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रविवार, 31 जुलाई 2011

वर्तमान स्त्री : पूज्या या भोग्या







अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी । ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत !! ऋग्वेद )

( ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है "मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं ! " )

संक्रमण काल के इस दौर में तथाकथित प्रसिद्धि पाने की होड़, प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के नाम पर बदलाव के दहलीज पर खड़े हम स्त्री के उस जाज्वल्यमान आभा की प्रतीक्षा कर रहे है जो सनातन  से ही भारतीय मनीषियों के चिंतन का विषय रहा है ! भारतीय मनीषियों ने सदैव  से ही स्त्री-पुरुष को न केवल एक दूसरे का पूरक माना अपितु मनु स्मृति  में  स्त्री को पूजनीय कहकर समाज में प्रतिष्ठित किया गया !  
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: !
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!
( जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है.
                                        जहां महिलाऑ का अपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं )


.विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कह सकते  है तभी तो  पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित हो रहा है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और  वेद माता गायत्री है !  नारी की महानता  का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-
यद् गृहे रमते नारी लक्ष्‍मीस्‍तद् गृहवासिनी।
देवता: कोटिशो वत्‍स! न त्‍यजन्ति गृहं हितत्।।
( जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते। )

भारत में हमेशा से ही  नारी को उच्च स्थान दिया गया ।  भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख 'श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला  ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ?  किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए  हम सत्यनारायण  भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है ! नारी के प्रति किसी भी प्रकार  के  असम्मान को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है चाहे  नारी शत्रु पक्ष की ही क्यों ना हो  तो भी उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा भारत में है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा भी  है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-
अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्‍या सम ए चारी।।

 इन्‍हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।
(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पापनहीं है।)
    किसी लेखक ने  नारी की महानता की  व्याख्या  करते हुए लिखा है कि  भारत की यह परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को,  विवाह के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को  "ध्रुवतारे" जैसा स्थान प्राप्त हो गया।  "इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती। भारतीय संस्कृति में नारी की पूजा हमेशा होती रहेगी। प्राचीन भारत की नारी समाज में अपना स्थान माँगने नहीं गयी, मंच पर खड़े होकर अपने अभावों की माँग पेश करने की आवश्यकता उसे कभी प्रतीत ही नहीं हुई। और न ही विविध संस्थायें स्थापित कर उसमें नारी के अधिकारों पर वाद-विवाद करने की उसे जरूरत हुई। उसने अपने महत्वपूर्ण क्षेत्र को पहचाना था, जहाँ खड़ी होकर वह सम्पूर्ण संसार को अपनी तेजस्विता, नि.स्वार्थ सेवा और त्याग के अमृत प्रवाह से आप्लावित कर सकी थी। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे? वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि भारतीय नारी ने कभी भी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग नहीं किया नहीं तो आर्य-वर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का ख़त्म हो गया होता।  और तो और इतिहासकारों का भी यही मत है कि प्रायः पुरुष शिकार पर जाते थे और नारी घर पर रहती थी ! कुछ दानो को जमीन पर बिखराकर नारी  ने ही नव-पाषण काल में खेती की खोज कर अस्थायी बस्तियों को स्थाई बनाकर एक क्रांति को जन्म दिया जिसके बाद में ही शहरीकरण की स्थपाना हुई ! अतः यह कहना सही होगा कि प्राचीन काल में भी स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता था ऐसा इतिहासकार भी मानते है ! स्टीफन. आर. कोवे ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक ‘सेवन हैबिट्स आफ हाइली इफेक्टिव पीपल’ के प्रारंभ में लिखा है-”Interdependence is better than Independence.” वास्तव में अंतर्निर्भरता ही जीवन का मूल  है। स्त्री पुरुष के संदर्भ में अंतर्निर्भरता और सहजीवन एक संपूर्ण सत्य है। यह जीवन की स्वाभाविकता का मूल आधार है व  उनकी एकात्मता नैसर्गिक है। गांधी जी का भी यही चिंतन था  कि - ”जिस प्रकार स्त्री और पुरुष बुनियादी तौर पर एक हैं, उसी प्रकार उनकी समस्या भी मूल में एक होनी चाहिए। दोनों के भीतर वही आत्मा है। दोनों एक ही प्रकार का जीवन बिताते हैं। दोनो की भावनाएं एक सी हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों एक-दूसरे की सक्रिय सहायता के बिना जी नहीं सकते। और इस स्त्री, पुरुष नाम के दोनों पहलुओं को एक इकाई की तरह जान लेना, समझ लेना और जीने की कोशिश करना ही विवाह नामक व्यवस्था का उद्देश्य हो सकता है।
परन्तु वर्तमान समय  में पाश्चात्य संस्कृति और  शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में भी नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है।  बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का और इक्कीसवी सदी का यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण का काल है। आजकल मनुष्य जाति के इतिहास में ‘वस्त्र सभ्यता’ ने बड़ी धूम मचा रखा है ! भारत की राजधानी दिल्ली में अभी हाल में ही एक  "बेशर्म मोर्चा" निकाला गया जो कि टोरंटो से शुरू होकर यहाँ पहुंचा था !  शायद किसी दबाव में बदलकर बाद में ये इस मोर्चे का केंद्र-बिदु  "महिला-सशक्तिकरण " हो गया  बहरहाल पहले तो इस मार्च का  उद्देश्य था  कि  " लड़कियों को हर प्रकार के कपडे पहनने की आजादी होनी चाहिए चाहे वो छोटे हो हो अथवा बड़े, पुरुष की नियत में खोट होता है उनके कपड़ों में नहीं !" मुझे समझ नहीं आया कि ये आन्दोलन पुरूषों  की सोच व उनकी गलत मानसिकता के खिलाफ था अथवा उनके परिवार के सदस्य जैसे माता-पिता , भाई-बहन आदि के खिलाफ था जो उनके बाहर निकलने से पहले उनके परिधान को लेकर टोक देते है ! शायद घर में डर-वश कुछ बोल ना पाती हो इसलिए दिल्ली के  जंतर-मंतर पर आ गयी जहा उन्हें मीडिया का अटेंशन तो मिलेगा ही और रविवार छुट्टी का दिन होने के करण  कनाट प्लेस घूमने आये लोगों की भीड़ भी मिलेगी ! 
बाजारवाद का यह मूल मन्त्र है कि "जो दिखता है वो बिकता है !" शायद इसलिए नारी को को लगभग हर विज्ञापन से जोड़ दिया जाता चाहे वो विज्ञापन सीमेंट का हो, चाकलेट का हो, अन्तः वस्त्र का हो,  अथवा किसी मोबाईल के काल रेट का जो दो पैसे में दो लड़कियां पटाने की बात करता है !  और तो और विज्ञापन - क्षेत्र में करियर चमकाने की  स्त्री की लालसा  को आज का बाजार लगभग उसी पुरा  पाषण-काल के दौर में ले जाने को आतुर है जहा लोगों को कपडे का अर्थ तक नहीं पता था पहनने की बात तो दूर की है ! यह कहना कोई  अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आजकल की स्त्री वही कपडे पहनती जो बाजार चाहता था ! एक दिन  मेरे कालेज में एक लड़की एक टी शर्ट पहनकर आई जिस पर यह वाक्य लिखा था- Virginity is not a dignity , It is lack of opportunity. अर्थात  ‘कौमार्य या यौन शुचिता सम्मान की बात नहीं है, यह अवसर की कमी है।’ मैंने सोचा कि आजकल की यह अवधारणा, आंदोलन या क्रांतिकारिता  का रूप भी ले सकती है ! सेक्स और बाजार  के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को पीछे छोड़  दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों अर्थात "एडवरटाइजमेंट"  पर ही निर्भर  है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। यह कहना गलत ना होगा कि स्त्री आज बाजारू संस्कृति का खिलौना मात्र बनकर गयी है जो कि  शरीर  ढंकने, कम ढंकने, उघाड़ने या ओढ़ने पर जोर देता है। आजकल कलंक की भी मार्केटिंग होती है  क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से नारी को  रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। बट्रर्ड रसल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ”विक्टोरियन युग में स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिखता था तो बिजली दौड़ जाती थी, अब स्त्रियां अर्धनग्न घूम रही हैं, कोई बिजली नहीं दौड़ती।” प्रसिद्द नारीवादी विचारक एवं लेखिका सिमोन द बोवुआर का एक प्रसिध्द वाक्य है- ‘स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है।’ मातृत्व की अवधारणा और अन्यायपूर्ण श्रम विभाजन पर सिमोन ने क्रांतिकारी नजरिया प्रस्तुत किया है। उनका मानना था कि स्त्रियोचित प्रकृति स्त्रियों का कोई आंतरिक गुण नहीं है। यह पितृसत्ता द्वारा उन पर विशेष प्रकार की शिक्षा-दीक्षा, मानसिक अनुकूलन और सामाजीकरण के द्वारा आरोपित किया जाता है। सिमोन द बोवुआर कहती हैं, स्त्रियों  का उत्पीड़न हुआ है और स्त्रियां खुद प्रेम और भावना के नाम पर उत्पीड़न की इजाजत देती हैं।” सिमोन के इस नजरिए को क्रांतिकारी नारीवादी सोच (Radical Feminist approach) कहा गया। मगर अपनी प्रसिध्द पुस्तक- ‘द सेकेंड सेक्स’ की अंतिम पंक्ति में सिमोन द बोवुआर यह सदिच्छा व्यक्त करती हैं, ”नि:संदेह एक दिन स्त्री और पुरुष आपसी समता और सह-अस्तित्व की जरूरत को स्वीकार करेंगे।” सिमोन द बोवुआर और जान स्टुअर्ट मिल के विचारों को जानते हुए हमें पश्चिम की औरतों की स्थिति का भी आभास मिलता है जहा भारत के विपरीत कभी  भी सम्मान की दृष्टि से स्त्री को  नहीं देखा गया !  कहा जाता है कि वहां स्त्रियों की स्थिति लगभग दोयम दर्जे की रही है। परन्तु  समस्या तब और जटिल हो जाती है जब नारी की आजादी  का मतलब ‘देह’ को केन्द्र में रखने, उसकी नुमाइश और लेन-देन से समृध्दि, सम्पन्नता, अधिकार एवं वर्चस्व प्राप्त करने तक पहुंच जाता है। आज स्त्री अस्मिता के संघर्ष में ‘दैहिक स्वतंत्रता और पुरुष का विरोध’ ही दो प्रमुख पहलू नजर आते हैं। परिणाम यह हुआ है कि स्त्री देह अब केवल ‘कामोत्तेजना’ नहीं बल्कि ‘काम विकृति’ के लिए भी इस्तेमाल होने लगी है। वह लगभग ‘वस्तु’ के रूप में क्रय-विक्रय के लिए बाजार में मौजूद हो गई है। यह समूची स्त्री जाति का न केवल अपमान है बल्कि यह  दुर्भाग्य भी है कि अब स्त्री की देह ही सब कुछ है। उसकी आत्मा का कोई मूल्य नहीं है। आत्महीन स्त्री की मुक्ति और स्वतंत्रता के मायने क्या हो सकते हैं? कोई किसी तस्वीर या मूर्ति को बेड़ी में बांधकर रखे या हवा में खुला छोड़ दें तो क्या फर्क पड़ने वाला है? पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह कोई पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद का विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है। हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। मुझे कभी कभी डर भी लगता है कहीं  किसी गाने की ये पंक्तियाँ " औरत ने जन्म दिया पुरुषो को , पुरुषों ने उसे बाज़ार दिया " सच ना साबित हो जाय ! औरत की देह इस समय दूरदर्शन के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है।  
केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही  जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है। भोग और कामोपभोग से तृप्ति  उसे कभी नहीं मिलती है ! गांधीजी का चिंतन था कि  - ”अगर  स्त्री और पुरुष के संबंधों पर स्वस्थ और शुध्द दृष्टि से विचार किया जाय  और भावी पीढ़ियों के नैतिक कल्याण के लिए अपने को ट्रस्टी माना जाय  तो आज की मुसीबतों के बड़े भाग से बचा जा  सकता  हैं।” फिर यौनिक स्वतंत्रता का मूल्य क्या है, यह केवल स्वच्छंदता और नासमझी भरी छलांग हो सकती है, अस्तित्व का खतरे में पड़ना जिसका परिणाम होता है। इसी तरह यौन शुचिता या कौमार्य का प्रश्न भी है। यह केवल स्त्रियों के लिए नहीं होना चाहिए। यह जरूरी है कि पारस्पारिक समर्पण एवं निष्ठा से चलने वाले वैवाहिक या प्रतिबध्द जीवन के लिए दोनो ओर से संयम का पालन हो। और इसकी समझ स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से अनिवार्य एवं आवश्यक हो। पुरुष को भी संयम एवं संतुलन के लिए प्रेरित करने में स्त्री की भूमिका सदा से रही है। इसलिए स्त्री संयम की अधिष्ठात्री है। उसे स्वाभाविक संयम एवं काम प्रतिरोध की क्षमता प्राकृतिक रूप से भी उपलब्ध है। सिमोन द बोवुआर ने भी स्त्री की संरचना में उसकी शिथिल उत्तेजकता को स्वीकार किया है। यह भी पारस्परिकता का एक महत्वपूर्ण बिंदु है। यौन शुचिता जीवन के रक्षण का ही पर्याय है और यौन अशुचिता नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से भी हमें विनष्ट करती है। संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है। कहावत भी है- ‘सब्र का फल मीठा होता है।’  इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो  भागता है सुगंध के लिए परन्तु  अतृप्त हो कर थक जाता है । सुगंध स्वयं उसके भीतर है। उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है। देह तो एक चारदीवारी है,  एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है । भवन को अस्तित्व मान लेना भ्रांति है। और भवन  पर पेंट कर,  रंग-रोगन कर उसे चमका लेना भी क्षणिक आनंद भर मात्र  है। उससे दुनिया जहान को भरमा लेना भी कुछ देर का खेल तमाशा है। भवन  को गिरना है आज नहीं तो कल , यही सत्य है ।
वर्तमान दौर में नारी को उसे आधुनिक समाज ने  स्थान अवश्य दिया  है पर वह दिया  है लालसाओं की प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं। अवश्य ही सांस्कृतिक-परिवर्तन के साथ हमारे आचार-विचार में और हमारे अभाव-आवश्यकताओं में परिवर्तन होना अनिवार्य है। परन्तु जीवन के मौलिक सिद्धान्तों से समझौता कदापि ठीक नहीं। एक लेखक ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूंजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है। परन्तु पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ‘ कामायनी ‘ का रचनाकार ” नारी तुम केवल श्रृद्धा हो” से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-” स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ ” उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋग्वेद ) !

एक लेखक ने भारत  में वर्तमान समय में स्त्री की स्थिति  का चित्रण करते हुए लिखा है कि अब स्त्रियां गांव, चौपाल, गलियों, सड़कों, बाजारों से लेकर स्कूल-कालेज, छोटे-बड़े दफ्तरों और प्रतिष्ठानों, सभी जगह पर निर्द्वन्द्व रूप से अपनी सार्थक एवं सशक्त उपस्थिति से सबको चमत्कृत कर रही हैं। कांग्रेस में श्रीमति सोनिया गांधी सर्वोच्च पद पर पहुंची जिनके हाथ में अघोषित तौर पर देश की बागडोर रहने के आरोप लगते रहे हैं। बाद में देश को 2007 में पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल मिलीं। इसके उपरांत लोकसभा में पहली महिला अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार भी मिल गईं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी श्रीमति सुषमा स्वराज हैं। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री साठ के दशक में सुचिता कृपलानी थीं। इसके बाद उड़ीसा में नंदिनी सत्पथी मुख्यमंत्री बनीं। मध्य प्रदेश में उमा भारती भी मुख्यमंत्री रहीं। सत्तर के दशक में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी की शशिकला काकोडकर ने केंद्र शासित प्रदेश गोवा में मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। अस्सी के दशक मंे अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनीं तो इसी दौर में तमिलनाडू में एम.जी. रामचंद्रन की पत्नि जानकी रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सुषमा स्वराज दिल्ली, राबड़ी देवी बिहार, वसुंधरा राजे राजस्थान तो राजिन्दर कौर भट्टल पंजाब में सफल मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।
वर्तमान में दिल्ली की गद्दी श्रीमति शीला दीक्षित, उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती हैं। अब आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो तमिलनाडू मंे जयललिता मुख्यमंत्री बन महिला शक्ति को साबित करने वाली हैं। 2004 के बाद यह दूसरा मौका होगा जब देश के चार सूबों में महिला मुख्यमंत्री आसीन होंगी। इसक पूर्व 2004 में एमपी में उमा भारती, राजस्थान में वसुंधरा राजे, दिल्ली में शीला दीक्षित तो तमिलनाडू में जयललिता मुख्यमंत्री थीं। 1236 में रजिया सुल्तान की ताजपोशी से आरंभ हुआ लेडी पावर का सिलसिला 775 सालों बाद 2011 में भी बरकरार है। आने वाले साल दर साल यह और जमकर उछाल मारेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एसी मातृ शक्ति को समूचा भारत वर्ष नमन करता  है !
महिलाओ के बगैर यह श्रृष्टि अधूरी है ! नारी न सिर्फ जननी है  बल्कि भाग्य विधाता भी है ! पूरे परिवार की नीवं एक नारी ही है ! किसी ने सच ही  कहा है कि -  
माँ बनके ममता का सागर लुटाती हो,
बहन हो हक और स्नेह जताती हो, 
पत्नी बन जीवनभर साथ निभाती हो,
बन बेटी, खुशी से दिल भर जाती हो, 
तुम में अनंत रूप, असंख्य रंग हैं ...
 हर मोड़ पे साथ निभाती हो !
तुमसे है घर-द्वार, तुमसे संसार है, 
सृष्टि भी बिना तुम्हारे लाचार है, 
गुस्सा है तुम से और तुम से ही प्यार है, 
हो साथ तुम तो क्या जीत क्या हार है,
बिना तुम्हारे न रहेगी ये दुनिया ...
तुम्हारे ही कंधो पर सृष्टि का भार है !
इतिहास में मैंने पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी. तब महिलाओं की तूती बोलती थी. फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले ! मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी ! आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सबकुछ नहीं होने लगा है.  उदहारण के लिए आर्टिकल 498 - A को भला आज कौन नहीं जानता ?  भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जा सकता है ! लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता. लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा. कभी हम मरेंगें, कभी तुम मरोगे !  
समय करवट ले रहा है ! विचारक  ‘जोड’ ने एक पुस्तक में लिखा है- ”जब मैं जन्मा था तब पश्चिम में होम्स थे, अब हाउसेस रह गए हैं क्योंकि पश्चिमी घरों से स्त्री खो गई है।” कही यह दुर्गति भारत की भी ना हो जाय क्योंकि  भारत  में यदि भारतीय संस्कृति  यहाँ का धर्म और विचार अगर बचा है तो नारी की बदौलत ही  बचा है !  अतः नारी  को इस पर विचार करना चाहिए !  कही देर ना हो जाय अतः इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय यही है कि नारी अब अन्धानुकरण का त्याग कर ,भोगवादी व बाजारवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे। अपनी लाखों , करोड़ों पिछड़ी अनपढ़ बेसहारा बहनों के दुखादर्दों को बांटकर उन्हें शैक्षिक , सामाजिक, व आर्थिक स्वाबलंबन का मार्ग दिखाकर सभी को अपने साथ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना सिखाये । तभी सही अर्थों में  नारी इक्कीसवीं सदी की समाज की नियंता हो सकेगी । अब स्त्री को खुद को सोचना है कि वह कैसे स्थापति होना  चाहती है पूज्या बनकर या भोग्या बनकर !

- राजीव गुप्ता
9811558925  



गुरुवार, 21 जुलाई 2011

प्रकृति : भारतीय चिंतन





यत्र वेत्थ वनस्पते देवानां गृह्य नामानि !
तत्र हव्यानि गामय !!
                                                    ( हे  वनस्पते ! हे आनंद के स्वामी !  जहां तुम  दोनों के गुह्य नामों को जानते हो, वहां, उस लक्ष्य तक हमारी भेटों को ले जाओ ! )
या आपो दिव्या उत वा स्रवंति खनित्रिमा उत वा याः स्वयंजाः ! 
समुदार्था  याः  शुचयः पवाकस्ता आपो देवीरिः मामवन्तु  !!
                                             ( दिव्य जल जो या तो खोदी हुई या स्वयं बहती हुई नहरों में बहता है, जिनकी गति समुद्र की ओर है, जो पवित्र है, वह दिव्य जल मेरी पालना करे ! )

ऋग्वेद की इन श्रुतियों से हम यह कह सकते है हमारे पूर्वजों का प्रकृति के प्रति कितना गहरा  चिंतन ना केवल था अपितु प्रकृति को वो परमपिता परमेश्वर की  अर्धांगिनी मानकर उसके साथ दैनिक दिनचर्या में तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास भी करते थे ! 
                                                                
                                                                                       नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे, सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया !
                                           गृहीतशक्तित्रितयाय देहीनामन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने !! (श्रीमदभागवतमहापुराण- द्वितीय स्कंध - 12 ) 
       
( उन पुरुषोत्तम भगवान् के चरण कमलों में कोटि-कोटि प्रणाम है, जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय की लीला करने के लिए सत्त्व, रज, तथा तमो गुण रूप तीनो शक्तियों को स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का रूप धारण करते है, जो समस्त चर-अचर प्राणियों के ह्रदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान है , जिनका स्वरुप और उसकी उपलब्धि का मार्ग बुद्धि के विषय नहीं है, जो स्वयं अनंत है तथा जिनकी महिमा भी अनंत है ! ) 
गायन्त्य ..........बिभ्रत्युत्पुल कान्यहो !!     
                                                                                                    ( श्रीमदभागवतमहापुराण- दशम स्कंध, तीसवां अध्याय ,  4 - 13 ) 

( भगवान् श्री कृष्ण के विरह में गोपियाँ वनस्पतियों से , पेड़-पौधों से जैसे पीपल,पाकर,बरगद,कुरबक,अशोक,नागकेशर,पुन्नाग,चंपा,तुलसी,मालती,मल्लिके,जाती,जूही,रसाल,परियल,कटहल,
पीतशाल,कचनार,जामुन,आक,बेल,मौलसिरी,आम,कदम्ब,नीम,पृथ्वी आदि-आदि ! )

भगवान् कृष्ण के अंतर्ध्यान होने पर व्याकुल गोपियों ने उपरलिखित प्रकृति के निम्नलिखित घटकों से भगवान् श्री कृष्ण का पता पूछा !   
                                                                                          
                                                                                           लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद  पेखि !
                                                      गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुं देखि !! ( तुलसी कृत रामचरितमानस, किष्किन्धा काण्ड, दोहा - 13 )   
(श्री राम जी कहतें है कि हे लक्ष्मण ! देखों, मोरों के झुण्ड बादलों को देखकर नाच रहें है ! जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णु भक्त को देखकर हर्षित होतें है !! )
 और तो और पूरी रामचरितमानस में प्रकृति का वर्णन विशेष रूप से किष्किन्धा काण्ड में पूरा का पूरा वर्षा-ऋतु और शरद-ऋतु का वर्णन मिल जायेगा !        

हिन्दू धर्म और प्रकृति को अगर एक दूसरे का प्रयायवाची कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! हिंदू धर्म, प्रकृति की गोद मे बना और खिला है ! सभी मनीषियों का तप स्थल प्रकृति की गोद ही रही है ! गुरुकुल हमेशा प्रक्रति के बीच ही होते थे ! मसलन चाहे भगवान् राम हो अथवा भगवान् कृष्ण सबको शिक्षा लेने के लिए गुरुकुल में ही जाना पड़ा था ! वेद और अन्य शास्त्र के मंत्र इसकी स्तुति करते रहे है ! प्रकृति इतनी पूज्य है की इसको परमात्मा की अर्धांगिनी की तरह से न केवल देखा जाता है अपितु पृथ्वी को भगवान् विष्णु की पत्नी ( समुद्रवसने देवी ...विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं....) मना जाता है ! आकाश,वायु,जल,अग्नि, भूमि ये पांच महाभूत ( प्रकृति पञ्चभूतानि  ग्रहालोका स्वरास्तथा .....)  तो सृष्टि के ही अंश है ! गीता मे भगवान श्री कृष्ण विश्व को ही अपना रूप बताते है ! 


इतिहासकार भी लिखते है कि सिन्धु घटी के धर्म में पवित्र पशुओं का का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है ! मसलन "बृषभ" का चित्र जो कि अधिकांश जगह अंकित है , उसके द्वारा खाया  जा रहा अन्न उत्सव का द्योतक है ! पीपल नाम के वृक्ष की पूजा उस समय भी होती थी और आज भी होती है ! मौर्य सम्राट अशोक बाद के अपने शासन कल में पूर्णतः अहिंसा का पुजारी बन गया था, जिसका उल्लेख कई इतिहासकारों ने अपने कृति में भी किया है !

                                                                          

                                                                         इन्द्रानियल मार्काणामग्नेश्य वरुणस्य च !

चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतिः !! ( मनुस्मृति )  

                                                  

                                              ( इंद्र , अनिल, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र, धनस्वामी कुबेर के शाश्वत सारभूत अंशों से राजा की सृष्टि की ! ) 


मनुस्मृति के इस श्लोक में भी प्रकृति की महत्ता देखी जा सकती है ! 


भारत में आज भी जितने तीर्थ स्थल है अधिकांशतः प्रकृति की गोद में ही है ! भारत के मनीषियों ने बड़ी  सहजता के साथ मानव का प्रकृति के साथ तालमेल कैसा हो, आम आदमी को समझाने के लिए धर्म और परम्पराओं से जोड़ कर समझाया ! मसलन तुलसी,नीम,पीपल इत्यादि पौधों की पूजा की जानी चाहिए तथा उस पर रोज जल चढ़ाना चाहिए, रात के समय पत्ते नहीं तोडना चाहिए, घी से हवन करना चाहिए, रात्रि  जल्दी सोना और सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए ! भारत में सामूहिकता का पाठ पढ़ाने के लिए लगभग हर रोज ही कही ना कही कोई ना कोई त्यौहार मनाया ही जाता है ! भारत में प्रकृति को ही देवता माना गया इसके पीछे का भाव  यही है कि प्रकृति हमें कुछ ना कुछ देती ही है और इसलिए इसका स्थान पूजनीय है  ! व्यंग्य में कहा भी जाता है कि जो दे उसे देवता कहा जाता है ! वेदों के देवतागण मुख्यतः अग्निवायुंद्रवरुणमित्रअश्विनीकुमाऋतुमरुत्‌ त्वष्टासोमभुःद्यौःपृथ्वीविष्णुपूषासविताउषाआदित्ययमरुद्रसूर्यबृहस्पतिवाक्‌ालअन्नवनस्पतिपर्वत,पर्जन्यधेनुपितृमृत्युआत्माऔषधिअरण्यश्रद्धाशचि, अदितिहिरण्यगर्भविश्वकर्माप्रजापतिपुरुषआपःश्री ीतासरस्वती इत्यादि थे !


भारतीय चिंतन में मानव प्रकृति से कोई न कोई समबन्ध बना लेता था ! मसलन भूमि को धरती-माँ, नदियों  को, गंगा-माँ, यमुना-माँ  इतना ही नहीं पशुओं को भी पूजा  जाता था जैसे गाय को गऊ-माता इत्यादि कहा जाता है ! भारत में धरती का दोहन किया जाता था कभी शोषण नही किया गया, गाय को दुहा जाता था, उसका मशीन के द्वारा शोषण नहीं किया गया था जो दुर्भाग्य से दुनिया में आज हो रहा है ! 

     

लेकिन आज हम लोग प्रकृति से बहुत दूर हो गए है ! हम अपने सभी पर्वो मे अपनी पूज्य प्रकृति माँ को गन्दा और प्रदूषित करते है. यह एक सांस्कृतिक पतन है. होली मे पानी को, दिवाली मे आकाश और वायु को, गणेश पर्व और नवरात्र पर्व मे विसर्जन के द्वारा अपनी नदियों को. तीर्थ स्थानो मे गंदगी रहती है, और गंगा यमुना आदी नदियों मे तो स्नान करना ही असंभव हो गया है. प्रत्येक पर्व के समय ध्वनि प्रदुषण तो वृद्ध, बीमारों, विद्यार्थियों और एकान्त प्रिय लोगो के लिए नरक तुल्य समय हो जाता है. धर्म हमे सम्वेदनशील बनाने के लिए होता है, लेकिन हम लोग तो सम्वेदानाविहिन होते जा रहे है. अगर हम चेते नही तो हम अपने देश को स्वर्ग नही बल्कि नरक बना देंगे. 

यह स्थिति देख कर हमे कठोपनिषद का वह मंत्र याद आता है की " उत्तिष्ठ जाग्रत ". वह भी विज्ञापन भी बहुत अच्छा था जहाँ पर्यावरण की रक्षा अपने बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रख कर करने के लिए कहा गया था. अगर हमे अपनी संस्कृति से प्रेम है, अगर हम पूर्वजों के प्रति सच्चा आदर करते है तो हम सब को ऐसा देश और समाज बनाने की जरुरत है जहाँ सही मे प्रकृति पूज्य दिखे, जिस हवा मे हमारे बच्चे स्वस्थ रह सके, जहाँ हमारा सच्चा आध्यात्मिक विकास हो सके. अगर हम अपने द्रष्ट पर्यावरण को स्वच्छ नही रख सकते है तो हम अपने मन को कैसे स्वच्छ रख पाएंगे. यह निश्चित रूप से सत्य है की अज्ञान से ही संसार और उसकी समस्याये होती है. वस्तुस्थिथी घोर अज्ञान के अस्तित्व का प्रमाण दे रही है.

ओजोन की परत पर प्रभाव, बढती गरमी के कारण पीछे जाते ग्लेशियर, कम (और ख़त्म) होते जंगल, पक्षी और जानवर, नदियों मे शीघ्र बाढ़ आदि आना, नदियों का प्रदूषित होना, प्रदूषण का आकाश से पाताल तक व्याप्त होना, ज्यादा विकसित स्थानो मे साँस लेना भी मुश्किल होना आदि, सभी बहुत चिन्ता का विषय है. क्या हम सही मे अपनी जन्म भूमि को, जो की हमारी माँ भी है, स्वर्ग से भी महान समझते है ?




- राजीव गुप्ता
   9811558925





बुधवार, 20 जुलाई 2011

लोकतंत्र : चुनौतियाँ और समाधान




                                                 
              
                                                                           

समानो मन्त्रः समिति समान
  समानं मनः सह चित्तमेषाम !
            समानं मंत्राभिः मन्त्रये वः 
            समानेन वो हविषा जुहोनि !!     
लोगों का लक्ष्य और मन समान हो , तथा वे समान मन्त्र से, समान  यज्ञों के पदार्थों से ईश्वर का मनन करें ! ऋग्वेद और अथर्ववेद के इन सूक्तियों में कुछ हद तक  हम लोकतंत्र ( समानता की बात की गयी है ) की पृष्ठभूमि देख सकते हैं ! एक पुस्तक में मैंने पढ़ा कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहमलिंकन की परिभाषा के अनुसार - लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन - प्रामाणिक मानी जाती है। लोकतंत्र में जनता ही सत्ताधारी होती है, उसकी अनुमति से शासन होता है, उसकी प्रगति ही शासन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता है। परंतु लोकतंत्र केवल एक विशिष्ट प्रकार की शासन प्रणाली ही नहीं है वरन् एक विशेष प्रकार के राजनीतिक संगठन, सामाजिक संगठन, आर्थिक व्यवस्था तथा एक नैतिक एवं मानसिक भावना का नाम भी है। लोकतंत्र जीवन का समग्र दर्शन है जिसकी व्यापक परिधि में मानव के सभी पहलू आ जाते हैं। लोकतंत्र की आत्मा जनता की संप्रभुता है जिसकी परिभाषा युगों के साथ बदलती रही है। इसे आधुनिक रूप के आविर्भाव के पीछे शताब्दियों लंबा इतिहास है। यद्यपि रोमन साम्राज्यवाद ने लोकतंत्र के विकास में कोई राजनीतिक योगदान नहीं किया, परंतु फिर भी रोमीय सभ्यता के समय में ही स्ताइक विचारकों ने आध्यात्मिक आधार पर मानव समानता का समर्थन किया जो लोकतंत्रीय व्यवस्था का महान् गुण है। सिसरो, सिनेका तथा उनके पूर्ववर्ती दार्शनिक जेनों एक प्रकार से भावी लोकतंत्र की नैतिक आधारशिला निर्मित कर रहे थे। मध्ययुग में बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी से ही राजतंत्र विरोधी आंदोलन और जन संप्रभुता के बीज देखे जा सकते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण एवं धर्मसुधार आंदोलन ने लोकतंत्रात्मक सिद्धांतों के विकास में महत्वपूर्ण योग दिया है। इस आंदोलन ने व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर जोर दिया तथा राजा की शक्ति को सीमित करने के प्रयत्न किए। लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को स्थिर करने में चार क्रांतियों, 1688 की इंगलैंड की रक्तहीन क्रांति, 1776 की अमरीकी क्रांति, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति का बड़ा योगदान है। इंगलैंड की गौरवपूर्ण क्रांति ने यह निश्चय कर दिया कि प्रशासकीय नीति एवम् राज्य विधियों की पृष्ठभूमि में संसद् की स्वीकृति होनी चाहिए। अमरीकी क्रांति ने भी लोकप्रभुत्व के सिद्धांत का पोषण किया। फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत को शक्ति दी। औद्योगिक क्रांति ने लोकतंत्र के सिद्धांत को आर्थिक क्षेत्र में प्रयुक्त करने की प्रेरणा दी। आजकल सामान्यतया दो प्रकार के परंपरागत लोकतंत्रीय संगठनों द्वारा जनस्वीकृति प्राप्त की जाती है - संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक। संसदात्मक व्यवस्था का तथ्य है कि जनता एक निश्चित अवधि के लिए संसद् सदस्यों का निर्वाचन करती है, जिस व्यवस्था को भारत ने अपनाया हुआ है ! संसद् द्वारा मंत्रिमंडल का निर्माण होता है। मंत्रिमंडल संसद् के प्रति उत्तरदायी है और सदस्य जनता के प्रति उत्तरदायी होते है। अध्यक्षात्मक व्यवस्था में जनता व्यवस्थापिका और कार्यकारिणी के प्रधान राष्ट्रपति का निर्वाचन करती है। ये दोनों एक दूसरे के प्रति नहीं बल्कि सीधे और अलग अलग जनता के प्रति विधिनिर्माण तथा प्रशासन के लिए क्रमश: उत्तरदायी हैं। इस शासन व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्र का प्रधान (राष्ट्रपति) ही वास्तविक प्रमुख होता है।  इस प्रकार लोकतंत्र में समस्त शासनव्यवस्था का स्वरूप जन सहमति पर आधारित मर्यादित सत्ता के आदर्श पर व्यवस्थित होता है। लोकतंत्र केवल शासन के रूप तक ही सीमित नहीं है, वह समाज का एक संगठन भी है। सामाजिक आदर्श के रूप में लोकतंत्र वह समाज है जिसमें कोई विशेषाधिकारयुक्त वर्ग नहीं होता और न जाति, धर्म, वर्ण, वंश, धन, लिंग आदि के आधार पर व्यक्ति व्यक्ति के बीच भेदभाव किया जाता है। वास्तव में इस प्रकार का लोकतंत्रीय समाज ही लोकतंत्रीय राज्य का आधार हो सकता है।
राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए उसका आर्थिक लोकतंत्र से गठबंधन आवश्यक है। आर्थिक लोकंतत्र का अर्थ है कि समाज के प्रत्येक सदस्य को अपने विकास की समान भौतिक सुविधाएँ मिलें। लोगों के बीच आर्थिक विषमता अधिक न हो और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण न कर सके। एक ओर घोर निर्धनता तथा दूसरी ओर विपुल संपन्नता के वातावरण में लोकतंत्रात्मक राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है। 
 
नैतिक आदर्श एवं मानसिक दृष्टिकोण के रूप में लोकतंत्र का अर्थ मानव के रूप में मानव व्यक्तित्व में आस्था है। क्षमता, सहिष्णुता, विरोधी के दृष्टिकोण के प्रति आदर की भावना, व्यक्ति की गरिमा का सिद्धांत ही वास्तव में लोकतंत्र का सार है।


हम भारतवासियों का सौभाग्य रहा है कि स्वतंत्रता की प्रभात - वेला में हमें ऐसे देश भक्त नेता मिले जो देश के लिए समर्पित के साथ साथ उच्च कोटि के भी  थे ! समय ने करवट बदला ! भारत ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का लिखित संविधान है ! परन्तु अब भारत जिसने हर संकट की घड़ी में बिना धैर्य खोये हर मुसीबत का सामना किया, अनेकों बुराइयों से जकड गया मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, जातिवाद, सत्ता लोलुपता के लिए सस्ती राजनीति करना जो कि कभी कभी सामाजिक वैमनष्य के साथ साथ देश की एकता को ही संकट में डाल देता है , राजनीति में वंशवाद व भाई-भतीजावाद, न्यायिक प्रक्रिया में विलम्ब आदि-आदि ! एक पुस्तक 'भारतीय राजनीति सिद्धांत समस्याएं और सुधार" में मैंने पढ़ा भी है कि राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग ने सिविल  और न्यायिक प्रशासन के बारे में कहा है कि प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, उदासीनता और अक्षमता ने गैर-कानूनी प्रणालियों, सामानांतर अर्थ-व्यवस्थाओं और सामानांतर सरकारों तक को जन्म दिया है ! नौकरशाही के भ्रष्टाचार और चालबाजियों ने लोगों के दैनिक जीवन में निराशा घोल दी है ! वें कानून की सीमाओं को लाघने लगे है ! कुशासन ने न्याय-तंत्र की निष्पक्षता में लोगों की आस्था हिला दी है ! इस कारण लोगो का अब लोकतंत्र की संस्थाओं में अविश्वास और मोहभंग हो गया है ! लोगों की जबाबदेही की प्रकृति घटती जा रही है ! भ्रष्टाचार का चारों ओर बोल-बाला है ! सार्वजानिक हित को चोट पहुची है ! अनुच्छेद 311 ने सेवाओं संविधानिक सुरक्षा प्रदान की है ! बेईमान आधिकारियों ने अपने गलत कामों के परिणामों से बचने के लिए इस अनुच्छेद की आड़ ली है ! न्याय-व्यवस्था ने समाज की साधारण आशाओं तक को पूरा नहीं किया है ! लोगों को न्याय पाने में. अत्यधिक देरी लग जाती है और उनका खर्च भी अंधाधुंध हो जाता है ! न्याय - प्रक्रिया धीमी है और उसमे अनेक दांव - पेच है ! यह कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा स्थापित लोकतंत्रात्मक राज्य-व्यवस्था पर भारी दबाव है ! संविधान निर्माताओं का स्वप्न भंग हो चुका है ! संविधान में निर्दिष्ट आधारभूत मूल्य और आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई है ! राजनीतिक व्यवस्था  में अनेक विकृतियों का समावेश हुआ है ! राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण , बाहुबल, धनबल, और माफिया शक्ति के बढ़ते हुए महत्त्व, राजनीतिक जीवन में जातिवाद, साम्प्रदायिकता तथा भ्रष्टाचार के प्रभाव ने राजनीतिक परिदृश्य को विषाक्त कर दिया है ! भारत में आजादी के इतने वर्ष बाद अभी भी गरीब और  अशिक्षित है जो कि एक कलंक के समान है ! खंडित समाज में राष्ट्र की एकता, राष्ट्रीय अखंडता या भारतीय अस्मिता राजनीतिक मंचो से बोले जाने वाले नारे-मात्र सिद्ध हुए है ! राजनीति अब एक व्यवसाय बन गयी है ! सभी जीवन मूल्य बिखर गए है ! धन तथा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए सत्ता का अर्जन सर्वोच्च लक्ष्य बन गया है ! अब राजनीतिक  पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग बंद सा हो गया है ! जिसके कारण गठबंधन सरकारे अस्तित्व में आ गयी ! परिणामतः इच्छा शक्ति में कमी के साथ साथ नेतृत्व क्षमता भी प्रभावित हो रही है और दुहाई गठबंधन की मजबूरी  की दी जाती है ! राजनीतिक  नेता सत्ता हथियाने के लिए आपस में संघर्ष करने लगे है ! समाज में विघटनकारी  तत्वों की बन आई है ! प;रतिस्पर्धाओं और भ्रष्टाचारों का वर्चस्व स्थापित हो गया है ! जो पहले सांस्कृतिक, धार्मिक, या भाषाई समूह थे, वे अब राजनीतिक अल्पसंख्यक वर्ग, अथवा, जातीय-राष्ट्रीय समूह बन गए ! धर्म, जाति, उपजाति, भाषा, प्रदेश ये सब राजनीतिज्ञों के सत्ता पाने की लालसा की कठपुतलियाँ बन गयी है ! कभी-कभी  तो ऐसा लगता है कि देश के लिए गर्व का ये मुहावरा "विविधता में एकता" जो भारत के लिए प्रयोग किया जाता है कही राजनीतिज्ञों को दु-राजीनति करने का हथियार तो नहीं है ? सभी राजनीतिक दलों और व्यावसायिक राजनीतिज्ञों ने अनुभव किया कि सत्त्मूलक राजनीति के खेल और निर्वाचकीय लड़ाईयों में सफलता पाने के लिए जातीय-सांप्रदायिक, कबाइली और भाषाई भेदभावों को बढ़ावा देना है ! राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता के व्यापारियों के लिए मूल्यवान वस्तु है वोटों का गणित जिसके लिए वो  धर्म,जाति,भाषा,प्रदेश आदि के नाम पर फूट डालकर एकता को खंडित करने से भी नहीं चूकते ! राजनीति के खिलाड़ी सत्ता की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए है कि उनके लिए विकास,जनसेवा अथवा राष्ट्र-निर्माण की बात करना बेईमानी है ! संसदीय शासन-प्रणाली के अंतर्गत सत्ता के दलालों और वोट के व्यापारियों की बन आई ! अभी हाल में ही संसद के अन्दर हुए "वोट के बदले नोट" काण्ड इसका प्रत्यक्ष उदहारण है ! रोम साम्राज्य के इतिहासकार एडबर्ड गिबन से कहा गया था कि वे अपनी रचनाओं को एक वाक्य में प्रस्तुत करे ! गिब्बा थोड़ी देर में चुप रहे और बोले कि रोम के लोग और उनके नेता रोम के सेवा में अपना सर्वश्रेष्ठ  देने के लिए तैयार थे तब रोम ने अपूर्व उन्नति की, और जब रोम के लोग और उनके नेता ने रोम से ज्यादा से ज्यादा लेने के लिए तैयार हो गए तब, रोम का पतन हो गया ! तभी तो  चिंतन करने के पश्चात  "देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें" किसी ने कहा होगा !  कौटिल्य  ने अपने अर्थशास्त्र में यहाँ तक कह दिया है कि "जिस तरह पानी में तैरती हुई मछली के बारे ये नहीं कहा जा सकता कि वो पानी पी रही है कि नहीं ठीक उसी तरह सरकारी काम में लगे हुए कर्मचारियों के बारे में भी यह नहीं पता लगाया जा सकता कि वो भ्रष्ट है या नहीं !" कौटिल्य ने भ्रष्ट कर्मचारियों द्वारा बेईमानी से अर्जित किये  हुए धन को जब्त कर उन्हें स्थानांतरित कर उन्हें  दूसरे काम में लगाया जाने की बात भी कही है ! परन्तु भारतवर्ष  में किसी कि क्या मजाल जो भ्रष्टाचार  के खिलाफ तथा व्यवस्था परिवर्तन की  बात करे  ! अभी हाल ही में अन्ना हजारे जी व बाबा रामदेव के नेतृत्व में हुए आन्दोलन इसका प्रत्यक्ष उदहारण है !  हालाँकि संविधान  के कार्यकारण की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग ने जिसमे 31 मार्च ,2002 को अपनी रिपोर्ट पेश की, उसमे यह शिफारिश की गयी कि सरकारी कर्मचारियों के द्वारा  अर्जित संपत्ति को जब्त कर लिया जाय, परन्तु अब वह रिपोर्ट संभवतः ठन्डे बसते में चली गयी होगी ! डा. राधाकृषण ने 14 -15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को बोलते हुए कहा था कि " जब तक हम ऊंचे स्थानों में भ्रष्टाचार को नष्ट नहीं करेंगे, पक्षपात, सत्ता-लोलुपता,मुनाफाखोरी और कालाबाजारी को जिसने पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश की कीर्ति को कलंकित कर रखा है, जडमूल से नहीं मिटायेंगे, तब तक हम प्रशासन, उत्पादन, और जीवन की आवश्यक वस्तुओं के वितरण में कुशलता नहीं ला सकेंगे !" ये शब्द वर्तमान समय में और भी ज्यादा महत्व रखते है ! पूर्व राष्ट्रपति के.आर.नारायणन  ने सार्वजानिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए कहा था कि पहले सार्वजानिक पड़ एक पवित्र-स्थान समझा जाता था ! लेकिन अब वह "अधिक से अधिक पदाधिकारियों तक के लिए पैसा कमाने और सत्ता हथियाने का साधन बन गया है !" यह कटु सत्य है कि हमारा समाज स्वयं भ्रष्ट हो गया है ! भ्रष्टाचार उसकी शायद  नितांत  आवश्यकता बन गया है ! लोगों के मन में भ्रष्टाचार एक जीवन पद्धति के रूप में अंकित हो गया है और उसे विकास का प्रेरक माना जाने लगा है ! उदहारण के लिए आजकल रिश्ते के लिए जब लड़के वालों से उसकी जीविका के बारे में  पूछा जाता है तो बड़े सहज रूप से बखान करते हुए कहते है  कि साहब तनख्वाह 10,000 हजार रुपये है और ऊपर की कमाही भी लगभग इतनी ही है ! आजकल स्कूल में नर्सरी में  दाखिले से लेकर एम्स जैसी संस्थान में एम्.डी. की पढाई तक घूसखोरी का बोलबाला है और तो और  परीक्ष से पहले ही परीक्षा पत्र लीक हो जाते है  जिसका खुलासा अभी हाल में ही मीडिया ने कई बार किया है ! यह कहना कोई हास्यापद नहीं होगा कि अब भारतीय लोकतंत्र का अर्थ है भ्रष्ट लोगों का, भ्रष्ट लोगो द्वारा, भ्रष्ट लोगों के लिए शासन मात्र राह गया है ! भारतीय चिंतन वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ अब ये हो गया  है कि पूरा संसार एक मंडी अथवा बाजार  से ज्यादा कुछ नहीं है जहा सब कुछ खरीदा व बेचा जाता है ! अब तो राजनेताओं के लिए घोटाले करना उनकी शान की बात बन गयी है !
    अदालतों में मुक़दमे निपटने में देरी गंभीर चिंता का विषय बन गया है ! लम्बी छुट्टियों  की वजह से तो न्याय में देरी होती है, व्यर्थ की मुकुदमेबाजी और वकीलों की आये दिन की हड़तालें भी अदालतों के काम को प्रभावित करती है ! कभी कभी तो अनेक आरोपी पुलिस हिरासत में ही दम तोड़ देते है अथवा सजा से ज्यादा समय वो कैद में ही बिता देते है ! प्रभावशाली व्यक्तियों को भ्रष्टाचार या हत्या, बलात्कार, अपहरण, तस्करी जसी संगीन अपराधों के लिए भी दंड नहीं मिलता ! इनके मुकुदमें  ज्यादा से ज्यादा दिनों तक चले बस यही कोशिश रहती है, और बाद में साक्ष्य के आभाव में या किसी और के आभाव में ये बेदाग छोट जाते है ! आदालतों में पैसा पानी की तरह बहता है जो कि आम आदमी के बूते की बात नहीं है ! वकील भारी फीस लेते है और वह भी नगद ! 
यदि हर स्तर पर सामूहिक कोशिश की जाय तो अनेक समस्याओं  से और इन चुनौतियों  से  निजात पाया जा सकता है ! भारत में सबसे अधिक जनसँख्या युवाओं की है ! वो ही देश का भविष्य है ऐसा प्रायः कहा जाता है ! अब  उन्हें ही कुछ क्रांतिकारी कदम उठाना होगा ! लेकिन उससे पहले उन्हें इन समस्याओं तथा चुनौतियों के मूल तक जाना होगा और समझ कर उसका निदान ढूढना होगा ! मसलन राजनीति में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण निर्वाचन-प्रक्रिया और राजनेता की नियत है ! क्योंकि निर्वाचन में इतना ज्यादा खर्च होता है जिसका ठीक ठीक हिसाब भी नहीं लगाया जा सकता ! इसी के कारण अनैतिक और अवैध प्रथाओं  का विकास हुआ है ! सुधारों का एक विकल्प गांधी जी का माडल है जिसके अंतर्गत राजनीति को जनता की  सेवा का साधन समझा जाता है ! गांधीवादी व्यवस्था में सत्ता का निम्न स्तर तक विकेंद्रीकरण होता है ! साधारण व्यक्ति अपने को स्वतंत्र समझता है, वह शासन-कार्यों में भाग लेता है ! शासन की इकाई गाँव होता  है ! सत्ता का रूख ऊपर से नीचे न होकर नीचे से ऊपर की ओर होता है ! समूचा शासन पारदर्शी होता है ! गांधी जी भी निर्वाचन पर कम से कम खर्च चाहते थे ! कुछ चिंतको और विद्वानों का भी मानना है कि निर्वाचन में मतदान आवश्यक कर देना चाहिए ऐसा कई देशों में भी है  जिसका समर्थन पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरामण ने भी किया था ! निर्वाचनो में निर्दलीय सदस्यों की बढ़ती हुई संख्या ने निर्वाचन-प्रक्रिया को विकृत कर दिया है ! इससे निर्वाचन का खर्च भी बढ़ा है ! एक लेखक ने निर्वाचन में खर्च होने वाले धन के सात स्रोत बताये है ! इसका पहला स्रोत है राज्य, दूसरा स्रोत है उम्मीदवारों का स्वयं का पैसा , तीसरा स्रोत है उनके राजनैतिक दाल, चौथा स्रोत है उनके व्यापारिक सम्बन्ध, पांचवा स्रोत है अपनी इच्छा से देने वाले दान दाता , छठा स्रोत है विदेशी पैसा जैसा हवाला जैसे माध्यम और सातवां स्रोत है समान हितों वाले निकायों के सिंडिकेट ! अब इनसे बचना है टी पहला कदम यह होना चाहिए कि सभवतः राज्य विधान सभा का और संसद का चुनाव एक साथ होना चाहिए, निर्वाचन अभियान की समय सीमा घटा देनी चाहिए, किसी भी उम्मेदवार को एक से अधिक जगह से चुनाव लड़ने की छूट नहीं होनी चाहिए, आचरण-सहित को एक विधि के रूप दे देना चाहिए, खर्चे की अधिकतम सीमा तय होनी चाहिए और साथ ही रसीदों के आधार पर लेखा-परीक्षा आवश्यक कर देनी चाहिए !   
देश के सामने चरित्र का संकट है ! यह चारित्रिक संकट व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी ! हमारे जीवन में पाए जाने वाले अधिकांश भ्रष्टाचार का कारण बाजार-केन्द्रित व्यापर और धन-केन्द्रित पश्चिमी उपभोक्ता मूल्य है ! जब तक जीवन का अंतिम लक्ष्य धन होगा तब तक भ्रष्टाचार का अंत नहीं होगा ! यह घोर चिंता का विषय है कि हम अपने स्वर्णिम के अतीत को भूलते जा रहे है ! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने मूल और अपने आदर्शों को भूलने वाले राष्ट्र नष्ट हो जाया करते है ! जो समाज अपने बच्चों को अपनी परंपरा का, सदियों की संचित विवेक-सम्पदा का और जीवन मूल्यों का ज्ञान नहीं देते वें महाकाल की धूल में लीन हो जाया करते है ! समाज पुरस्कार और दंड के सिद्धांत पर चलता है !  यदि लोगों को भ्रष्टाचार  का लाभ नहीं मिलेगा और भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्तियों को तुरंत दंड का प्रावधान हो जाय तो भ्रष्टाचार में कमी आ जायेगी ! फिर प्रधानमंत्री को किसी गठबंधन की मजबूरी नहीं होगी और केन्द्रीय मंत्री को सेना भेजकर काला धन वापस मंगवाने जरूरत  नहीं होगी ! हर देशभक्त विशेषकर युवाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे आकर अपना विरोध जाताना चाहिए ! हम सभी युवाओं को अब स्वामी विवेकानंद जैसे चिंतको के द्वारा दिखाए गए गए मार्ग पर चलने का समय आ गया है ! उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा है  कि -
"उत्तिष्ठत  जाग्रत , 
प्राप्यवरान्निबोधत !
 क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्या 
दुर्ग पथस्तत कवर्योवदन्ति !!"           
                  
                         -  राजीव गुप्ता 
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