भगवान् श्री कृष्ण का पता पूछा !   
                                                                                          
                                                                                           लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद  पेखि !
                                                      गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुं देखि !! ( तुलसी कृत रामचरितमानस, किष्किन्धा काण्ड, दोहा - 13 )   
(श्री राम जी कहतें है कि हे लक्ष्मण ! देखों, मोरों के झुण्ड बादलों को देखकर नाच रहें है ! जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णु भक्त को देखकर हर्षित होतें है !! )
 और तो और पूरी रामचरितमानस में प्रकृति का वर्णन विशेष रूप से किष्किन्धा काण्ड में पूरा का पूरा वर्षा-ऋतु और शरद-ऋतु का वर्णन मिल जायेगा !        

हिन्दू धर्म और प्रकृति को अगर एक दूसरे का प्रयायवाची कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! हिंदू धर्म, प्रकृति की गोद मे बना और खिला है ! सभी मनीषियों का तप स्थल प्रकृति की गोद ही रही है ! गुरुकुल हमेशा प्रक्रति के बीच ही होते थे ! मसलन चाहे भगवान् राम हो अथवा भगवान् कृष्ण सबको शिक्षा लेने के लिए गुरुकुल में ही जाना पड़ा था ! वेद और अन्य शास्त्र के मंत्र इसकी स्तुति करते रहे है ! प्रकृति इतनी पूज्य है की इसको परमात्मा की अर्धांगिनी की तरह से न केवल देखा जाता है अपितु पृथ्वी को भगवान् विष्णु की पत्नी ( समुद्रवसने देवी ...विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं....) मना जाता है ! आकाश,वायु,जल,अग्नि, भूमि ये पांच महाभूत ( प्रकृति पञ्चभूतानि  ग्रहालोका स्वरास्तथा .....)  तो सृष्टि के ही अंश है ! गीता मे भगवान श्री कृष्ण विश्व को ही अपना रूप बताते है ! 


इतिहासकार भी लिखते है कि सिन्धु घटी के धर्म में पवित्र पशुओं का का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है ! मसलन "बृषभ" का चित्र जो कि अधिकांश जगह अंकित है , उसके द्वारा खाया  जा रहा अन्न उत्सव का द्योतक है ! पीपल नाम के वृक्ष की पूजा उस समय भी होती थी और आज भी होती है ! मौर्य सम्राट अशोक बाद के अपने शासन कल में पूर्णतः अहिंसा का पुजारी बन गया था, जिसका उल्लेख कई इतिहासकारों ने अपने कृति में भी किया है !

                                                                          

                                                                         इन्द्रानियल मार्काणामग्नेश्य वरुणस्य च !

चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतिः !! ( मनुस्मृति )  

                                                  

                                              ( इंद्र , अनिल, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र, धनस्वामी कुबेर के शाश्वत सारभूत अंशों से राजा की सृष्टि की ! ) 


मनुस्मृति के इस श्लोक में भी प्रकृति की महत्ता देखी जा सकती है ! 


भारत में आज भी जितने तीर्थ स्थल है अधिकांशतः प्रकृति की गोद में ही है ! भारत के मनीषियों ने बड़ी  सहजता के साथ मानव का प्रकृति के साथ तालमेल कैसा हो, आम आदमी को समझाने के लिए धर्म और परम्पराओं से जोड़ कर समझाया ! मसलन तुलसी,नीम,पीपल इत्यादि पौधों की पूजा की जानी चाहिए तथा उस पर रोज जल चढ़ाना चाहिए, रात के समय पत्ते नहीं तोडना चाहिए, घी से हवन करना चाहिए, रात्रि  जल्दी सोना और सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए ! भारत में सामूहिकता का पाठ पढ़ाने के लिए लगभग हर रोज ही कही ना कही कोई ना कोई त्यौहार मनाया ही जाता है ! भारत में प्रकृति को ही देवता माना गया इसके पीछे का भाव  यही है कि प्रकृति हमें कुछ ना कुछ देती ही है और इसलिए इसका स्थान पूजनीय है  ! व्यंग्य में कहा भी जाता है कि जो दे उसे देवता कहा जाता है ! वेदों के देवतागण मुख्यतः अग्निवायुंद्रवरुणमित्रअश्विनीकुमाऋतुमरुत्‌ त्वष्टासोमभुःद्यौःपृथ्वीविष्णुपूषासविताउषाआदित्ययमरुद्रसूर्यबृहस्पतिवाक्‌ालअन्नवनस्पतिपर्वत,पर्जन्यधेनुपितृमृत्युआत्माऔषधिअरण्यश्रद्धाशचि, अदितिहिरण्यगर्भविश्वकर्माप्रजापतिपुरुषआपःश्री ीतासरस्वती इत्यादि थे !


भारतीय चिंतन में मानव प्रकृति से कोई न कोई समबन्ध बना लेता था ! मसलन भूमि को धरती-माँ, नदियों  को, गंगा-माँ, यमुना-माँ  इतना ही नहीं पशुओं को भी पूजा  जाता था जैसे गाय को गऊ-माता इत्यादि कहा जाता है ! भारत में धरती का दोहन किया जाता था कभी शोषण नही किया गया, गाय को दुहा जाता था, उसका मशीन के द्वारा शोषण नहीं किया गया था जो दुर्भाग्य से दुनिया में आज हो रहा है ! 

     

लेकिन आज हम लोग प्रकृति से बहुत दूर हो गए है ! हम अपने सभी पर्वो मे अपनी पूज्य प्रकृति माँ को गन्दा और प्रदूषित करते है. यह एक सांस्कृतिक पतन है. होली मे पानी को, दिवाली मे आकाश और वायु को, गणेश पर्व और नवरात्र पर्व मे विसर्जन के द्वारा अपनी नदियों को. तीर्थ स्थानो मे गंदगी रहती है, और गंगा यमुना आदी नदियों मे तो स्नान करना ही असंभव हो गया है. प्रत्येक पर्व के समय ध्वनि प्रदुषण तो वृद्ध, बीमारों, विद्यार्थियों और एकान्त प्रिय लोगो के लिए नरक तुल्य समय हो जाता है. धर्म हमे सम्वेदनशील बनाने के लिए होता है, लेकिन हम लोग तो सम्वेदानाविहिन होते जा रहे है. अगर हम चेते नही तो हम अपने देश को स्वर्ग नही बल्कि नरक बना देंगे. 

यह स्थिति देख कर हमे कठोपनिषद का वह मंत्र याद आता है की " उत्तिष्ठ जाग्रत ". वह भी विज्ञापन भी बहुत अच्छा था जहाँ पर्यावरण की रक्षा अपने बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रख कर करने के लिए कहा गया था. अगर हमे अपनी संस्कृति से प्रेम है, अगर हम पूर्वजों के प्रति सच्चा आदर करते है तो हम सब को ऐसा देश और समाज बनाने की जरुरत है जहाँ सही मे प्रकृति पूज्य दिखे, जिस हवा मे हमारे बच्चे स्वस्थ रह सके, जहाँ हमारा सच्चा आध्यात्मिक विकास हो सके. अगर हम अपने द्रष्ट पर्यावरण को स्वच्छ नही रख सकते है तो हम अपने मन को कैसे स्वच्छ रख पाएंगे. यह निश्चित रूप से सत्य है की अज्ञान से ही संसार और उसकी समस्याये होती है. वस्तुस्थिथी घोर अज्ञान के अस्तित्व का प्रमाण दे रही है.

ओजोन की परत पर प्रभाव, बढती गरमी के कारण पीछे जाते ग्लेशियर, कम (और ख़त्म) होते जंगल, पक्षी और जानवर, नदियों मे शीघ्र बाढ़ आदि आना, नदियों का प्रदूषित होना, प्रदूषण का आकाश से पाताल तक व्याप्त होना, ज्यादा विकसित स्थानो मे साँस लेना भी मुश्किल होना आदि, सभी बहुत चिन्ता का विषय है. क्या हम सही मे अपनी जन्म भूमि को, जो की हमारी माँ भी है, स्वर्ग से भी महान समझते है ?




- राजीव गुप्ता
   9811558925





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